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BNSS, 2023 की धारा 5 — लागू कानून और अधिकार क्षेत्र का आधार : भारतीय आपराधिक प्रक्रिया का नया स्तंभ

BNSS, 2023 की धारा 5 — लागू कानून और अधिकार क्षेत्र का आधार : भारतीय आपराधिक प्रक्रिया का नया स्तंभ

       भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में वर्ष 2023 एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया, जब औपनिवेशिक काल से चले आ रहे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) को प्रतिस्थापित करते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 को लागू किया गया। BNSS का उद्देश्य केवल पुराने कानून का नाम बदलना नहीं है, बल्कि पूरी आपराधिक प्रक्रिया को सरल, आधुनिक, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बनाना है।

      BNSS की धारा 5 इस पूरी संहिता की आधारशिला कही जा सकती है, क्योंकि यह यह निर्धारित करती है कि भारत में अपराधों की जांच (Investigation), पूछताछ (Inquiry) और विचारण (Trial) किस कानून और किस प्रक्रिया के अनुसार किए जाएंगे। यह धारा यह स्पष्ट करती है कि कौन-सा कानून “प्रक्रियात्मक कानून” के रूप में लागू होगा और किन परिस्थितियों में विशेष कानूनों को प्राथमिकता दी जाएगी।

इस लेख में हम धारा 5 की अवधारणा, संरचना, उद्देश्य, महत्व, व्यावहारिक प्रभाव तथा पुराने कानून (CrPC) से इसकी तुलना का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।


 1. धारा 5 का मूल उद्देश्य

धारा 5 का मुख्य उद्देश्य है –
प्रक्रियात्मक स्पष्टता (Procedural Clarity) सुनिश्चित करना।

आपराधिक कानून दो भागों में बंटा होता है –

  1. सारभूत कानून (Substantive Law) – जो यह बताता है कि अपराध क्या है और उसकी सजा क्या होगी।
  2. प्रक्रियात्मक कानून (Procedural Law) – जो यह बताता है कि अपराध की जांच, मुकदमा और निर्णय किस तरीके से होगा।

BNSS, 2023 एक प्रक्रियात्मक कानून है और धारा 5 यह तय करती है कि भारत में आपराधिक मामलों में यही मुख्य प्रक्रियात्मक कानून होगा।


 2. धारा 5 का सार (सरल शब्दों में)

धारा 5 कहती है कि –

भारत में किसी भी अपराध की जांच, पूछताछ और विचारण सामान्यतः BNSS के अनुसार किया जाएगा, चाहे वह अपराध भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत हो या किसी अन्य कानून के अंतर्गत।

परंतु, यदि किसी विशेष या स्थानीय कानून (Special/Local Law) में अलग प्रक्रिया निर्धारित की गई है, तो उस विशेष कानून की प्रक्रिया लागू होगी।

इस प्रकार धारा 5 सामान्य नियम + अपवाद के सिद्धांत पर आधारित है।


 3. BNS (भारतीय न्याय संहिता) के तहत अपराध और धारा 5

(क) सामान्य नियम

BNS में परिभाषित सभी अपराधों की जांच, पूछताछ और विचारण BNSS के अनुसार होगा।

(ख) इसका अर्थ

यदि कोई व्यक्ति चोरी, डकैती, मारपीट, हत्या, धोखाधड़ी, आपराधिक षड्यंत्र आदि अपराध करता है, तो –

  • एफआईआर कैसे दर्ज होगी
  • गिरफ्तारी कैसे होगी
  • जांच कैसे चलेगी
  • चार्जशीट कैसे दाखिल होगी
  • ट्रायल कैसे होगा

ये सभी प्रक्रियाएँ BNSS के प्रावधानों से नियंत्रित होंगी।

(ग) महत्व

इससे पूरे देश में एकरूपता आती है और यह सुनिश्चित होता है कि सामान्य अपराधों के मामलों में पुलिस और अदालतें एक ही प्रक्रिया अपनाएँ।


 4. विशेष / स्थानीय कानूनों के तहत अपराध

भारत में अनेक ऐसे कानून हैं जो विशिष्ट प्रकार के अपराधों से निपटने के लिए बनाए गए हैं, जैसे –

  • मादक पदार्थों से संबंधित कानून
  • बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों से संबंधित कानून
  • आतंकवाद से संबंधित कानून

(क) सामान्य नियम

इन कानूनों के तहत आने वाले अपराधों की प्रक्रिया भी सामान्यतः BNSS के अनुसार होगी।

(ख) अपवाद

यदि उस विशेष कानून में स्वयं यह बताया गया है कि –

  • गिरफ्तारी कैसे होगी
  • जमानत की शर्तें क्या होंगी
  • जांच की समय-सीमा क्या होगी
  • विशेष अदालत में मुकदमा चलेगा

तो BNSS के बजाय उसी कानून की प्रक्रिया लागू होगी

(ग) उदाहरण

NDPS, POCSO, UAPA जैसे कानूनों में कई विशेष प्रक्रियाएँ दी गई हैं, इसलिए उन मामलों में वही प्रक्रियाएँ प्राथमिकता पाएँगी।


 5. धारा 5 और “Special Law Prevails over General Law” का सिद्धांत

धारा 5 एक स्थापित कानूनी सिद्धांत को अपनाती है –
विशेष कानून, सामान्य कानून पर प्रधान होता है।

BNSS सामान्य प्रक्रियात्मक कानून है, जबकि NDPS, POCSO, UAPA जैसे कानून विशेष प्रकृति के हैं।
इसलिए जहाँ टकराव होगा, वहाँ विशेष कानून लागू होगा।


 6. धारा 5 का व्यावहारिक महत्व (Practical Significance)

(1) पुलिस के लिए

  • यह स्पष्ट है कि उन्हें किस कानून के तहत कार्रवाई करनी है।
  • अनावश्यक भ्रम और अधिकार क्षेत्र संबंधी विवाद कम होते हैं।

(2) अदालतों के लिए

  • यह तय करने में सुविधा होती है कि कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जाए।
  • मुकदमों में तकनीकी आधार पर होने वाली देरी कम होती है।

(3) अभियुक्त और पीड़ित के लिए

  • दोनों को यह पता होता है कि उनका मामला किस प्रक्रिया से चलेगा।
  • न्याय की पारदर्शिता बढ़ती है।

 7. धारा 5 और संविधान का संबंध

भारत का संविधान “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” (Procedure Established by Law) की अवधारणा को मान्यता देता है।
धारा 5 यह सुनिश्चित करती है कि –

  • प्रक्रिया मनमानी न हो
  • विधि द्वारा स्थापित हो
  • और समान रूप से लागू हो

इस प्रकार यह धारा अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) की भावना के अनुरूप है।


 8. धारा 5 और तकनीक-अनुकूल न्याय प्रणाली

BNSS का उद्देश्य प्रक्रिया को डिजिटल और तकनीक-सक्षम बनाना है, जैसे –

  • ई-एफआईआर
  • ई-समन
  • डिजिटल साक्ष्य

धारा 5 यह सुनिश्चित करती है कि यह आधुनिक प्रक्रिया सभी अपराधों पर लागू हो, जब तक कि विशेष कानून कुछ और न कहे।


 9. CrPC की धारा 4 से तुलना

पुराने कानून CrPC की धारा 4 और BNSS की धारा 5 लगभग समान हैं।

बिंदु CrPC की धारा 4 BNSS की धारा 5
संदर्भ IPC के अपराध BNS के अपराध
प्रक्रिया CrPC के अनुसार BNSS के अनुसार
विशेष कानून अपवाद के रूप में मान्य अपवाद के रूप में मान्य

अर्थात् मूल सिद्धांत वही है, केवल कानूनों के नाम और संरचना बदले हैं।


 10. धारा 5 की आलोचनात्मक दृष्टि

कुछ विद्वानों का मत है कि –

  • यदि विशेष कानूनों में बहुत अधिक अपवाद दिए जाते हैं, तो एकरूपता प्रभावित हो सकती है।
  • इसलिए भविष्य में आवश्यक है कि विशेष कानूनों की प्रक्रियाओं को भी BNSS की मूल भावना के अनुरूप समन्वित किया जाए।

 11. न्यायिक व्याख्या की संभावनाएँ

आने वाले समय में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 5 की व्याख्या की जाएगी, विशेषकर –

  • BNSS और विशेष कानूनों के बीच टकराव की स्थिति में
  • और यह तय करने के लिए कि कौन-सी प्रक्रिया प्रधान होगी।

 निष्कर्ष

BNSS, 2023 की धारा 5 भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का प्रवेश द्वार (Gateway Provision) है। यह स्पष्ट करती है कि –

  • प्रक्रिया का मूल कानून BNSS है,
  • लेकिन विशेष कानूनों की विशिष्ट प्रक्रियाएँ सुरक्षित रहेंगी।

इस प्रकार धारा 5 एकरूपता, स्पष्टता और संतुलन का प्रतीक है और भारत में एक आधुनिक, प्रभावी तथा नागरिक-अनुकूल आपराधिक न्याय प्रणाली की नींव रखती है।

निष्कर्षतः, यदि BNS अपराधों की आत्मा है, तो BNSS की धारा 5 उसकी प्रक्रिया की धड़कन है।