न्याय बनाम सार्वजनिक अपमान: इलाहाबाद उच्च न्यायालय का ‘तख्ती’ वाली सजा को रद्द करने का ऐतिहासिक फैसला
प्रस्तावना: अनोखी सजा और कानूनी बहस
न्यायपालिका का मूल उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है—और न्याय का अर्थ है कानून, संवैधानिक मूल्यों तथा मानवीय गरिमा के बीच संतुलन। हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने एक ऐसे आदेश को रद्द कर दिया, जिसने ‘रचनात्मक सजा’ और ‘सार्वजनिक अपमान’ के बीच की महीन रेखा पर गंभीर बहस छेड़ दी।
मामला उस निर्देश से जुड़ा था, जिसमें एक निष्कासित (rusticated) विश्वविद्यालय छात्र को 30 दिनों तक प्रतिदिन 30 मिनट विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर हाथ में एक तख्ती लेकर खड़ा रहने का आदेश दिया गया था। तख्ती पर लिखना था—“मैं कभी किसी लड़की के साथ दुर्व्यवहार नहीं करूंगा।” प्रथम दृष्टया यह आदेश सुधारात्मक प्रतीत हो सकता था, परंतु खंडपीठ ने इसे संवैधानिक गरिमा के प्रतिकूल मानते हुए रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि: ‘रचनात्मक’ दंड या अपमान?
यह मामला विश्वविद्यालय में कथित अनुशासनहीनता और दुर्व्यवहार से संबंधित था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्र को निष्कासित कर दिया। जब छात्र ने इस कार्रवाई को चुनौती दी, तो मामला एकल न्यायाधीश के समक्ष पहुँचा।
एकल न्यायाधीश ने निष्कासन को बरकरार रखते हुए छात्र को आत्मचिंतन और सार्वजनिक संदेश के उद्देश्य से उक्त तख्ती लेकर खड़े होने का निर्देश दिया। इस आदेश के पीछे संभवतः यह सोच थी कि छात्र में अपराधबोध उत्पन्न होगा और अन्य छात्रों को भी चेतावनी मिलेगी।
किन्तु छात्र ने इस निर्देश को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी। यहीं से प्रश्न उठा—क्या सुधार के नाम पर किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना न्यायसंगत है?
संवैधानिक दृष्टिकोण: अनुच्छेद 21 और गरिमा का अधिकार
खंडपीठ ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें “गरिमा के साथ जीने का अधिकार” भी अंतर्निहित है।
किसी व्यक्ति ने यदि अनुशासनहीनता की है, तो उस पर दंडात्मक या प्रशासनिक कार्रवाई हो सकती है। परंतु उसे सार्वजनिक रूप से खड़ा कर पश्चाताप का प्रदर्शन करवाना उसकी मानवीय गरिमा को ठेस पहुँचा सकता है। न्यायालय ने माना कि यह आदेश सुधार की अपेक्षा सामाजिक अपमान की श्रेणी में आता है।
सार्वजनिक अपमान (Public Shaming) की अवधारणा आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र में स्वीकार्य दंड पद्धति नहीं मानी जाती। दंड का उद्देश्य व्यक्ति को समाज से अलग करना नहीं, बल्कि उसे समाज में पुनः स्थापित करना होना चाहिए।
सजा की वैधानिकता और न्यायिक सीमाएँ
खंडपीठ ने यह भी कहा कि अदालतों की शक्तियाँ असीमित नहीं हैं। न्यायालय सजा का निर्धारण करते समय विधिक प्रावधानों के भीतर ही रह सकते हैं। यदि किसी विशेष कानून—चाहे वह भारतीय दंड संहिता/भारतीय न्याय संहिता हो या विश्वविद्यालय की आंतरिक नियमावली—में ऐसी सजा का प्रावधान नहीं है, तो अदालतें अपनी रचनात्मकता के नाम पर अपमानजनक दंड नहीं दे सकतीं।
न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का उद्देश्य अधिकारों का संरक्षण है, न कि नए प्रकार की सामाजिक नजीरें स्थापित करना जो व्यक्ति की गरिमा को आहत करें।
सुधारात्मक न्याय बनाम प्रतिशोधात्मक न्याय
आधुनिक आपराधिक न्यायशास्त्र “प्रतिशोधात्मक न्याय” (Retributive Justice) की तुलना में “सुधारात्मक न्याय” (Reformative Justice) को अधिक महत्व देता है। सुधारात्मक न्याय इस विचार पर आधारित है कि अपराधी या दोषी व्यक्ति को सुधार का अवसर दिया जाना चाहिए।
खंडपीठ ने संकेत दिया कि यदि छात्र के व्यवहार में सुधार लाना उद्देश्य था, तो उसे परामर्श (Counseling), सामुदायिक सेवा, पुस्तकालय में कार्य, या लैंगिक संवेदनशीलता से संबंधित कार्यशालाओं में भाग लेने का निर्देश दिया जा सकता था। ये उपाय शिक्षाप्रद होते और उसकी गरिमा भी सुरक्षित रहती।
सार्वजनिक तख्ती लेकर खड़ा होना, इसके विपरीत, उसे सामाजिक रूप से कलंकित कर सकता था—जो दीर्घकालिक मानसिक प्रभाव छोड़ सकता है।
मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव
सार्वजनिक अपमान का प्रभाव केवल उस क्षण तक सीमित नहीं रहता। विश्वविद्यालय परिसर जैसे संवेदनशील वातावरण में, जहाँ युवा अपनी पहचान और आत्मविश्वास का निर्माण करते हैं, सार्वजनिक प्रदर्शन व्यक्ति में गहरी हीन भावना या विद्रोह पैदा कर सकता है।
खंडपीठ का मत था कि शिक्षा संस्थानों का वातावरण सुधार और संवेदनशीलता को प्रोत्साहित करने वाला होना चाहिए, न कि भय और अपमान पर आधारित।
न्यायपालिका के लिए संदेश
यह निर्णय न्यायिक संस्थाओं के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। हाल के वर्षों में कई मामलों में अदालतों ने पौधे लगाने, धार्मिक ग्रंथ पढ़ने, रक्तदान करने, या सार्वजनिक सेवा करने जैसे “रचनात्मक” आदेश दिए हैं। यद्यपि इनमें से कई आदेश समाजोपयोगी रहे हैं, परंतु हर मामले में यह देखना आवश्यक है कि कहीं दंड अपमान का रूप तो नहीं ले रहा।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि रचनात्मकता और अपमान के बीच स्पष्ट रेखा है—और न्यायालयों को इस रेखा का सम्मान करना चाहिए।
छात्रों और समाज के लिए संदेश
यह निर्णय यह नहीं कहता कि अनुशासनहीनता को नजरअंदाज किया जाए। बल्कि यह कहता है कि दंड मानवीय और विधिसम्मत होना चाहिए।
- छात्रों के लिए: अनुशासन और सम्मान अनिवार्य हैं, लेकिन यदि गलती हो जाए तो सुधार का अवसर गरिमापूर्ण ढंग से मिलना चाहिए।
- संस्थानों के लिए: दंड का उद्देश्य शिक्षाप्रद होना चाहिए, अपमानजनक नहीं।
- समाज के लिए: संवैधानिक लोकतंत्र में न्याय का अर्थ प्रतिशोध नहीं, संतुलन है।
निष्कर्ष: संतुलन ही सच्चा न्याय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय न्यायशास्त्र में गरिमा और सुधारात्मक दृष्टिकोण की पुनः पुष्टि करता है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी व्यक्ति—चाहे वह दोषी ही क्यों न हो—को सार्वजनिक अपमान का पात्र नहीं बनाया जा सकता।
छात्र को तख्ती लेकर खड़े होने के आदेश से मुक्त करना उसकी गलती को नकारना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि न्याय का उद्देश्य व्यक्ति को तोड़ना नहीं, बल्कि उसे सुधारना और समाज में पुनर्स्थापित करना है।
अंततः, न्याय वही है जो कानून की सीमाओं में रहते हुए मानवीय गरिमा की रक्षा करे। जब दंड और करुणा के बीच संतुलन स्थापित होता है, तभी न्याय अपने वास्तविक अर्थ में साकार होता है।