धारा 34 बनाम धारा 29A: न्यायिक हस्तक्षेप, अधिकार क्षेत्र और विधिक निश्चितता का द्वंद्व
प्रस्तावना: दो धाराएँ, एक अंतर्विरोध
Arbitration and Conciliation Act, 1996 की धारा 29A और धारा 34, दोनों ही मध्यस्थता व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं—परंतु उनकी प्रकृति और उद्देश्य अलग-अलग हैं।
- धारा 29A – समयसीमा का अनुशासन स्थापित करती है।
- धारा 34 – पंचाट (Award) को रद्द करने के सीमित आधार प्रदान करती है।
2026 में सर्वोच्च न्यायालय के C. Velusamy v. N. Palanisamy निर्णय के बाद इन दोनों प्रावधानों के बीच एक स्पष्ट न्यायाधिकार क्षेत्रीय तनाव (Jurisdictional Tension) उभरकर सामने आया है।
यह टकराव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मध्यस्थता के मूल दर्शन—त्वरित और अंतिम समाधान—को प्रभावित करता है।
वैधानिक संरचना: धारा 29A और धारा 34 का तुलनात्मक दृष्टिकोण
| पहलू | धारा 29A | धारा 34 |
|---|---|---|
| उद्देश्य | समयसीमा निर्धारित करना | पंचाट को रद्द करने का आधार |
| प्रकृति | प्रक्रियात्मक अनुशासन | न्यायिक समीक्षा |
| परिणाम | समय समाप्त = अधिदेश समाप्त | अवैधता सिद्ध = पंचाट रद्द |
| हस्तक्षेप | समय विस्तार हेतु न्यायालय | सीमित न्यायिक हस्तक्षेप |
धारा 29A का लक्ष्य “समयबद्धता” है, जबकि धारा 34 का उद्देश्य “वैधानिक वैधता” सुनिश्चित करना है।
1. अधिकार क्षेत्र का संकट (Crisis of Jurisdiction)
धारा 29A(4) स्पष्ट रूप से कहती है कि समयसीमा समाप्त होते ही मध्यस्थ का अधिदेश “समाप्त हो जाएगा”।
कानूनी दृष्टि से, यदि किसी प्राधिकारी का De Jure अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है, तो उसके पश्चात दिया गया निर्णय Coram Non Judice माना जाता है।
धारा 34(2)(a)(v) के अंतर्गत यदि पंचाट मध्यस्थ के अधिकार क्षेत्र से बाहर पारित हुआ है, तो उसे रद्द किया जा सकता है।
टकराव का बिंदु:
C. Velusamy के अनुसार, न्यायालय धारा 29A(5) के तहत समयसीमा समाप्ति के बाद भी विस्तार दे सकता है—और वह भी पूर्वव्यापी प्रभाव से।
इसका अर्थ यह हुआ कि:
- एक “मृत अधिदेश” को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
- धारा 34 के तहत चुनौती देने वाले पक्ष की रणनीति अप्रत्याशित हो जाती है।
यह स्थिति विधिक निश्चितता (Legal Certainty) को कमजोर करती है।
2. प्रक्रियात्मक निश्चितता बनाम वास्तविक न्याय
धारा 34 की परिकल्पना सीमित हस्तक्षेप की है। यह प्रावधान मध्यस्थता को अंतिमता (Finality) प्रदान करने हेतु बनाया गया था।
यदि धारा 29A की समयसीमा को अब “Directory” मान लिया जाए, तो:
- देरी अब स्वतः घातक नहीं रहेगी।
- पंचाट को रद्द करने का एक प्रमुख प्रक्रियात्मक आधार कमजोर हो जाएगा।
- न्यायालय का विवेक विस्तृत हो जाएगा।
व्यावहारिक समस्या:
अब एक पक्षकार धारा 34 की याचिका लंबित रहते हुए धारा 29A के तहत समय विस्तार हेतु आवेदन कर सकता है।
इससे:
- मुकदमेबाजी लंबी खिंच सकती है।
- अंतिमता में विलंब हो सकता है।
- रणनीतिक मुकदमेबाजी (Strategic Litigation) को बढ़ावा मिल सकता है।
3. एस्टोपेल का सिद्धांत और पक्षकारों का आचरण
C. Velusamy में न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि कोई पक्षकार समयसीमा समाप्त होने के बाद भी कार्यवाही में भाग लेता रहा, तो वह बाद में केवल देरी के आधार पर पंचाट को चुनौती नहीं दे सकता।
यह दृष्टिकोण Doctrine of Estoppel पर आधारित है।
परंतु यहाँ एक मौलिक प्रश्न उठता है—
क्या वैधानिक प्रावधानों की अनिवार्यता को पक्षकारों के आचरण से अधीन किया जा सकता है?
यदि धारा 29A अनिवार्य है, तो उसका उल्लंघन स्वतः अवैधता उत्पन्न करता है—चाहे पक्षकारों ने आपत्ति की हो या नहीं।
इस प्रकार एस्टोपेल का प्रयोग धारा 29A की कठोरता को व्यवहारिक लचीलापन प्रदान करता है, परंतु यह विधायी मंशा के विपरीत भी प्रतीत हो सकता है।
4. संभावित अराजकता: परस्पर विरोधी आदेश
कल्पना कीजिए—
- एक वाणिज्यिक न्यायालय धारा 34 के तहत पंचाट को रद्द कर देता है।
- उसी दौरान उच्च न्यायालय धारा 29A के तहत समय विस्तार दे देता है।
ऐसी स्थिति में:
- कौन-सा आदेश प्रभावी होगा?
- क्या धारा 29A का आदेश धारा 34 के आदेश को निष्प्रभावी कर देगा?
यह संभावित न्यायिक टकराव भविष्य में जटिल संवैधानिक प्रश्न उत्पन्न कर सकता है।
5. मध्यस्थता-अनुकूल न्यायशास्त्र: संतुलन की चुनौती
भारत स्वयं को “Arbitration Friendly Jurisdiction” के रूप में स्थापित करना चाहता है।
परंतु इस दिशा में दो समानांतर लक्ष्य हैं:
- त्वरित समाधान
- न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप
यदि समयसीमा लचीली हो जाए और न्यायालय का विवेक बढ़ जाए, तो मध्यस्थता का “स्वायत्त चरित्र” कमजोर हो सकता है।
दूसरी ओर, यदि हर तकनीकी देरी पर पंचाट रद्द कर दिया जाए, तो यह अत्यधिक कठोरता होगी।
6. आलोचनात्मक मूल्यांकन
सकारात्मक पक्ष:
- वास्तविक न्याय की रक्षा।
- नगण्य देरी के कारण राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी से बचाव।
- व्यावहारिक लचीलापन।
नकारात्मक पक्ष:
- विधिक निश्चितता में कमी।
- प्रक्रियात्मक अनुशासन का क्षरण।
- रणनीतिक मुकदमेबाजी की संभावना।
यह निर्णय “परिणामोन्मुखी” है, किंतु “संरचनात्मक स्पष्टता” की दृष्टि से मिश्रित संकेत देता है।
7. संभावित समाधान
- स्पष्ट न्यायिक दिशानिर्देश – पूर्वव्यापी विस्तार केवल असाधारण परिस्थितियों में ही।
- विधायी संशोधन – संसद स्पष्ट करे कि विस्तार समयसीमा समाप्ति से पहले या बाद में किस सीमा तक संभव होगा।
- समानांतर कार्यवाही पर रोक – धारा 29A और धारा 34 के आवेदन एक साथ लंबित न रहें।
निष्कर्ष: निश्चितता और न्याय के बीच संतुलन
धारा 29A और धारा 34 का यह टकराव केवल तकनीकी विवाद नहीं है; यह मध्यस्थता की आत्मा से जुड़ा प्रश्न है।
सर्वोच्च न्यायालय ने “न्याय की विफलता को रोकना” प्राथमिकता माना है, परंतु इससे विधिक निश्चितता प्रभावित होती है।
यदि भविष्य में इस विषय पर एक बड़ी पीठ विचार करे और संतुलित सिद्धांत विकसित करे—जहाँ समयसीमा का सम्मान भी बना रहे और वास्तविक न्याय भी सुरक्षित रहे—तभी भारतीय मध्यस्थता व्यवस्था दीर्घकालिक रूप से स्थिर और विश्वसनीय बन सकेगी।
अंततः प्रश्न यही है—
क्या लचीलापन अनुशासन का स्थान ले सकता है, या अनुशासन ही न्याय की पूर्वशर्त है?