न्याय की कसौटी पर मृत्युदंड: बढ़ते मृत्युदंड और गिरती पुष्टि दर का गहराता संकट
भारत की न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड (Death Penalty) हमेशा से एक जटिल और संवेदनशील विषय रहा है। हाल ही में NALSAR स्थित ‘स्क्वायर सर्कल क्लिनिक’ (Square Circle Clinic) द्वारा जारी ‘वार्षिक मृत्युदंड सांख्यिकी रिपोर्ट (2016-2025)’ ने भारतीय न्यायपालिका के भीतर एक चौंकाने वाले विरोधाभास को उजागर किया है। एक तरफ जहां निचली अदालतें (Sessions Courts) मृत्युदंड देने में उदारता दिखा रही हैं, वहीं उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन्हें खारिज करने या बदलने की दर में भारी वृद्धि हुई है।
यह रिपोर्ट न केवल आंकड़ों का संग्रह है, बल्कि यह हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली की संरचनात्मक खामियों, जांच की गुणवत्ता और सजा निर्धारण की प्रक्रियाओं पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
1. सांख्यिकीय विरोधाभास: निचली अदालतें बनाम उच्चतर न्यायपालिका रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘पुष्टि दर’ (Confirmation Rate) और ‘बरी होने की दर’ (Acquittal Rate) के बीच का भारी अंतर है। पिछले एक दशक (2016-2025) के आंकड़े बताते हैं कि उच्च न्यायालयों में मृत्युदंड पाने वाले दोषियों के बरी होने की दर, उनकी सजा की पुष्टि होने की दर से चार गुना अधिक है।
प्रमुख आंकड़े एक नज़र में:
सत्र न्यायालय (Sessions Courts): पिछले 10 वर्षों में 822 मामलों में 1,279 व्यक्तियों को 1,310 मृत्युदंड सुनाए गए।
उच्च न्यायालय (High Courts): उच्च न्यायालयों ने कुल 842 मृत्युदंड के मामलों पर निर्णय लिया, जिनमें से केवल 70 (8.31%) की पुष्टि की गई।
परिणाम का विभाजन: उच्च न्यायालयों के निर्णयों में 30.64% लोग पूरी तरह बरी कर दिए गए, जबकि 48% मामलों में सजा को उम्रकैद में बदल (Commutation) दिया गया।
यह डेटा स्पष्ट करता है कि निचली अदालतों द्वारा दी गई मृत्युदंड की सजाओं में से 90% से अधिक मामले ऊपरी अदालतों में ‘कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण’ पाए जा रहे हैं।
2. सर्वोच्च न्यायालय का रुख: फांसी से बढ़ती दूरी
सर्वोच्च न्यायालय के संदर्भ में रिपोर्ट और भी अधिक महत्वपूर्ण संकेत देती है। रिपोर्ट के अनुसार, लगातार तीसरे वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने एक भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की है।
इतना ही नहीं, 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने 10 व्यक्तियों को मृत्युदंड के मामलों में पूरी तरह बरी कर दिया, जो 2016 के बाद की सबसे बड़ी संख्या है। सर्वोच्च न्यायालय की बरी करने की दर, सजा की पुष्टि करने की दर से दोगुनी रही है। यह इस बात का प्रमाण है कि देश की सबसे बड़ी अदालत अब ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ (Rarest of Rare) सिद्धांत की व्याख्या को और अधिक कठोरता से लागू कर रही है और साक्ष्यों की सूक्ष्मता से जांच कर रही है।
3. मृत्युदंड की बढ़ती जनसंख्या: एक विरोधाभासी स्थिति भले ही उच्चतर अदालतें फांसी की सजा देने से बच रही हैं, लेकिन भारत की जेलों में ‘डेथ रो’ (Death Row) पर मौजूद कैदियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
2016 में स्थिति: मृत्युदंड की प्रतीक्षा कर रहे कैदियों की संख्या लगभग 400 थी।
2025 में स्थिति: 31 दिसंबर 2025 तक यह संख्या बढ़कर 574 हो गई है।
वृद्धि: पिछले 9 वर्षों में मृत्युदंड की सजा पाए कैदियों की आबादी में 45% की वृद्धि दर्ज की गई है।
इसका मुख्य कारण यह है कि ट्रायल कोर्ट (सत्र न्यायालय) द्वारा सजा सुनाए जाने की गति बहुत तेज है, जबकि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में अपीलों के निपटारे में लगने वाला समय बहुत अधिक है। 2025 में ही, निचली अदालतों ने 94 मामलों में 128 व्यक्तियों (118 पुरुष और 10 महिलाएं) को फांसी की सजा सुनाई।
4. सजा निर्धारण के दिशा-निर्देशों की अनदेखी
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निचली अदालतों द्वारा ‘सेंटेंसिंग गाइडलाइंस’ (Sentencing Guidelines) के उल्लंघन पर जोर देता है। भारत में मृत्युदंड देते समय न्यायाधीश को न केवल अपराध की प्रकृति (Crime) को देखना होता है, बल्कि अपराधी की परिस्थितियों (Criminal) पर भी विचार करना होता है।
मिटिगेटिंग फैक्टर्स (Mitigating Factors) की कमी:
अक्सर देखा जाता है कि ट्रायल कोर्ट केवल अपराध की क्रूरता को आधार मानकर फांसी दे देती हैं। अपराधी की मानसिक स्थिति, उसकी सुधरने की संभावना, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि और उम्र जैसे कारकों पर विचार नहीं किया जाता। रिपोर्ट बताती है कि ट्रायल कोर्ट की इसी विफलता के कारण उच्च न्यायालयों में जाकर ये सजाएं या तो पलट जाती हैं या कम कर दी जाती हैं।
5. अपराधों का स्वरूप: हत्या और यौन अपराध
मृत्युदंड पाने वाले कैदियों में सबसे बड़ी संख्या उन लोगों की है जिन्हें ‘साधारण हत्या’ (Murder Simpliciter) के लिए दोषी ठहराया गया है (254 कैदी)। इसके बाद दूसरा बड़ा वर्ग उन अपराधियों का है जिन्होंने हत्या के साथ-साथ यौन अपराध (Murder involving sexual offence) किए हैं (213 कैदी)।
यौन अपराधों के मामलों में जनभावनाओं और राजनीतिक दबाव के चलते निचली अदालतों द्वारा मृत्युदंड देने की प्रवृत्ति बढ़ी है, लेकिन कानूनी साक्ष्यों की कसौटी पर ये मामले अक्सर ऊपरी अदालतों में टिक नहीं पाते।
6. वैश्विक रुझान और भारत की स्थिति
स्क्वायर सर्कल क्लिनिक की रिपोर्ट वैश्विक रुझान के साथ तालमेल बिठाती दिखती है। दुनिया भर में मृत्युदंड को समाप्त करने या उसके उपयोग को सीमित करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि मृत्युदंड देने में “व्यक्तिगत विवेक” (Subjective Discretion) का हावी होना एक बड़ी समस्या है। एक ही तरह के अपराध में अलग-अलग न्यायाधीश अलग-अलग सजा देते हैं, जो कानून की समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
7. निष्कर्ष: सुधार की आवश्यकता
स्क्वायर सर्कल क्लिनिक की यह रिपोर्ट भारतीय न्याय प्रणाली के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। 8% की पुष्टि दर और 30% से अधिक की बरी दर यह दर्शाती है कि कहीं न कहीं जांच एजेंसियों और निचली अदालतों के बीच न्याय के मानकों में बड़ा अंतर है।
सुधार के मुख्य बिंदु:
ट्रायल कोर्ट का प्रशिक्षण: निचली अदालतों के न्यायाधीशों को सजा निर्धारण के आधुनिक सिद्धांतों और ‘मिटिगेशन’ (Mitigation) जांच के बारे में प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है।
जांच में सुधार: उच्च बरी दर का मतलब है कि पुलिस जांच में गंभीर खामियां रह जाती हैं, जिसका लाभ बाद में दोषियों को मिलता है या निर्दोषों को सालों जेल में गुजारने पड़ते हैं।
कानूनी स्पष्टता: ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट करने की जरूरत है ताकि सजा सुनाते समय व्यक्तिपरकता (Subjectivity) कम हो सके।
अंततः, न्याय का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि सत्य की स्थापना करना है। यदि फांसी की सजा पाने वाले चार में से एक व्यक्ति अंततः निर्दोष पाया जा रहा है, तो यह पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।