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न्याय की प्रतीक्षा में बचपन: इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार और किशोर न्याय प्रणाली की जमीनी सच्चाई

न्याय की प्रतीक्षा में बचपन: इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार और किशोर न्याय प्रणाली की जमीनी सच्चाई

प्रस्तावना: जब सुधार गृह स्वयं सुधार की प्रतीक्षा में हों

किसी सभ्य समाज की पहचान उसके बच्चों की स्थिति से होती है—विशेषकर उन बच्चों से, जो किसी कारणवश कानून के दायरे में आ गए हैं। हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को किशोर न्याय प्रणाली की बदहाल स्थिति को लेकर कठोर टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि राज्य स्वयं यह स्वीकार करता है कि बुनियादी ढांचे की भारी कमी है, तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि संवैधानिक उत्तरदायित्व का प्रश्न है।

यह टिप्पणी उन हजारों बच्चों की ओर ध्यान आकर्षित करती है, जो सुधार और पुनर्वास की आशा में राज्य की संरक्षण प्रणाली में रह रहे हैं।


मामला: स्वीकारोक्ति जिसने व्यवस्था पर सवाल खड़े किए

न्यायालय में दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने हलफनामे में स्वीकार किया कि किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक संसाधन और संरचनाएँ पर्याप्त नहीं हैं।

स्वीकार की गई कमियों में शामिल हैं:

  • कई जिलों में किशोर न्याय बोर्ड (JJB) के लिए स्थायी भवनों का अभाव
  • बाल कल्याण समितियों (CWC) के लिए अपर्याप्त कार्यालय
  • प्रेक्षण गृहों की जर्जर स्थिति
  • प्रशिक्षित परामर्शदाताओं और मनोवैज्ञानिकों की कमी
  • क्षमता से अधिक बच्चों का एक ही गृह में रहना

अदालत ने इस स्थिति को “अत्यंत चिंताजनक” बताते हुए पूछा कि जब कानून पुनर्वास की बात करता है, तो उसके लिए आवश्यक आधारभूत संरचना क्यों नहीं है?


जेजे एक्ट, 2015: सिद्धांत और व्यवहार का अंतर

2015 का यह अधिनियम एक मानवीय दृष्टिकोण अपनाता है। इसका मूल विचार यह है कि कानून का उल्लंघन करने वाला बच्चा अपराधी नहीं, बल्कि “सुधार और संरक्षण की आवश्यकता वाला बालक” है।

अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य हैं:

  1. पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापन
  2. शिक्षा और कौशल विकास
  3. मानसिक स्वास्थ्य सहायता
  4. परिवार आधारित पुनर्वास को प्राथमिकता

किन्तु व्यवहार में स्थिति भिन्न दिखाई देती है। कई प्रेक्षण गृहों में स्वच्छता की स्थिति खराब है। बच्चों के लिए अलग-अलग आयु समूहों के अनुसार व्यवस्था नहीं है। चिकित्सा सुविधाएँ सीमित हैं। शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण का अभाव है।

जब सुधार गृहों में सुधार की मूलभूत शर्तें ही पूरी न हों, तो अधिनियम का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।


बुनियादी ढांचे की कमी: केवल प्रशासनिक नहीं, संवैधानिक प्रश्न

1. अनुच्छेद 21 का उल्लंघन

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यह केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं, बल्कि गरिमामय जीवन का अधिकार भी है। यदि बच्चों को अमानवीय परिस्थितियों में रखा जाता है, तो यह उनके मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है।

2. पुनर्वास की विफलता

यदि किसी बालक को शिक्षा, परामर्श और कौशल प्रशिक्षण नहीं मिलेगा, तो उसके पुनर्वास की संभावना कमजोर हो जाएगी। परिणामस्वरूप वह समाज में पुनः समायोजित होने में असफल हो सकता है।

3. न्यायिक विलंब

कई जिलों में किशोर न्याय बोर्डों में सदस्यों की कमी और संसाधनों के अभाव के कारण मामलों का समयबद्ध निस्तारण नहीं हो पाता। इससे बच्चे लंबी अवधि तक प्रेक्षण गृहों में रहते हैं—जो सुधार के बजाय दंड जैसा अनुभव बन सकता है।


इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राज्य से पूछा कि:

  • क्या किशोर न्याय प्रणाली के लिए पर्याप्त बजट आवंटित किया गया है?
  • क्या जिला स्तर पर जवाबदेही तय की गई है?
  • क्या समयबद्ध सुधार योजना बनाई गई है?

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अधिनियम बनाना पर्याप्त नहीं है; उसका प्रभावी और मानवीय क्रियान्वयन ही वास्तविक न्याय है।

न्यायपालिका का यह हस्तक्षेप महत्वपूर्ण है, क्योंकि सामाजिक कल्याण से जुड़े विषय अक्सर प्रशासनिक प्राथमिकता सूची में पीछे रह जाते हैं। जब उच्च न्यायालय स्वयं निगरानी करता है, तो सुधार की प्रक्रिया को गति मिल सकती है।


जमीनी सच्चाई: सुधार गृह या अस्थायी निरोध?

कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्ट बताती हैं कि:

  • बच्चों को पर्याप्त व्यक्तिगत ध्यान नहीं मिल पाता
  • परामर्श सत्र नियमित नहीं होते
  • स्टाफ की कमी के कारण निगरानी और मार्गदर्शन प्रभावित होता है
  • बालिकाओं के लिए अलग और सुरक्षित व्यवस्था हर जिले में उपलब्ध नहीं

यह स्थिति बताती है कि सुधार गृहों को केवल “निरोध केंद्र” की तरह नहीं चलाया जा सकता। यदि वातावरण प्रेरक और सहायक नहीं होगा, तो सुधार का उद्देश्य विफल हो जाएगा।


आवश्यक सुधारात्मक कदम

1. बजट में वृद्धि और पारदर्शिता

किशोर न्याय प्रणाली के लिए पृथक और पर्याप्त फंड सुनिश्चित किया जाए। खर्च की पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है।

2. प्रशिक्षित मानव संसाधन

मनोवैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता और परामर्शदाता अनिवार्य रूप से नियुक्त किए जाएँ।

3. नियमित निरीक्षण तंत्र

जिला न्यायाधीशों या स्वतंत्र समितियों द्वारा नियमित निरीक्षण हो।

4. डिजिटलीकरण

मामलों की ऑनलाइन ट्रैकिंग, समय-सीमा की निगरानी और बच्चों की प्रगति का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाए।

5. परिवार आधारित पुनर्वास

जहाँ संभव हो, बच्चों को परिवार या पालक देखरेख में पुनर्स्थापित किया जाए।


व्यापक दृष्टिकोण: समाज की भूमिका

केवल राज्य सरकार को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं। समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। पुनर्वासित बच्चों को अवसर देना, उन्हें कलंकित न करना, और शिक्षा एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है।

एनजीओ, शैक्षणिक संस्थान और उद्योग जगत मिलकर कौशल विकास कार्यक्रम चला सकते हैं। यदि समाज पुनर्वासित बालक को स्वीकार नहीं करेगा, तो सुधार की पूरी प्रक्रिया अधूरी रह जाएगी।


निष्कर्ष: सुधार की दिशा में निर्णायक क्षण

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की टिप्पणी केवल आलोचना नहीं, बल्कि सुधार का अवसर है। राज्य द्वारा अपनी कमियों को स्वीकार करना पहला कदम है, परंतु वास्तविक परिवर्तन तभी होगा जब ठोस कार्यवाही दिखाई दे।

किशोर न्याय प्रणाली का उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि भविष्य संवारना है। यदि सुधार गृहों में ही आशा और अवसर का अभाव होगा, तो हम एक पूरी पीढ़ी के साथ अन्याय कर रहे होंगे।

बचपन को न्याय की प्रतीक्षा में नहीं छोड़ा जा सकता। यह समय है जब नीति, संसाधन और संवेदनशीलता मिलकर एक ऐसी प्रणाली बनाएं, जो वास्तव में “सुधार” को संभव बनाए।