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न्यायपालिका की ‘लक्ष्मण रेखा’: मद्रास हाईकोर्ट की सिफारिशें, गैर-न्यायसंगत क्षेत्र और सुप्रीम कोर्ट का संवैधानिक संदेश

न्यायपालिका की ‘लक्ष्मण रेखा’: मद्रास हाईकोर्ट की सिफारिशें, गैर-न्यायसंगत क्षेत्र और सुप्रीम कोर्ट का संवैधानिक संदेश

प्रस्तावना: न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाम न्यायिक हस्तक्षेप

भारतीय संविधान ने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—को अलग-अलग अधिकार-क्षेत्र प्रदान किए हैं। न्यायपालिका को जहाँ नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा का दायित्व सौंपा गया है, वहीं उसे अपनी आंतरिक स्वायत्तता बनाए रखने का अधिकार भी प्राप्त है।
हालिया निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी संतुलन को पुनः रेखांकित करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि न्यायपालिका के भीतर की कुछ प्रक्रियाएँ ऐसी हैं, जिन पर न्यायिक समीक्षा की अनुमति नहीं दी जा सकती।

मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा नवंबर 2025 में की गई कुछ सिफारिशों को चुनौती देने वाली रिट याचिका को सुनने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत को दोहराया—हर असहमति न्यायिक विवाद नहीं होती।


मामले की पृष्ठभूमि: नवंबर 2025 की सिफारिशें और विवाद

नवंबर 2025 में मद्रास उच्च न्यायालय ने अपनी प्रशासनिक या कॉलेजियम प्रक्रिया के तहत कुछ सिफारिशें की थीं। यद्यपि इन सिफारिशों का स्वरूप सार्वजनिक रूप से विस्तृत नहीं था, लेकिन सामान्यतः ऐसी सिफारिशें निम्नलिखित विषयों से जुड़ी हो सकती हैं—

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति या पदोन्नति
  • स्थानांतरण से संबंधित सुझाव
  • आंतरिक प्रशासनिक नीतियाँ
  • न्यायिक कार्य आवंटन (Roster) या संरचनात्मक बदलाव

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि इन सिफारिशों में प्रक्रियात्मक पारदर्शिता का अभाव है और इससे भविष्य में किसी व्यक्ति या वर्ग के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की गई।


सुप्रीम कोर्ट का रुख: ‘सिफारिश’ बनाम ‘निर्णय’

शीर्ष अदालत ने याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार कर दिया। अदालत का स्पष्ट मत था कि—

“किसी उच्च न्यायालय द्वारा की गई सिफारिश, जब तक अंतिम निर्णय या विधिक आदेश का रूप न ले ले, तब तक वह न्यायिक समीक्षा के योग्य नहीं होती।”

यह टिप्पणी अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा (Lakshman Rekha) को परिभाषित करती है।


‘गैर-न्यायसंगत’ (Non-Justiciable) का संवैधानिक अर्थ

किसी विषय को ‘गैर-न्यायसंगत’ घोषित करने का अर्थ यह नहीं है कि वह अवैध है, बल्कि इसका आशय यह है कि—

  • वह विषय अदालत द्वारा तय किए जाने योग्य नहीं है
  • वह किसी विधिक अधिकार के प्रत्यक्ष उल्लंघन से जुड़ा नहीं है
  • वह नीति, विवेक या आंतरिक प्रक्रिया के दायरे में आता है

सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेखांकित प्रमुख आधार

  1. प्रक्रिया बनाम परिणाम
    सिफारिशें केवल प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं, न कि अंतिम परिणाम। बिना परिणाम के अधिकार-हनन की कल्पना न्यायसंगत नहीं है।
  2. कार्रवाई का कारण (Cause of Action) का अभाव
    केवल आशंका या संभावित नुकसान के आधार पर रिट याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
  3. संस्थागत आत्मसंयम (Institutional Restraint)
    न्यायपालिका स्वयं अपने प्रशासनिक मामलों में अत्यधिक न्यायिक हस्तक्षेप से बचती है।

अनुच्छेद 32 और न्यायिक विवेक

अनुच्छेद 32 को ‘संविधान की आत्मा’ कहा गया है, परंतु यह शक्ति असीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक अवसरों पर कहा है कि—

“हर प्रशासनिक असहमति को मौलिक अधिकार का उल्लंघन मानना अनुच्छेद 32 की गरिमा को कम करता है।”

इस मामले में भी अदालत ने माना कि जब तक सिफारिश किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित न करे, तब तक रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग अनुचित होगा।


पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांत और वर्तमान निर्णय

यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में पहले से स्थापित सिद्धांतों की निरंतरता में है।

एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981)

इस ऐतिहासिक निर्णय में न्यायपालिका की आंतरिक नियुक्ति प्रक्रिया और गोपनीयता पर विस्तार से चर्चा की गई थी। अदालत ने माना था कि—

  • हर आंतरिक विचार-विमर्श सार्वजनिक जांच के लिए नहीं होता
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता गोपनीयता से भी जुड़ी है

एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन केस

कॉलेजियम प्रणाली पर बहस के बावजूद, अदालत ने यह स्वीकार किया कि नियुक्ति संबंधी सिफारिशें तब तक न्यायिक विवाद नहीं बनतीं, जब तक वे अंतिम निर्णय का रूप न ले लें।


शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत और न्यायपालिका

भारतीय संविधान में शक्ति पृथक्करण (Separation of Powers) पूर्ण रूप से कठोर नहीं है, लेकिन कार्यात्मक संतुलन आवश्यक है।
यदि न्यायपालिका—

  • अपनी ही प्रशासनिक प्रक्रियाओं को निरंतर न्यायिक चुनौती के लिए खोल दे
    तो इससे न्यायिक प्रणाली में—
  • अस्थिरता
  • अनिश्चितता
  • और अनावश्यक मुकदमेबाजी

उत्पन्न होगी।


इस निर्णय का व्यापक प्रभाव

1. उच्च न्यायालयों का मनोबल

यह फैसला उच्च न्यायालयों को यह आश्वासन देता है कि उनकी आंतरिक सिफारिशें बिना ठोस कारण के चुनौती का विषय नहीं बनेंगी।

2. मुकदमेबाजी पर अंकुश

ऐसी याचिकाओं पर रोक लगेगी जो केवल अनुमान या संभावनाओं पर आधारित होती हैं।

3. न्यायिक स्पष्टता

अब यह अधिक स्पष्ट हो गया है कि—

  • सिफारिश ≠ निर्णय
  • प्रक्रिया ≠ अधिकार-हनन

आलोचनात्मक दृष्टिकोण: क्या पूर्ण प्रतिरक्षा उचित है?

हालाँकि यह निर्णय संस्थागत स्वायत्तता को मजबूत करता है, लेकिन कुछ विधि विशेषज्ञों का मत है कि—

  • यदि सिफारिशें स्पष्ट रूप से मनमानी या भेदभावपूर्ण हों
  • या संविधान के मूल ढाँचे के विपरीत हों

तो पूर्ण ‘गैर-न्यायसंगत’ का सिद्धांत पुनर्विचार योग्य हो सकता है।
हालाँकि वर्तमान मामले में ऐसा कोई प्रत्यक्ष आधार सामने नहीं आया।


निष्कर्ष: न्यायिक अनुशासन का संतुलित उदाहरण

मद्रास उच्च न्यायालय की नवंबर 2025 की सिफारिशों पर सुप्रीम कोर्ट का रुख यह दर्शाता है कि—

  • न्यायपालिका अधिकारों की रक्षक है, लेकिन
  • वह स्वयं अपनी सीमाओं से भी परिचित है

यह निर्णय लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थागत संतुलन का प्रतीक है।
सिफारिशें बहस का विषय हो सकती हैं, आलोचना का आधार बन सकती हैं, लेकिन हर सिफारिश न्यायालय के कटघरे में खड़ी की जाए—यह न तो संविधान की मंशा है और न ही न्यायिक अनुशासन के अनुरूप।

यही संतुलन भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति है—
जहाँ बोलना ज़रूरी हो, वहाँ बोलना; और जहाँ रुकना ज़रूरी हो, वहाँ रुक जाना।