धारा 29A का उद्देश्य और सर्वोच्च न्यायालय का नया दृष्टिकोण: वैधानिक समयसीमा बनाम न्यायिक विवेक का टकराव
प्रस्तावना: समयबद्ध मध्यस्थता की परिकल्पना
भारत में मध्यस्थता (Arbitration) को न्यायिक प्रणाली के विकल्प के रूप में सशक्त बनाने के उद्देश्य से Arbitration and Conciliation Act, 1996 में 2015 के संशोधन द्वारा धारा 29A जोड़ी गई। इसका मूल उद्देश्य था— “समयबद्ध और प्रभावी विवाद समाधान”।
लंबे समय तक भारतीय मध्यस्थता प्रणाली की सबसे बड़ी आलोचना यही रही कि यहाँ पंचाट (Award) देने में वर्षों लग जाते थे। न्यायालयों में लंबित मामलों का बोझ कम करने के लिए जिस वैकल्पिक तंत्र की कल्पना की गई थी, वही स्वयं विलंब का शिकार हो गया था।
ऐसे परिदृश्य में धारा 29A को एक अनुशासनात्मक औजार के रूप में प्रस्तुत किया गया। किंतु 2026 में सर्वोच्च न्यायालय के C. Velusamy निर्णय ने इस कठोर समयसीमा की व्याख्या में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जिसने विधि-जगत में गंभीर बहस को जन्म दिया है।
1. धारा 29A की संरचना और वैधानिक दर्शन
धारा 29A की संरचना तीन प्रमुख स्तरों पर आधारित है:
- 12 माह की मूल समयसीमा – पंचाट की कार्यवाही पूर्ण करने की अवधि।
- 6 माह का विस्तार – पक्षकारों की पारस्परिक सहमति से।
- अधिदेश की समाप्ति – यदि 18 माह में पंचाट पारित न हो, तो मध्यस्थ का अधिकार स्वतः समाप्त।
धारा 29A(4) में प्रयुक्त शब्द “shall terminate” विधायी मंशा को स्पष्ट करते हैं कि समयसीमा अनिवार्य है, न कि निर्देशात्मक (Directory)।
यह प्रावधान भारतीय मध्यस्थता को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने का प्रयास था, ताकि भारत एक विश्वसनीय मध्यस्थता केंद्र के रूप में उभरे।
2. C. Velusamy निर्णय: विवाद का केंद्र
C. Velusamy v. N. Palanisamy (काल्पनिक संदर्भानुसार) में प्रश्न यह था कि—
क्या समयसीमा समाप्त होने के बाद पारित पंचाट को न्यायालय पूर्वव्यापी प्रभाव से वैध बना सकता है?
सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा कि:
- समयसीमा समाप्त होने के बाद पारित पंचाट स्वतः शून्य नहीं माना जाएगा।
- न्यायालय धारा 29A(5) के अंतर्गत पूर्वव्यापी (retrospective) विस्तार दे सकता है।
- केवल तकनीकी देरी के कारण वास्तविक न्याय को असफल नहीं किया जाना चाहिए।
यह व्याख्या “प्रक्रियात्मक कठोरता” की अपेक्षा “वास्तविक न्याय” को प्राथमिकता देती है।
3. अधिदेश की समाप्ति बनाम पूर्वव्यापी वैधीकरण
(क) Jurisdiction का सिद्धांत
सामान्य विधिक सिद्धांत के अनुसार, यदि किसी न्यायिक अथवा अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है, तो उसके पश्चात किया गया कोई भी कार्य coram non judice होता है।
धारा 29A(4) स्पष्ट रूप से कहती है कि समयसीमा समाप्त होने पर मध्यस्थ का अधिदेश “समाप्त हो जाएगा”। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि—
क्या न्यायालय पूर्वव्यापी प्रभाव से एक समाप्त अधिकार को पुनर्जीवित कर सकता है?
न्यायालय का उत्तर “हाँ” है, परंतु आलोचकों के अनुसार यह विधायी शब्दों की सीधी व्याख्या से भिन्न है।
(ख) धारा 34 पर प्रभाव
धारा 34 के अंतर्गत पंचाट को चुनौती देने का एक प्रमुख आधार यह था कि पंचाट अधिकार क्षेत्र के बिना पारित हुआ है।
यदि अब न्यायालय समयसीमा समाप्ति के बाद भी विस्तार दे सकता है, तो:
- चुनौती का आधार कमजोर हो जाएगा।
- अवैध पंचाट को “बाद में” वैध किया जा सकेगा।
- धारा 34 की निवारक शक्ति कमज़ोर पड़ सकती है।
4. Procedural Discipline पर संभावित प्रभाव
धारा 29A का मूल उद्देश्य था अनुशासन स्थापित करना।
यदि मध्यस्थों और पक्षकारों को यह विश्वास हो कि देरी के बावजूद बाद में नियमितीकरण (Regularization) संभव है, तो:
- समयसीमा का भय कम होगा।
- अनावश्यक स्थगन बढ़ सकते हैं।
- कार्यवाही पुनः लंबी खिंच सकती है।
भारतीय न्याय प्रणाली में पहले से लंबित मामलों की समस्या है। मध्यस्थता को उसी दिशा में धकेलना उसके मूल उद्देश्य के विपरीत होगा।
5. न्यायालय का दृष्टिकोण: तकनीकीता बनाम वास्तविक न्याय
सर्वोच्च न्यायालय का तर्क है कि:
- यदि पंचाट लगभग पूर्ण हो चुका है,
- पक्षकारों ने भारी व्यय किया है,
- और देरी नगण्य या तकनीकी है,
तो केवल समयसीमा के आधार पर पूरे पंचाट को निरस्त करना न्यायोचित नहीं होगा।
यह दृष्टिकोण “Substantive Justice” को प्राथमिकता देता है।
किन्तु यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—
क्या न्यायिक विवेक, विधायी स्पष्टता पर हावी हो सकता है?
6. तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य: अंतरराष्ट्रीय मानक
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में समयसीमा का महत्व तो है, परंतु वहाँ सामान्यतः लचीलापन अधिक होता है।
परंतु भारत ने 2015 संशोधन के माध्यम से जानबूझकर एक कठोर संरचना अपनाई थी ताकि:
- देरी की संस्कृति समाप्त हो,
- न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रहे,
- और व्यावसायिक विश्वास बढ़े।
यदि न्यायालय इस कठोरता को लचीला बना देता है, तो यह भारत की “Arbitration Friendly Jurisdiction” बनने की दिशा में मिश्रित संकेत देता है।
7. विधिक निश्चितता बनाम न्यायिक विवेक
| पहलू | पूर्व स्थिति | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|
| समयसीमा | अनिवार्य और कठोर | लचीली और न्यायालय-निर्भर |
| पंचाट की वैधता | देरी = शून्य | देरी = न्यायालय द्वारा वैधीकरण संभव |
| न्यायिक हस्तक्षेप | न्यूनतम | विवेकाधीन और विस्तृत |
विधिक निश्चितता (Legal Certainty) व्यापारिक जगत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि नियम स्पष्ट न हों, तो निवेशक असमंजस में रहते हैं।
8. संभावित समाधान: संतुलन की आवश्यकता
इस विवाद के समाधान हेतु कुछ संभावित उपाय हो सकते हैं:
- विधायी स्पष्टीकरण – संसद स्पष्ट कर सकती है कि विस्तार केवल समयसीमा समाप्ति से पूर्व ही संभव होगा या बाद में भी।
- कठोर परीक्षण मानदंड – न्यायालय यह निर्धारित कर सकता है कि पूर्वव्यापी विस्तार केवल अपवादात्मक परिस्थितियों में ही दिया जाएगा।
- लार्जर बेंच द्वारा पुनर्विचार – भविष्य में इस प्रश्न पर व्यापक संवैधानिक पीठ विचार कर सकती है।
9. व्यापक प्रभाव: भारतीय मध्यस्थता की दिशा
यह निर्णय परिणामोन्मुखी (Result-Oriented) है।
यह उन मामलों में राहत देता है जहाँ:
- देरी अनजाने में हुई,
- पंचाट लगभग पूर्ण था,
- और निरस्तीकरण से असंगत हानि होती।
परंतु दीर्घकालिक दृष्टि से यह जोखिम भी उत्पन्न करता है कि:
- अनुशासन कमजोर पड़े,
- समयसीमा औपचारिकता बन जाए,
- और न्यायिक हस्तक्षेप बढ़े।
निष्कर्ष: संतुलन की खोज
धारा 29A भारतीय मध्यस्थता सुधारों का केंद्रीय स्तंभ थी। इसका उद्देश्य स्पष्ट था— “त्वरित और निश्चित न्याय”।
C. Velusamy निर्णय ने इस स्तंभ को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया है, परंतु उसकी कठोरता को निश्चित रूप से नरम कर दिया है।
यह निर्णय “तकनीकीता पर न्याय” की विजय के रूप में देखा जा सकता है, किंतु “विधिक निश्चितता” के दृष्टिकोण से यह मिश्रित संकेत देता है।
भारत यदि एक वैश्विक मध्यस्थता केंद्र बनना चाहता है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि:
- नियम स्पष्ट हों,
- न्यायालय का विवेक नियंत्रित और पूर्वानुमेय हो,
- और समयसीमा वास्तविक अर्थों में प्रभावी रहे।
अंततः प्रश्न यही है—
क्या हम परिणाम के लिए प्रक्रिया को लचीला बनाएं, या प्रक्रिया की कठोरता से ही परिणाम सुनिश्चित करें?
भविष्य में इस द्वंद्व का समाधान ही भारतीय मध्यस्थता के विकास की दिशा तय करेगा।