PMLA और न्याय का सिद्धांत: अपील लंबित रहने पर जब्ती पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट रोक – शक्ति संतुलन, प्रक्रिया की पवित्रता और अभियुक्त अधिकारों की पुनर्स्थापना
प्रस्तावना
भारत में आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए बनाया गया धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (Prevention of Money Laundering Act – PMLA) एक सख्त कानून माना जाता है। इस अधिनियम के अंतर्गत जांच एजेंसियों को संपत्ति कुर्क करने, उसे जब्त करने तथा अभियुक्तों को कठोर दंड देने की व्यापक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।
इसी पृष्ठभूमि में, Supreme Court of India द्वारा 6 फरवरी 2026 को दिया गया निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि संपत्ति की कुर्की (Attachment) की पुष्टि के विरुद्ध अपील उच्च मंच पर लंबित है, तो विशेष अदालत उस संपत्ति की जब्ती (Confiscation) का आदेश पारित नहीं कर सकती।
यह फैसला केवल PMLA की धारा 8 की व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में न्याय, निष्पक्षता, प्रक्रिया की पवित्रता और शक्ति संतुलन की अवधारणा को पुनर्स्थापित करता है।
PMLA का उद्देश्य और प्रकृति
PMLA का मूल उद्देश्य “अपराध की आय” (Proceeds of Crime) को वैध अर्थव्यवस्था से बाहर करना और धन शोधन जैसी गतिविधियों पर अंकुश लगाना है।
यह कानून दो प्रमुख लक्ष्यों पर आधारित है—
- अपराध से अर्जित संपत्ति को जब्त करना
- अपराधियों को दंडित करना
किन्तु इन उद्देश्यों की प्राप्ति के दौरान संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों, विशेषकर अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सम्मान किया जाना अनिवार्य है।
संपत्ति से संबंधित प्रक्रिया का ढांचा
PMLA के अंतर्गत संपत्ति से संबंधित कार्यवाही बहु-स्तरीय (multi-layered) है—
- धारा 5 – Enforcement Directorate द्वारा अस्थायी कुर्की
- धारा 8(3) – निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) द्वारा कुर्की की पुष्टि
- धारा 26 – इस पुष्टि के विरुद्ध अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Tribunal) में अपील
- धारा 8(7) – विशेष अदालत द्वारा अंतिम जब्ती
यह ढांचा यह दर्शाता है कि जब्ती अंतिम चरण है, न कि प्रारंभिक या मध्यवर्ती।
विवाद का मूल प्रश्न
मुख्य प्रश्न यह था—
क्या धारा 8(7) के अंतर्गत विशेष अदालत तब भी संपत्ति की जब्ती कर सकती है, जब धारा 8(3) के अंतर्गत कुर्की की पुष्टि के विरुद्ध अपील लंबित हो?
जांच एजेंसियों का तर्क था कि धारा 8(7) स्वतंत्र शक्ति प्रदान करती है।
जबकि अभियुक्त पक्ष का कहना था कि अपील लंबित रहते हुए जब्ती करना अपील के अधिकार को निष्प्रभावी कर देगा।
सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि
न्यायालय ने इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक दिया और तीन मूल सिद्धांत प्रतिपादित किए—
1. अपील का अधिकार – केवल औपचारिक नहीं, बल्कि वास्तविक
न्यायालय ने कहा कि जब कानून किसी व्यक्ति को अपील का अधिकार देता है, तो वह अधिकार केवल कागजी नहीं होता।
यदि अपील लंबित रहते हुए संपत्ति जब्त कर ली जाए, तो अपील का कोई वास्तविक मूल्य नहीं बचेगा। यह संविधान की भावना के विपरीत होगा।
2. “विहित रोक” (Deemed Embargo) का सिद्धांत
पीठ ने माना कि जैसे ही धारा 26 के तहत अपील दाखिल होती है, वैसे ही धारा 8(7) के अंतर्गत जब्ती की कार्यवाही पर स्वतः रोक मानी जाएगी।
अर्थात्—
पहले यह तय हो कि कुर्की वैध है या नहीं,
उसके बाद ही जब्ती संभव होगी।
3. सीमित क्षेत्राधिकार (Limited Jurisdiction)
विशेष अदालत उन मुद्दों पर निर्णय नहीं दे सकती, जो अपीलीय न्यायाधिकरण के विचाराधीन हैं।
अन्यथा यह न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) का उल्लंघन होगा।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत
यह निर्णय दो महत्वपूर्ण सिद्धांतों को पुनर्जीवित करता है—
- Audi Alteram Partem – दोनों पक्षों को सुने बिना निर्णय नहीं
- Nemo Judex in Causa Sua – कोई भी अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं
अपील लंबित रहते हुए जब्ती इन दोनों सिद्धांतों का उल्लंघन करती।
अभियुक्तों के लिए राहत
यह फैसला विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिए राहतकारी है जिनकी संपत्ति वर्षों तक कुर्क रहती है और जिनका मुकदमा लंबा चलता है।
अब यह सुनिश्चित होगा कि—
- व्यक्ति अपनी संपत्ति से स्थायी रूप से वंचित न हो
- जब तक अंतिम निर्णय न हो जाए
जांच एजेंसियों पर प्रभाव
इस निर्णय के बाद जांच एजेंसियों को—
- मजबूत साक्ष्य एकत्र करने होंगे
- केवल कुर्की के आधार पर जल्दबाजी में जब्ती नहीं कर सकेंगी
यह प्रवृत्ति “पहले कुर्की, बाद में सबूत” वाली संस्कृति पर रोक लगाएगी।
विशेष अदालतों की भूमिका में स्पष्टता
अब विशेष अदालतों को यह देखना अनिवार्य होगा कि—
- क्या कुर्की की पुष्टि के विरुद्ध अपील लंबित है?
यदि हाँ, तो जब्ती का आदेश पारित नहीं किया जा सकता।
कानून के शासन की पुनर्स्थापना
यह निर्णय दर्शाता है कि—
अपराध से लड़ाई कानून के भीतर रहकर ही लड़ी जानी चाहिए।
राज्य चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे भी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
अंतरराष्ट्रीय मानकों से सामंजस्य
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुसार भी किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से स्थायी रूप से वंचित करने से पहले निष्पक्ष सुनवाई आवश्यक है।
यह फैसला भारत को उन मानकों के और करीब लाता है।
भविष्य की दिशा
- अपीलीय न्यायाधिकरण की भूमिका और मजबूत होगी
- PMLA की व्याख्या अधिक संतुलित होगी
- अभियोजन और बचाव पक्ष के बीच प्रक्रिया-आधारित संतुलन बनेगा
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय केवल PMLA की एक धारा की व्याख्या नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था की आत्मा को प्रतिबिंबित करता है।
यह स्पष्ट संदेश देता है कि—
जब तक कुर्की की वैधता पर अंतिम मुहर नहीं लगती, तब तक संपत्ति की जब्ती नहीं हो सकती।
यही इस ऐतिहासिक फैसले का सार, उद्देश्य और संदेश है।
नीचे इस निर्णय से जुड़े 5 महत्वपूर्ण प्रश्न–उत्तर (Q&A) प्रस्तुत हैं, जो परीक्षा और सामान्य अध्ययन दोनों दृष्टि से उपयोगी हैं—
प्रश्न 1:
हालिया निर्णय में Supreme Court of India ने PMLA की किस धारा की व्याख्या की है?
उत्तर:
सुप्रीम कोर्ट ने धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 की धारा 8, विशेष रूप से धारा 8(3) और 8(7) की व्याख्या की है।
प्रश्न 2:
यदि कुर्की (Attachment) की पुष्टि के विरुद्ध अपील लंबित हो, तो विशेष अदालत क्या जब्ती (Confiscation) का आदेश दे सकती है?
उत्तर:
नहीं। अपील लंबित रहने की स्थिति में विशेष अदालत संपत्ति की जब्ती का आदेश नहीं दे सकती।
प्रश्न 3:
इस निर्णय में “विहित रोक” (Deemed Embargo) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जैसे ही कुर्की की पुष्टि के खिलाफ अपील दायर होती है, वैसे ही जब्ती की कार्यवाही पर स्वतः रोक लग जाती है।
प्रश्न 4:
इस निर्णय से अभियुक्तों को क्या प्रमुख लाभ प्राप्त हुआ?
उत्तर:
अभियुक्तों के संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा हुई और यह सुनिश्चित हुआ कि अंतिम निर्णय से पहले उनकी संपत्ति स्थायी रूप से सरकार के पक्ष में न जाए।
प्रश्न 5:
इस फैसले का जांच एजेंसियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
Enforcement Directorate सहित सभी जांच एजेंसियों को मजबूत साक्ष्यों के आधार पर कार्यवाही करनी होगी और अपील लंबित रहते हुए जब्ती से बचना होगा।