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न्याय के गलियारों में गुंडागर्दी: तीस हजारी कोर्ट की घटना, संस्थागत विफलता और न्यायिक सुरक्षा का भविष्य

न्याय के गलियारों में गुंडागर्दी: तीस हजारी कोर्ट की घटना, संस्थागत विफलता और न्यायिक सुरक्षा का भविष्य

भारत की न्यायपालिका को लोकतंत्र का सबसे सशक्त स्तंभ माना जाता है। आम नागरिक जब प्रशासन, पुलिस या सत्ता से निराश होता है, तो उसकी अंतिम उम्मीद अदालतों पर टिकी रहती है। लेकिन यदि वही अदालतें—जहाँ न्याय की रक्षा होनी चाहिए—असुरक्षा, हिंसा और अराजकता का केंद्र बन जाएँ, तो यह केवल एक स्थानीय समस्या नहीं रह जाती, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरे की घंटी बन जाती है।

दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट परिसर में एक वकील के साथ कथित मारपीट की घटना और उसका मुद्दा देश के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उठाया जाना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है। यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली की गरिमा और ‘विधि के शासन’ (Rule of Law) पर सीधा प्रहार है।


1. तीस हजारी कोर्ट: इतिहास, महत्व और विवाद

Tis Hazari Courts दिल्ली का सबसे पुराना जिला न्यायालय परिसर है। यह 1950 के दशक से न्यायिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ प्रतिदिन हजारों मुकदमे सूचीबद्ध होते हैं और बड़ी संख्या में वकील, पुलिस अधिकारी, न्यायिक कर्मचारी और वादकारी आते-जाते हैं।

(क) 2019 की पुलिस-वकील हिंसा

साल 2019 में पार्किंग विवाद से शुरू हुई झड़प ने विकराल रूप ले लिया था। पुलिस और वकीलों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ, वाहनों को आग लगा दी गई और फायरिंग तक की नौबत आ गई। उस घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर चिंता पैदा की थी।

उस समय जांच समितियाँ बनीं, रिपोर्टें तैयार हुईं और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के वादे किए गए। लेकिन प्रश्न यह है—क्या उन सुधारों का प्रभाव आज दिखाई देता है?

(ख) हालिया मारपीट: भरोसे का टूटना

जब किसी अधिवक्ता को अपने ही कोर्ट परिसर में पीटा जाए और उसे अपनी सुरक्षा के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगानी पड़े, तो यह स्पष्ट संकेत है कि जिला स्तर पर सुरक्षा तंत्र कमजोर पड़ चुका है।


2. मुख्य न्यायाधीश के समक्ष मामला: संस्थागत संकेत

जब मामला सीधे Supreme Court of India के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उठे, तो यह सामान्य शिकायत नहीं रह जाती। यह न्यायिक प्रणाली के भीतर गहरे असंतोष और असुरक्षा का प्रतीक बन जाती है।

(क) स्थानीय प्रशासन की भूमिका

अदालत परिसर में कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। लेकिन अदालतों की गरिमा और स्वतंत्रता सुनिश्चित करना न्यायिक प्रशासन का भी कर्तव्य है। यदि इन दोनों के बीच समन्वय न हो, तो अराजकता जन्म लेती है।

(ख) विशेष न्यायिक सुरक्षा बल की मांग

लंबे समय से यह प्रस्ताव दिया जाता रहा है कि अदालत परिसरों की सुरक्षा के लिए एक समर्पित बल बनाया जाए, जो Central Industrial Security Force (CISF) की तर्ज पर कार्य करे।
ऐसा बल राजनीतिक या स्थानीय दबाव से मुक्त होकर केवल न्यायिक परिसरों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।


3. वकीलों की सुरक्षा: पेशेवर स्वतंत्रता का प्रश्न

एक वकील केवल निजी व्यक्ति नहीं है; वह न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य घटक है। यदि वह ही असुरक्षित हो जाए, तो न्याय का संतुलन बिगड़ सकता है।

(क) निर्भीक वकालत का अधिकार

संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति और पेशे की स्वतंत्रता देता है। वकील का दायित्व है कि वह अपने मुवक्किल का पक्ष निर्भीकता से रखे। यदि उसे धमकाया या पीटा जाएगा, तो वह स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकेगा।

(ख) न्यायालय की गरिमा पर असर

अदालतें केवल ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं हैं; वे संस्थागत सम्मान का प्रतीक हैं। यदि उन्हीं के गलियारों में मारपीट हो, तो न्याय की पवित्रता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।

(ग) युवा अधिवक्ताओं पर प्रभाव

ऐसी घटनाएँ युवा वकीलों को इस पेशे में आने से हतोत्साहित करती हैं। यदि अदालत परिसर में ही सुरक्षा का अभाव हो, तो पेशे की गरिमा कम होती है।


4. सुरक्षा में खामियाँ: विश्लेषण

1. प्रवेश नियंत्रण की कमजोरी

अक्सर देखा गया है कि अदालत परिसरों में मेटल डिटेक्टर और पहचान पत्र जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है। संवेदनशील परिसर में यह ढिलाई खतरनाक है।

2. भीड़ और अव्यवस्था

तीस हजारी जैसे बड़े परिसर में प्रतिदिन हजारों लोगों की आवाजाही होती है। उचित प्रबंधन के अभाव में भीड़ अराजकता का रूप ले सकती है।

3. जवाबदेही का अभाव

पूर्व की घटनाओं में दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होने से यह संदेश जाता है कि हिंसा के परिणाम गंभीर नहीं होंगे। इससे अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं।

4. तकनीकी निगरानी की कमी

सीसीटीवी कैमरों की संख्या और गुणवत्ता कई बार पर्याप्त नहीं होती। यदि निगरानी तंत्र मजबूत हो, तो अपराध की रोकथाम और जांच दोनों आसान हो सकते हैं।


5. व्यापक संदर्भ: न्यायपालिका की विश्वसनीयता

भारत में न्यायपालिका को अक्सर कार्यपालिका और विधायिका से अधिक विश्वसनीय संस्था माना जाता है। लेकिन यदि न्यायालय परिसर ही असुरक्षित हो जाएँ, तो जनता का विश्वास डगमगा सकता है।

(क) लोकतांत्रिक प्रतीक के रूप में अदालत

अदालतें नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती हैं। यदि वही स्थान हिंसा से ग्रस्त हो, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होती है।

(ख) न्यायिक सुधार की आवश्यकता

सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं; यह एक व्यापक प्रशासनिक सुधार का विषय है। न्यायपालिका, बार काउंसिल और सरकार—तीनों को मिलकर एक समन्वित रणनीति बनानी होगी।


6. समाधान: ठोस और दीर्घकालिक उपाय

  1. विशेष न्यायिक सुरक्षा बल का गठन – अदालत परिसरों के लिए समर्पित, प्रशिक्षित और जवाबदेह सुरक्षा इकाई।
  2. डिजिटल निगरानी और एक्सेस कंट्रोल – बायोमेट्रिक प्रवेश, उन्नत सीसीटीवी नेटवर्क और नियंत्रण कक्ष।
  3. त्वरित अनुशासनात्मक कार्रवाई – हिंसा में शामिल वकीलों या बाहरी तत्वों के खिलाफ बार काउंसिल और अदालत की संयुक्त कार्रवाई।
  4. संकट प्रबंधन प्रशिक्षण – न्यायिक कर्मचारियों और पुलिस के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम।
  5. भीड़ प्रबंधन और संरचनात्मक सुधार – परिसर के भीतर अनधिकृत व्यक्तियों के प्रवेश पर नियंत्रण।

7. सामाजिक और नैतिक आयाम

न्याय केवल निर्णयों से नहीं, बल्कि वातावरण से भी सुनिश्चित होता है। यदि अदालत में आने वाला व्यक्ति डर और असुरक्षा महसूस करे, तो न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

यह प्रश्न केवल तीस हजारी का नहीं है; देश के अन्य जिला न्यायालयों में भी समय-समय पर हिंसा और अव्यवस्था की घटनाएँ सामने आती रही हैं। इसलिए यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर विचार का विषय है।


निष्कर्ष: निर्णायक हस्तक्षेप का समय

तीस हजारी कोर्ट की हालिया घटना और उसका सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उठाया जाना यह दर्शाता है कि स्थिति सामान्य नहीं है। अदालतें वह स्थान होनी चाहिए जहाँ कानून सर्वोपरि हो, न कि शक्ति प्रदर्शन।

यदि न्याय के गलियारों में ही भय और गुंडागर्दी का माहौल होगा, तो आम नागरिक का विश्वास कमजोर होगा। अब समय आ गया है कि सुरक्षा सुधार केवल कागजी वादों तक सीमित न रहें, बल्कि ठोस और पारदर्शी ढंग से लागू किए जाएँ।

न्यायपालिका, पुलिस और बार—इन तीनों स्तंभों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि अदालत परिसर में ‘विधि का शासन’ केवल एक आदर्श न रहे, बल्कि प्रत्यक्ष वास्तविकता बने। तभी न्याय की गरिमा और लोकतंत्र की प्रतिष्ठा सुरक्षित रह सकेगी।