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‘सहयोग पोर्टल’ और डिजिटल सेंसरशिप का संवैधानिक विमर्श: कुणाल कामरा बनाम भारत — बॉम्बे हाईकोर्ट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परीक्षा

‘सहयोग पोर्टल’ और डिजिटल सेंसरशिप का संवैधानिक विमर्श: कुणाल कामरा बनाम भारत — बॉम्बे हाईकोर्ट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परीक्षा

प्रस्तावना: डिजिटल युग में ‘सत्य’ का स्वामित्व किसके पास?

       डिजिटल भारत में सूचना की गति प्रकाश से भी तेज हो चुकी है। सोशल मीडिया मंचों पर प्रतिदिन लाखों पोस्ट, वीडियो और टिप्पणियाँ प्रसारित होती हैं। ऐसे परिवेश में सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों में 2025 में संशोधन कर “सहयोग पोर्टल” की शुरुआत की। आधिकारिक तर्क यह है कि यह मंच “भ्रामक सूचना” (Misinformation) और “फेक न्यूज” पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करेगा।

      परंतु जब राज्य स्वयं यह तय करने लगे कि क्या ‘सत्य’ है और क्या ‘भ्रामक’, तब संवैधानिक प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यही विवाद अब बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष है, जहाँ कुणाल कामरा ने संशोधित नियम 3(1)(d) और सहयोग पोर्टल की वैधता को चुनौती दी है।


1. नियम 3(1)(d) का 2025 संशोधन: कानूनी ढाँचे में बदलाव

     आईटी नियम, 2021 के अंतर्गत मध्यस्थ (Intermediaries) — जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म — को “Due Diligence” का पालन करना होता है। 2025 संशोधन के बाद यदि सहयोग पोर्टल के माध्यम से किसी सामग्री को “झूठा” या “भ्रामक” चिह्नित किया जाता है, तो प्लेटफॉर्म पर उसे हटाने का दायित्व उत्पन्न हो सकता है।

विवाद के मुख्य बिंदु:

  • अनिवार्य निष्कासन का दबाव: यदि सरकारी तंत्र किसी पोस्ट को ‘भ्रामक’ घोषित करे, तो प्लेटफॉर्म को उसे हटाने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
  • अस्पष्ट परिभाषा: “भ्रामक सूचना” की सटीक कानूनी परिभाषा का अभाव है।
  • कार्यपालिका का प्रभुत्व: सरकार स्वयं आलोचना से संबंधित सामग्री पर निर्णय ले, तो निष्पक्षता पर प्रश्न उठता है।

यहाँ Nemo judex in causa sua का सिद्धांत महत्वपूर्ण हो जाता है — कोई भी व्यक्ति या संस्था अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकती।


2. अनुच्छेद 19(1)(a) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। हालाँकि अनुच्छेद 19(2) के तहत “युक्तिसंगत प्रतिबंध” लगाए जा सकते हैं — जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार इत्यादि — परंतु वे प्रतिबंध स्पष्ट, संकीर्ण और न्यायिक परीक्षण के अधीन होने चाहिए।

याचिका में यह तर्क दिया गया है कि सहयोग पोर्टल:

  1. Chilling Effect उत्पन्न करेगा — नागरिक आलोचना करने से पहले डरेंगे।
  2. आत्म-सेंसरशिप को बढ़ावा देगा।
  3. असहमति और दुष्प्रचार के बीच की रेखा धुंधली करेगा।

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना देशद्रोह नहीं, बल्कि नागरिक कर्तव्य का हिस्सा माना जाता है।


3. श्रेयस सिंघल बनाम भारत सरकार: ऐतिहासिक संदर्भ

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी अधिनियम की धारा 66A को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा था कि अस्पष्ट और व्यापक शब्दावली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करती है।

उस निर्णय की मूल भावना थी — राज्य को आलोचना से असुविधा हो सकती है, परंतु असहमति को अपराध नहीं बनाया जा सकता।

यदि सहयोग पोर्टल के माध्यम से सामग्री हटाने की प्रक्रिया न्यायिक निगरानी के बिना संचालित होती है, तो यह श्रेयस सिंघल फैसले की आत्मा के विपरीत प्रतीत हो सकती है।


4. प्राकृतिक न्याय और प्रक्रिया का प्रश्न

किसी भी सामग्री को हटाने से पहले क्या:

  • कंटेंट निर्माता को नोटिस दिया जाएगा?
  • उसे अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा?
  • अपील की स्वतंत्र व्यवस्था उपलब्ध होगी?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है, तो यह प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।

प्राकृतिक न्याय के दो प्रमुख सिद्धांत हैं:

  1. Audi alteram partem — दूसरे पक्ष को सुनो।
  2. Nemo judex in causa sua — निष्पक्ष न्यायाधीश।

सहयोग पोर्टल की आलोचना का मूल यही है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायिक रूप से संतुलित नहीं दिखती।


5. बॉम्बे हाईकोर्ट का पूर्व दृष्टिकोण

पूर्व में आईटी नियमों से संबंधित “फैक्ट चेक यूनिट” (FCU) के मुद्दे पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सरकार की शक्तियों पर प्रश्न उठाए थे। न्यायालय ने संकेत दिया था कि सरकार को “सत्य का अंतिम निर्णायक” नहीं बनाया जा सकता।

इसी पृष्ठभूमि में वर्तमान याचिका और अधिक संवेदनशील हो जाती है। न्यायालय को यह तय करना है कि क्या कार्यपालिका की भूमिका नियामक तक सीमित रहेगी या वह निर्णायक भी बनेगी।


6. अधिवक्ता के लिए रणनीतिक महत्व

डिजिटल अपराध और सोशल मीडिया से जुड़े मुकदमों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। ऐसे मामलों में:

  • “आलोचना” और “भ्रामक सूचना” के बीच अंतर स्पष्ट करना आवश्यक होगा।
  • अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 14 (समानता) का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा।
  • श्रेयस सिंघल निर्णय का हवाला बचाव की रणनीति का आधार बन सकता है।

एक अधिवक्ता का कर्तव्य केवल अपने मुवक्किल की रक्षा करना नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना भी है।


7. व्यवसायिक दृष्टिकोण: संतुलन की आवश्यकता

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ब्रांड की प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण है। यदि किसी कंपनी के विरुद्ध झूठी जानकारी फैलाई जाती है, तो ऐसा पोर्टल संरक्षण दे सकता है।

परंतु यदि नीति-आलोचना को भी “भ्रामक” कहकर हटाया जाए, तो यह व्यावसायिक स्वतंत्रता पर प्रहार होगा।

इसलिए यह तंत्र एक दोधारी तलवार है — सुरक्षा और नियंत्रण के बीच संतुलन आवश्यक है।


8. व्यापक लोकतांत्रिक प्रभाव

यदि न्यायालय सहयोग पोर्टल को पूर्ण वैधता देता है, तो भविष्य में सरकारें डिजिटल सामग्री पर अधिक नियंत्रण स्थापित कर सकती हैं।

यदि इसे असंवैधानिक घोषित किया जाता है, तो यह डिजिटल स्वतंत्रता के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।

यह निर्णय केवल एक पोर्टल का नहीं, बल्कि डिजिटल लोकतंत्र के भविष्य का निर्धारण करेगा।


निष्कर्ष: संतुलन की कसौटी पर न्यायपालिका

कुणाल कामरा बनाम भारत सरकार का मामला इस मूल प्रश्न को सामने लाता है — क्या राज्य को यह अधिकार होना चाहिए कि वह ऑनलाइन विमर्श का निर्णायक बने?

लोकतंत्र की आत्मा असहमति में बसती है। यदि आलोचना को ‘भ्रामक’ कहकर दबाया जाए, तो यह संवैधानिक ढांचे के लिए खतरा हो सकता है।

अब निगाहें बॉम्बे हाईकोर्ट पर हैं। उसका निर्णय यह तय करेगा कि भारत का डिजिटल भविष्य खुली बहस और स्वतंत्र विचारों का मंच रहेगा, या प्रशासनिक पोर्टलों के माध्यम से नियंत्रित अभिव्यक्ति का युग आरंभ होगा।

संविधान की कसौटी स्पष्ट है — स्वतंत्रता मूल है, प्रतिबंध अपवाद।
न्यायपालिका को इसी सिद्धांत के आधार पर संतुलन स्थापित करना होगा।