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दोहरी कसौटी: शिक्षकों की परीक्षा बनाम जजों की नियुक्ति—न्याय, समानता और संस्थागत आत्ममंथन

दोहरी कसौटी: शिक्षकों की परीक्षा बनाम जजों की नियुक्ति—न्याय, समानता और संस्थागत आत्ममंथन

भारत में शिक्षा और न्याय—दोनों ही लोकतंत्र के स्तंभ माने जाते हैं। एक समाज को शिक्षित बनाता है, दूसरा उसे न्यायसंगत बनाता है। परंतु जब इन दोनों क्षेत्रों में योग्यता के मापदंड अलग-अलग दिखाई देते हैं, तो स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है—क्या यह न्याय है या संस्थागत विसंगति?


1. शिक्षकों पर अनिवार्य परीक्षा: गुणवत्ता या कठोरता?

भारत में TET (Teacher Eligibility Test) को शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य बनाया गया। इसका आधार है Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 (RTE Act), जिसके तहत प्रत्येक बच्चे को योग्य शिक्षक से शिक्षा पाने का अधिकार है।

(क) तर्क: गुणवत्ता से समझौता नहीं

Supreme Court of India ने कई निर्णयों में स्पष्ट किया है कि यदि शिक्षक ही अयोग्य होंगे तो शिक्षा का अधिकार केवल कागजी बनकर रह जाएगा। इसलिए TET को न्यूनतम योग्यता का मानक माना गया।

(ख) समस्या: अनुभव बनाम परीक्षा

किंतु जिन शिक्षकों की नियुक्ति 2000 या 2010 से पहले हुई, उनके समय में TET की शर्त लागू नहीं थी। आज जब वे 45–50 वर्ष की आयु में हैं, तब उन्हें पुनः छात्र बनकर तीन घंटे की लिखित परीक्षा देने को कहना कई प्रश्न खड़े करता है।
क्या 20–25 वर्षों का कक्षा अनुभव एक वस्तुनिष्ठ प्रश्नपत्र से कमतर है?
क्या परीक्षा केवल सैद्धांतिक ज्ञान मापती है या व्यवहारिक दक्षता भी?

(ग) संवैधानिक आयाम

अनुच्छेद 21A बच्चों को शिक्षा का अधिकार देता है, वहीं अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है। यदि नियमों में परिवर्तन हो, तो क्या उसे पूर्व प्रभाव (retrospective effect) से लागू करना न्यायसंगत है? यह बहस अभी भी जारी है।


2. न्यायाधीशों की नियुक्ति: परीक्षा क्यों नहीं?

भारत में उच्च न्यायपालिका—Supreme Court of India और विभिन्न High Courts of India—में जजों की नियुक्ति ‘कोलेजियम प्रणाली’ के माध्यम से होती है।

(क) कोलेजियम व्यवस्था क्या है?

कोलेजियम वह प्रणाली है जिसमें वरिष्ठ न्यायाधीश ही नए न्यायाधीशों की सिफारिश करते हैं। इसका विकास ‘थ्री जजेज केस’ के निर्णयों से हुआ, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जा सके।

(ख) परीक्षा का अभाव

उच्च न्यायपालिका में प्रवेश के लिए कोई अखिल भारतीय लिखित प्रतियोगी परीक्षा नहीं है। चयन का आधार है—

  • वरिष्ठता
  • अनुभव
  • बार में प्रतिष्ठा
  • निर्णय लेखन क्षमता

(ग) AIJS की बहस

संविधान के अनुच्छेद 312 में All India Judicial Service (AIJS) की संभावना का उल्लेख है। यदि यह लागू होता है, तो संभवतः उच्च न्यायिक पदों के लिए भी एक केंद्रीकृत परीक्षा प्रणाली विकसित हो सकती है।
परंतु न्यायपालिका का एक वर्ग मानता है कि जज का चयन केवल लिखित परीक्षा से नहीं, बल्कि व्यापक कानूनी अनुभव और विवेक से होना चाहिए।


3. दोहरा मापदंड या तार्किक वर्गीकरण?

कानूनी दृष्टि से, राज्य अलग-अलग वर्गों के लिए अलग नियम बना सकता है, बशर्ते वह ‘Reasonable Classification’ की कसौटी पर खरा उतरे।

  • शिक्षक और जज दो भिन्न पेशे हैं।
  • उनकी भूमिकाएँ, प्रशिक्षण और कार्यक्षेत्र अलग हैं।

इसलिए विधिक रूप से यह भेद असंवैधानिक नहीं माना गया।

परंतु नैतिक दृष्टि से प्रश्न उठता है—

  • यदि “अपडेट रहना” आवश्यक है, तो यह सिद्धांत न्यायपालिका पर क्यों लागू न हो?
  • यदि पारदर्शिता शिक्षा में अनिवार्य है, तो न्यायिक नियुक्तियों में भी जनता को प्रक्रिया से अवगत क्यों न कराया जाए?

4. जवाबदेही और पारदर्शिता का प्रश्न

(क) शिक्षक की जिम्मेदारी

एक शिक्षक की त्रुटि एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित कर सकती है। इसलिए गुणवत्ता नियंत्रण उचित है।

(ख) जज की जिम्मेदारी

एक न्यायाधीश का निर्णय किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, संपत्ति या मौलिक अधिकार को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही का महत्व और बढ़ जाता है।

कोलेजियम प्रणाली पर समय-समय पर भाई-भतीजावाद और पारदर्शिता की कमी के आरोप लगते रहे हैं। यद्यपि न्यायपालिका ने NJAC (National Judicial Appointments Commission) को असंवैधानिक ठहराकर अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखा, परंतु सुधार की आवश्यकता पर बहस जारी है।


5. संभावित समाधान: संतुलित सुधार

1. अनुभवी शिक्षकों के लिए वैकल्पिक मूल्यांकन

पुराने शिक्षकों के लिए केवल लिखित परीक्षा के बजाय—

  • सेवा रिकॉर्ड
  • कक्षा निरीक्षण
  • प्रशिक्षण कार्यक्रम
  • छात्रों के परिणाम

के आधार पर प्रमाणीकरण किया जा सकता है।

2. न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता

  • चयन मानदंड सार्वजनिक किए जाएँ।
  • साक्षात्कार या मूल्यांकन की प्रक्रिया अधिक संरचित हो।
  • AIJS पर व्यापक राष्ट्रीय विमर्श हो।

3. सतत प्रशिक्षण (Continuing Education)

जैसे शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण अनिवार्य है, वैसे ही न्यायाधीशों के लिए भी नियमित कानूनी अद्यतन कार्यक्रम और प्रदर्शन समीक्षा को संस्थागत रूप दिया जा सकता है।


6. सामाजिक और संवैधानिक संतुलन

अनुच्छेद 14 समानता की बात करता है, परंतु समानता का अर्थ समान व्यवहार नहीं, बल्कि न्यायसंगत व्यवहार है।
फिर भी लोकतंत्र में यह आवश्यक है कि संस्थाएँ केवल निष्पक्ष हों ही नहीं, बल्कि जनता को निष्पक्ष दिखाई भी दें।

यदि शिक्षा में पारदर्शिता और परीक्षा को गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता है, तो न्यायपालिका को भी अपनी चयन प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और जवाबदेह बनाना चाहिए।


निष्कर्ष: आत्ममंथन का समय

शिक्षा और न्याय—दोनों ही राष्ट्र की आत्मा हैं। एक शिक्षक को 25 वर्ष बाद परीक्षा में बैठाना और दूसरी ओर न्यायिक नियुक्तियों को केवल आंतरिक मूल्यांकन पर आधारित रखना—यह तुलना स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठाती है।

कानून की दृष्टि से यह ‘विशिष्ट वर्गीकरण’ हो सकता है, परंतु सामाजिक दृष्टि से यह असंतुलन प्रतीत होता है।
समाधान टकराव में नहीं, बल्कि सुधार में है।

यदि हम वास्तव में एक विकसित और न्यायपूर्ण भारत की कल्पना करते हैं, तो हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जहाँ—

  • गुणवत्ता हो,
  • पारदर्शिता हो,
  • और सबसे बढ़कर—समानता का भाव हो।

न्याय केवल निर्णयों में नहीं, प्रक्रियाओं में भी दिखाई देना चाहिए।