अब एक तिहाई सज़ा काटते ही जेल से छुट्टी! BNSS धारा 479 और विचाराधीन कैदियों के अधिकारों की नई न्यायिक व्याख्या
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली लंबे समय से एक गंभीर संकट से जूझ रही है—जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों (Undertrial Prisoners) की अत्यधिक संख्या। ऐसे लाखों लोग वर्षों तक मुकदमे की सुनवाई पूरी होने की प्रतीक्षा में जेलों में बंद रहते हैं, जबकि वे अब तक दोषसिद्ध (Convicted) भी नहीं हुए होते। इसी पृष्ठभूमि में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 479 को एक ऐतिहासिक और मानवोचित प्रावधान माना जा रहा है।
इस धारा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति पहली बार किसी अपराध में विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में है और उसने उस अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम सज़ा का एक-तिहाई (1/3) हिस्सा जेल में काट लिया है, तो उसे बॉन्ड पर रिहा किया जा सकता है।
हाल ही में Supreme Court of India ने स्पष्ट किया है कि इस प्रावधान का लाभ उन कैदियों को भी मिलेगा जिनके विरुद्ध 1 जुलाई 2024 से पहले एफआईआर दर्ज हुई थी। यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
यह लेख BNSS की धारा 479, उसके उद्देश्य, व्यावहारिक प्रभाव, न्यायिक व्याख्या और भविष्य की चुनौतियों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
1. विचाराधीन कैदी: समस्या की जड़
भारत की जेलों में बंद कैदियों में से लगभग दो-तिहाई से अधिक विचाराधीन कैदी हैं। इसका अर्थ यह है कि अधिकांश लोग ऐसे हैं जिनका मुकदमा अभी तक समाप्त नहीं हुआ है और जिनकी दोषसिद्धि नहीं हुई है।
विचाराधीन कैदियों की इस बड़ी संख्या के पीछे कई कारण हैं—
- मुकदमों का लंबित रहना
- जांच एजेंसियों द्वारा देरी
- न्यायालयों में मामलों का भारी बोझ
- गरीब और अशिक्षित आरोपियों की कानूनी सहायता तक सीमित पहुंच
इन परिस्थितियों में कई बार ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति संभावित सज़ा से भी अधिक समय जेल में काट देता है, जबकि उसका मामला अभी निर्णीत नहीं हुआ होता। यह स्थिति “न्याय से वंचना” (Denial of Justice) के समान है।
2. BNSS धारा 479: प्रावधान का सार
BNSS की धारा 479 का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से लंबे समय तक जेल में न रखा जाए।
इस धारा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं—
- आरोपी पहली बार अपराध में जेल गया हो।
- आरोपी विचाराधीन कैदी हो।
- उसने उस अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम सज़ा का 1/3 हिस्सा जेल में काट लिया हो।
- ऐसी स्थिति में अदालत उसे बॉन्ड या जमानत पर रिहा कर सकती है।
यह प्रावधान CrPC की पुरानी धारा 436A से प्रेरित है, लेकिन BNSS ने इसे अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक बनाया है।
3. पहली बार अपराध करने वालों को प्राथमिकता क्यों?
कानून यह मानकर चलता है कि पहली बार अपराध करने वाले व्यक्ति को सुधार का अवसर मिलना चाहिए।
- वह व्यक्ति आदतन अपराधी नहीं होता।
- समाज में पुनर्वास (Rehabilitation) की संभावना अधिक होती है।
- लंबे समय तक जेल में रखने से उसका सामाजिक और पारिवारिक जीवन पूरी तरह बिखर सकता है।
BNSS धारा 479 इसी सुधारात्मक न्याय (Reformative Justice) के सिद्धांत पर आधारित है।
4. 1/3 सज़ा का सिद्धांत: व्यावहारिक अर्थ
मान लीजिए किसी अपराध की अधिकतम सज़ा 9 वर्ष है।
- उसका 1/3 भाग = 3 वर्ष
यदि कोई विचाराधीन कैदी 3 वर्ष जेल में काट चुका है और वह पहली बार अपराध में जेल गया है, तो उसे धारा 479 के तहत रिहाई का अधिकार मिल सकता है।
यह प्रावधान न्यायालय को यह अवसर देता है कि वह प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को देखकर निर्णय करे।
5. सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या: पूर्व प्रभाव (Retrospective Benefit)
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि BNSS धारा 479 का लाभ केवल उन मामलों तक सीमित नहीं रहेगा जिनमें एफआईआर 1 जुलाई 2024 के बाद दर्ज हुई हो।
बल्कि—
- जिन मामलों में एफआईआर 1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज हुई थी,
- और आरोपी अभी भी विचाराधीन कैदी है,
उन्हें भी इस धारा का लाभ मिलेगा।
यह निर्णय “लाभकारी कानूनों के पूर्व प्रभाव” (Beneficial Legislation with Retrospective Effect) के सिद्धांत पर आधारित है।
6. यह निर्णय क्यों ऐतिहासिक है?
- जेलों पर बोझ कम होगा।
- हजारों विचाराधीन कैदियों को तत्काल राहत मिलेगी।
- न्यायिक प्रणाली पर बढ़ता दबाव घटेगा।
- मानवाधिकारों की रक्षा होगी।
यह निर्णय यह संदेश देता है कि कानून केवल दंड देने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह न्याय और करुणा का साधन भी है।
7. बॉन्ड पर रिहाई का अर्थ
बॉन्ड पर रिहाई का मतलब यह नहीं है कि आरोपी पूरी तरह मुक्त हो गया।
- उसे न्यायालय द्वारा निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा।
- सुनवाई की तारीख पर उपस्थित होना अनिवार्य होगा।
- शर्तों के उल्लंघन पर पुनः गिरफ्तारी संभव है।
इस प्रकार समाज की सुरक्षा और आरोपी के अधिकारों के बीच संतुलन बनाया जाता है।
8. किन मामलों में यह लाभ नहीं मिलेगा?
BNSS धारा 479 का लाभ सामान्यतः गंभीर और जघन्य अपराधों में सीमित किया जा सकता है, जैसे—
- आतंकवाद से जुड़े अपराध
- राष्ट्र की सुरक्षा से संबंधित अपराध
- अत्यंत गंभीर संगठित अपराध
अदालत के पास विवेकाधिकार रहेगा कि वह किस मामले में यह राहत दे।
9. निचली अदालतों की भूमिका
इस प्रावधान की सफलता काफी हद तक निचली अदालतों पर निर्भर करेगी।
- जेल प्रशासन को पात्र कैदियों की सूची तैयार करनी होगी।
- अदालतों को स्वतः संज्ञान लेकर मामलों की समीक्षा करनी होगी।
- कानूनी सहायता वकीलों को सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
यदि यह प्रक्रिया प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो वास्तविक बदलाव संभव है।
10. आलोचनाएँ और चिंताएँ
कुछ आलोचकों का कहना है कि—
- इससे अपराधियों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
- समाज की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
लेकिन यह तर्क तभी सही होगा जब यह मान लिया जाए कि हर विचाराधीन कैदी अपराधी है, जबकि कानून की मूल धारणा यह है कि जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, व्यक्ति निर्दोष माना जाता है।
11. संवैधानिक दृष्टिकोण
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” की गारंटी देता है।
BNSS धारा 479 इसी अनुच्छेद की भावना को साकार करती है।
यह प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता अनावश्यक रूप से छीनी न जाए।
12. भविष्य की दिशा
यदि BNSS धारा 479 को सही तरीके से लागू किया गया, तो—
- भारत की जेल व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है।
- न्यायिक प्रक्रिया अधिक मानवीय बनेगी।
- विचाराधीन कैदियों की समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी।
यह प्रावधान भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली को दंडात्मक से अधिक सुधारात्मक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
निष्कर्ष
BNSS धारा 479 और सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या यह दर्शाती है कि भारतीय न्याय व्यवस्था अब केवल अपराध और दंड तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वह न्याय, करुणा और मानवाधिकारों के संतुलन की ओर बढ़ रही है।
“अब एक तिहाई सज़ा काटते ही जेल से छुट्टी” केवल एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि एक नई सोच का प्रतीक है—ऐसी सोच, जिसमें व्यक्ति को सुधार का अवसर दिया जाता है और न्याय को मानवीय रूप दिया जाता है।
यदि इस प्रावधान को ईमानदारी और प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह भारतीय न्याय इतिहास के सबसे सकारात्मक सुधारों में गिना जाएगा।