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भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 9: “संख्या” की परिभाषा और आपराधिक कानून में इसकी विधिक एवं व्यावहारिक भूमिका

भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 9: “संख्या” की परिभाषा और आपराधिक कानून में इसकी विधिक एवं व्यावहारिक भूमिका

       भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली समय-समय पर सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी परिवर्तनों के अनुरूप विकसित होती रही है। इसी विकासक्रम में वर्ष 2023 में भारतीय न्याय संहिता (BNS) को लागू किया गया, जिसने 160 वर्ष पुरानी भारतीय दंड संहिता, 1860 का स्थान लिया। इस परिवर्तन का उद्देश्य केवल पुराने कानून को बदलना नहीं था, बल्कि उसे अधिक स्पष्ट, आधुनिक और न्यायोन्मुख बनाना भी था।

BNS की प्रारंभिक धाराएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे पूरी संहिता की व्याख्या और अनुप्रयोग की दिशा तय करती हैं। इन्हीं प्रारंभिक धाराओं में से एक है धारा 9, जो “संख्या” (Number) की परिभाषा से संबंधित है। देखने में यह धारा साधारण प्रतीत होती है, परंतु इसके बिना किसी भी आपराधिक कानून की प्रभावी व्याख्या संभव नहीं हो सकती।

यह लेख धारा 9 की अवधारणा, उद्देश्य, व्यावहारिक उपयोग, न्यायिक महत्व तथा IPC से इसकी तुलना का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है।


1. भारतीय न्याय संहिता, 2023 का संक्षिप्त परिचय

भारतीय न्याय संहिता, 2023 का उद्देश्य एक ऐसी आपराधिक संहिता प्रदान करना है जो सरल भाषा में लिखी हो, आधुनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखे और न्याय को प्राथमिकता दे। इसमें कई नए अपराधों को जोड़ा गया है, कुछ पुराने अपराधों की परिभाषा बदली गई है और कई प्रक्रियात्मक सुधार किए गए हैं।

हालाँकि, विधायिका ने यह भी ध्यान रखा कि जिन सिद्धांतों ने वर्षों तक न्याय व्यवस्था को स्थिरता प्रदान की है, उन्हें समाप्त न किया जाए। धारा 9 इसी सोच का उदाहरण है, जिसे लगभग उसी रूप में रखा गया है जैसा कि IPC में था।


2. धारा 9 का मूल प्रावधान

धारा 9 के अनुसार—

यदि किसी विधिक प्रावधान में किसी शब्द का प्रयोग एकवचन में किया गया है, तो उसका अर्थ बहुवचन भी माना जाएगा।
इसी प्रकार, यदि किसी शब्द का प्रयोग बहुवचन में किया गया है, तो वह एकवचन के लिए भी लागू होगा।

यह नियम तब तक प्रभावी रहेगा, जब तक कि संदर्भ से इसके विपरीत कोई आशय स्पष्ट न हो।

सरल शब्दों में, कानून यह मानता है कि शब्दों का प्रयोग लचीले ढंग से किया जाएगा ताकि न्याय के उद्देश्य की पूर्ति हो सके।


3. धारा 9 को शामिल करने की आवश्यकता

कानून का मूल उद्देश्य न्याय प्रदान करना है, न कि शब्दों के तकनीकी अर्थों में उलझकर विवाद पैदा करना। यदि प्रत्येक धारा में यह स्पष्ट करना पड़े कि वह एक व्यक्ति पर लागू है या अनेक व्यक्तियों पर, तो संहिता अत्यधिक जटिल हो जाएगी।

धारा 9 इस समस्या का समाधान करती है। यह विधायिका को यह सुविधा देती है कि वह संक्षिप्त भाषा में व्यापक अर्थ व्यक्त कर सके।


4. कानूनी भाषा में सरलता और स्पष्टता

कानूनी भाषा सामान्यतः कठिन मानी जाती है। BNS का एक प्रमुख लक्ष्य इस धारणा को बदलना है। धारा 9 इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देती है, क्योंकि यह शब्दों की गणना-आधारित व्याख्या से बचाती है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी धारा में “व्यक्ति” शब्द लिखा है, तो उसे केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं माना जाएगा, बल्कि आवश्यकता अनुसार कई व्यक्तियों तक विस्तारित किया जा सकेगा।


5. व्यावहारिक उदाहरणों द्वारा धारा 9 की समझ

(क) चोरी का अपराध

यदि कानून कहता है— “जो व्यक्ति चोरी करता है, वह दंडित होगा।”
तो इसका अर्थ यह नहीं कि केवल अकेले चोरी करने वाला ही दंडित होगा। यदि पाँच लोग मिलकर चोरी करते हैं, तो वे सभी उसी धारा के अंतर्गत दोषी होंगे।

(ख) मारपीट का अपराध

यदि धारा में लिखा है— “जो व्यक्ति किसी को चोट पहुँचाता है…”
तो इसका अर्थ यह भी होगा कि कई व्यक्तियों द्वारा मिलकर की गई मारपीट भी उसी धारा में आएगी।

(ग) पीड़ितों की संख्या

यदि कानून किसी “व्यक्ति के विरुद्ध अपराध” की बात करता है, तो वह कई व्यक्तियों के विरुद्ध किए गए अपराध पर भी लागू होगा।


6. IPC से तुलना

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 9 भी इसी सिद्धांत को अपनाती थी। BNS ने उसी सिद्धांत को बनाए रखा है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि विधायिका ने उन सिद्धांतों को संरक्षित किया है जो समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं।


7. न्यायालयों की दृष्टि में धारा 9

भारतीय न्यायालयों ने समय-समय पर यह माना है कि कानून की व्याख्या करते समय उद्देश्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

धारा 9 न्यायालयों को यह आधार देती है कि वे तकनीकी आधार पर न्याय से समझौता न करें।


8. धारा 9 और न्याय का सिद्धांत

न्याय का मूल सिद्धांत यह है कि कोई भी दोषी व्यक्ति केवल शब्दों की तकनीकी व्याख्या के कारण बच न सके और कोई निर्दोष व्यक्ति केवल शब्दों की संकीर्ण व्याख्या के कारण दंडित न हो।

धारा 9 इसी संतुलन को बनाए रखने में सहायक है।


9. अपवाद (Exception)

यदि किसी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया हो कि वह केवल “एक व्यक्ति” पर लागू होगी या केवल “समूह” पर, तो धारा 9 का सामान्य नियम लागू नहीं होगा।


10. परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • धारा 9 एक व्याख्यात्मक धारा है।
  • यह पूरी BNS पर लागू होती है।
  • यह IPC की धारा 9 के समान है।
  • यह कानूनी भाषा को सरल बनाती है।

11. समकालीन प्रासंगिकता

आज के समय में कई अपराध संगठित रूप से किए जाते हैं। धारा 9 यह सुनिश्चित करती है कि ऐसे अपराधों में सभी सहभागी व्यक्ति कानून के दायरे में आएँ।


12. निष्कर्ष

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 9 यह सुनिश्चित करती है कि कानून की व्याख्या संकीर्ण न होकर न्यायोन्मुख हो। यह धारा भले ही आकार में छोटी हो, परंतु इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक है।

अंततः कहा जा सकता है कि धारा 9 कानून की भाषा को मानवीय बनाती है और न्याय के उद्देश्य को सुदृढ़ करती है।