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फोटोकॉपी से संपत्ति बिक्री शून्य: ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ और द्वितीयक साक्ष्य पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त रेखा

फोटोकॉपी से संपत्ति बिक्री शून्य: ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ और द्वितीयक साक्ष्य पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त रेखा

प्रस्तावना: संपत्ति, साक्ष्य और भरोसे की कसौटी

अचल संपत्ति का लेन-देन केवल आर्थिक सौदा नहीं, बल्कि अधिकारों का हस्तांतरण है। ऐसे मामलों में दस्तावेजों की शुचिता ही न्याय की बुनियाद बनती है। हाल के निर्णय में Supreme Court of India ने स्पष्ट किया कि केवल फोटोकॉपी के आधार पर ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ (PoA) से की गई बिक्री वैध नहीं मानी जा सकती, जब तक कि वह कानूनन निर्धारित कसौटियों पर खरी न उतरे। अदालत ने साक्ष्य के “सर्वोत्तम साक्ष्य नियम” (Best Evidence Rule) को दोहराते हुए कहा कि संपत्ति जैसे गंभीर विषय में मूल दस्तावेज की उपस्थिति अनिवार्य है।

यह फैसला न केवल एक विवाद का निपटारा है, बल्कि रियल एस्टेट क्षेत्र, पंजीयन तंत्र और नागरिकों के लिए दिशा-निर्देश भी है।


विवाद का सार: फोटोकॉपी पर आधारित हस्तांतरण

मामला उस स्थिति से जुड़ा था, जहाँ विक्रेता ने मूल पावर ऑफ अटॉर्नी प्रस्तुत किए बिना उसकी फोटोकॉपी के आधार पर बिक्री विलेख निष्पादित कर दिया। बाद में वास्तविक स्वामी/हितधारक ने इस हस्तांतरण को चुनौती दी। निचली अदालतों में भिन्न-भिन्न निष्कर्ष निकले—कहीं फोटोकॉपी को सीमित परिस्थितियों में स्वीकार किया गया, तो कहीं उसे अपर्याप्त माना गया।

सर्वोच्च न्यायालय ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि:

  • मूल पावर ऑफ अटॉर्नी प्रस्तुत नहीं की गई;
  • मूल की अनुपलब्धता का पर्याप्त प्रमाण नहीं दिया गया;
  • फोटोकॉपी की प्रामाणिकता (authenticity) सिद्ध करने के लिए आवश्यक आधार नहीं रखा गया;
  • द्वितीयक साक्ष्य पेश करने की अनुमति का औपचारिक अनुरोध भी विधिसम्मत ढंग से नहीं किया गया।

इन कमियों के चलते अदालत ने बिक्री को शून्य (Void) करार दिया और कहा कि ऐसी प्रक्रिया कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं है।


धारा 65 और द्वितीयक साक्ष्य: सीमाएँ और शर्तें

Indian Evidence Act, 1872 की धारा 65 यह बताती है कि किन परिस्थितियों में द्वितीयक साक्ष्य (Secondary Evidence) स्वीकार्य हो सकता है। सामान्य नियम यह है कि प्राथमिक साक्ष्य—अर्थात मूल दस्तावेज—ही प्रस्तुत किया जाए। अपवाद स्वरूप, फोटोकॉपी या अन्य प्रतिलिपि तभी मान्य हो सकती है जब:

  1. मूल दस्तावेज खो/नष्ट हो गया हो और इस तथ्य का विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत किया जाए;
  2. मूल विपक्षी के कब्जे में हो और वह नोटिस के बावजूद उसे पेश न कर रहा हो;
  3. प्रतिलिपि की शुद्धता सिद्ध हो—यह दिखाया जाए कि फोटोकॉपी मूल से ही तैयार हुई है, उसमें कोई हेरफेर नहीं;
  4. अदालत की अनुमति ली गई हो, क्योंकि द्वितीयक साक्ष्य स्वतः स्वीकार्य नहीं होता।

सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि संपत्ति हस्तांतरण जैसे मामलों में इन शर्तों का कठोर अनुपालन आवश्यक है। मात्र सुविधा या जल्दबाजी के कारण मूल दस्तावेज से परहेज नहीं किया जा सकता।


पावर ऑफ अटॉर्नी: अधिकार का संवेदनशील साधन

पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से प्रधान (Principal) एजेंट को अपनी ओर से कार्य करने का अधिकार देता है—कभी-कभी संपत्ति बेचने जैसे व्यापक अधिकार भी। इसलिए इसकी वैधता, निष्पादन और प्रमाणन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यदि केवल फोटोकॉपी के आधार पर ऐसे अधिकारों को मान्यता दी जाने लगे, तो जालसाजी की संभावनाएँ बढ़ेंगी—पुरानी प्रतियों में बदलाव, हस्ताक्षर की नकल, अथवा शर्तों में हेरफेर जैसे जोखिम सामने आएँगे। अदालत ने कहा कि मूल दस्तावेज की मौजूदगी यह सुनिश्चित करती है कि अधिकार वास्तविक, स्वैच्छिक और विधिसम्मत है।

साथ ही, न्यायालय ने संकेत दिया कि पंजीकरण तंत्र को भी सतर्क रहना होगा—क्योंकि पंजीकरण की प्रक्रिया ही लेन-देन की विश्वसनीयता का सार्वजनिक प्रमाण बनती है।


“Best Evidence Rule” की पुनर्पुष्टि

सर्वोत्तम साक्ष्य का सिद्धांत कहता है कि जब मूल दस्तावेज उपलब्ध हो, तो उसकी प्रतिलिपि पर निर्भरता नहीं की जा सकती। यह नियम न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

संपत्ति विवादों में यह सिद्धांत और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि:

  • स्वामित्व अधिकार दीर्घकालिक और उच्च मूल्य के होते हैं;
  • तीसरे पक्ष के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं;
  • बैंक/वित्तीय संस्थाएँ गिरवी (mortgage) के आधार पर ऋण देती हैं।

अतः दस्तावेज की प्रामाणिकता पर कोई समझौता न्याय के मूलभूत ढांचे को कमजोर कर सकता है।


क्रेता की सावधानी (Caveat Emptor): व्यवहारिक पाठ

यह निर्णय खरीदारों के लिए स्पष्ट संदेश है—

  • मूल पावर ऑफ अटॉर्नी और स्वामित्व श्रृंखला (chain of title) की जांच करें;
  • नोटरी/गवाहों/पंजीकरण विवरण का सत्यापन करें;
  • विधिक सलाह लेकर ही सौदा करें;
  • केवल फोटोकॉपी या स्कैन कॉपी पर भरोसा न करें

रियल एस्टेट में “ड्यू डिलिजेंस” (Due Diligence) की अनदेखी भविष्य में दीवानी/फौजदारी मुकदमों का कारण बन सकती है। अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी कहा कि सुविधा की संस्कृति (culture of convenience) कानून का विकल्प नहीं हो सकती।


पंजीयन कार्यालयों की जवाबदेही

उप-रजिस्ट्रार/रजिस्ट्रार कार्यालयों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यदि फोटोकॉपी के आधार पर दस्तावेज पंजीकृत होते हैं, तो वे विवाद का कारण बन सकते हैं। यह निर्णय संकेत देता है कि:

  • दस्तावेजों की मूल प्रति का सत्यापन प्राथमिकता हो;
  • संदेहास्पद मामलों में अतिरिक्त जांच की जाए;
  • रिकॉर्ड-कीपिंग और डिजिटलीकरण के बावजूद मूल दस्तावेज की अनिवार्यता बनी रहे।

पंजीकरण तंत्र की सतर्कता से ही भविष्य के विवादों में कमी आ सकती है।


जालसाजी पर अंकुश और सार्वजनिक नीति

रियल एस्टेट क्षेत्र में फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी, डुप्लीकेट दस्तावेज और कूटरचित प्रतियों के आधार पर कब्जा/बिक्री के मामले सामने आते रहे हैं। इस निर्णय से स्पष्ट संदेश गया है कि अदालतें साक्ष्य के मानकों पर कोई समझौता नहीं करेंगी।

यह सार्वजनिक नीति (Public Policy) के अनुरूप भी है—क्योंकि संपत्ति अधिकार संविधानिक ढांचे में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। यदि दस्तावेजी शुचिता पर ढील दी जाए, तो व्यापक सामाजिक-आर्थिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है।


न्यायिक संतुलन: तकनीकीता बनाम न्याय

कुछ तर्क यह देते हैं कि कठोर प्रक्रिया कभी-कभी वास्तविक लेन-देन को भी प्रभावित कर सकती है। परंतु न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रक्रिया स्वयं में सुरक्षा कवच है।

  • प्रक्रिया से छूट देने पर दुरुपयोग की संभावना बढ़ती है;
  • अपवाद (exception) को नियम (rule) नहीं बनाया जा सकता;
  • द्वितीयक साक्ष्य तभी स्वीकार्य है जब उसकी आवश्यकता और प्रामाणिकता सिद्ध हो।

इस प्रकार, अदालत ने तकनीकीता और न्याय के बीच संतुलन बनाते हुए यह स्पष्ट किया कि संपत्ति मामलों में प्रमाण का मानक ऊँचा रहना चाहिए।


निष्कर्ष: दस्तावेज की वास्तविकता ही न्याय का आधार

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय एक स्पष्ट संदेश देता है—संपत्ति के अधिकारों की रक्षा दस्तावेजों की “छाया” से नहीं, बल्कि उनकी वास्तविकता से होगी। फोटोकॉपी के आधार पर की गई बिक्री को अवैध ठहराकर अदालत ने साक्ष्य कानून की आत्मा को मजबूत किया है।

रियल एस्टेट बाजार, पंजीयन तंत्र और नागरिक—सभी के लिए यह फैसला मार्गदर्शक है। मूल दस्तावेज की अनिवार्यता केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि अधिकारों की सुरक्षा का मूलाधार है।

अंततः, यह निर्णय याद दिलाता है कि न्याय की इमारत भरोसे पर खड़ी होती है—और भरोसा तभी टिकता है जब प्रमाण वास्तविक, सत्यापित और विधिसम्मत हों।