केवल फ्लैट किराये पर देने से ‘उपभोक्ता’ की परिभाषा से बाहर नहीं होता मालिक: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 2(1)(d) का विधिक विश्लेषण
प्रस्तावना: उपभोक्ता अधिकारों की परिधि और संपत्ति का उपयोग
उपभोक्ता संरक्षण कानून का मूल उद्देश्य उपभोक्ता को शोषण, अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवा में कमी से बचाना है। भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 (अब 2019 अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित) ने “उपभोक्ता” की परिभाषा को व्यापक रूप से परिभाषित किया, ताकि वास्तविक उपयोगकर्ता और लाभार्थी इसके दायरे से बाहर न रह जाएँ।
अचल संपत्ति के क्षेत्र में, विशेष रूप से फ्लैट या अपार्टमेंट के मामलों में, एक महत्वपूर्ण प्रश्न बार-बार न्यायालयों के समक्ष आया है—
क्या कोई फ्लैट मालिक, जो अपने फ्लैट को किराये पर दे देता है, केवल इस आधार पर ‘उपभोक्ता’ की परिभाषा से बाहर हो जाता है?
न्यायिक दृष्टिकोण का उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
केवल फ्लैट को लीज़ या किराये पर देने मात्र से मालिक उपभोक्ता नहीं रह जाता, ऐसा मानना न तो कानूनसम्मत है और न ही उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की भावना के अनुरूप।
धारा 2(1)(d): ‘उपभोक्ता’ की वैधानिक परिभाषा
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 2(1)(d) के अनुसार, उपभोक्ता वह व्यक्ति है—
- जो किसी वस्तु को मूल्य देकर खरीदता है, या
- जो किसी सेवा को मूल्य देकर प्राप्त करता है,
परंतु इसमें वह व्यक्ति शामिल नहीं है जो वस्तु या सेवा को “व्यावसायिक उद्देश्य” (Commercial Purpose) से प्राप्त करता है।
यहीं से विवाद की जड़ उत्पन्न होती है—
क्या फ्लैट को किराये पर देना ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ है?
‘व्यावसायिक उद्देश्य’ की न्यायिक व्याख्या
न्यायालयों ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि “व्यावसायिक उद्देश्य” शब्द का अर्थ हर प्रकार की आय अर्जन गतिविधि नहीं है। इसका तात्पर्य ऐसी गतिविधि से है जो—
- बड़े पैमाने पर हो,
- लाभ कमाने के लिए संगठित व्यापार या व्यवसाय के रूप में संचालित हो,
- और जिसमें व्यक्ति स्वयं उपभोगकर्ता न होकर व्यापारी की भूमिका में हो।
यदि कोई व्यक्ति एक या दो फ्लैट खरीदकर उन्हें किराये पर देता है, तो यह स्वत: व्यावसायिक गतिविधि नहीं बन जाती। यह अक्सर व्यक्तिगत निवेश, पारिवारिक आवश्यकता या भविष्य की सुरक्षा के उद्देश्य से किया गया कार्य होता है।
निर्माता-खरीदार संबंध और उपभोक्ता की स्थिति
फ्लैट खरीदते समय खरीदार और बिल्डर/डेवलपर के बीच संबंध सेवा प्रदाता और उपभोक्ता का होता है। बिल्डर से अपेक्षा की जाती है कि—
- निर्माण गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हो,
- समय पर कब्जा दिया जाए,
- वैधानिक स्वीकृतियाँ प्राप्त हों,
- और मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
यदि इन दायित्वों में कमी रहती है, तो खरीदार को उपभोक्ता मंच का सहारा लेने का अधिकार है।
यह अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं करता कि खरीदार स्वयं फ्लैट में रह रहा है या उसे किराये पर दे दिया है।
किराये पर देना: उपयोग का एक रूप, व्यापार नहीं
किराये पर देना संपत्ति के उपयोग का एक वैध और सामान्य तरीका है। भारतीय सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में यह एक स्वीकृत प्रथा है। न्यायालयों ने माना है कि—
- किराया प्राप्त करना स्वाभाविक आय है,
- यह संपत्ति के संरक्षण और रख-रखाव का साधन है,
- और इसे स्वतः “लाभ कमाने वाला व्यापार” नहीं कहा जा सकता।
यदि हर किराये पर दी गई संपत्ति को व्यावसायिक गतिविधि मान लिया जाए, तो अधिकांश मध्यमवर्गीय संपत्ति मालिक उपभोक्ता संरक्षण कानून से बाहर हो जाएँगे, जो कानून की मंशा के विपरीत होगा।
न्यायिक दृष्टिकोण: मालिक की मंशा और गतिविधि का पैमाना
न्यायालयों ने यह स्पष्ट किया है कि यह देखने के लिए कि कोई व्यक्ति उपभोक्ता है या नहीं, निम्नलिखित बातों पर विचार किया जाना चाहिए—
- खरीद का उद्देश्य
क्या फ्लैट निजी उपयोग/निवेश के लिए खरीदा गया था या बड़े पैमाने पर व्यापार के लिए? - गतिविधि का पैमाना
एक-दो संपत्तियाँ बनाम दर्जनों/सैकड़ों यूनिट्स का व्यवसाय। - नियमित व्यापारिक संचालन
क्या व्यक्ति रियल एस्टेट व्यापार को पेशे के रूप में कर रहा है?
यदि उत्तर यह दर्शाते हैं कि गतिविधि व्यक्तिगत या सीमित निवेश की है, तो मालिक को उपभोक्ता माना जाएगा।
लीज़ पर देने के बाद भी शिकायत का अधिकार
मान लें कि किसी व्यक्ति ने फ्लैट खरीदा, कब्जा लिया और फिर उसे किराये पर दे दिया। बाद में यह सामने आता है कि—
- निर्माण में गंभीर खामियाँ हैं,
- संरचनात्मक दोष हैं,
- या बिल्डर द्वारा वादा की गई सुविधाएँ उपलब्ध नहीं कराई गईं।
ऐसी स्थिति में यह कहना कि “आपने फ्लैट किराये पर दे दिया, इसलिए आप उपभोक्ता नहीं हैं”—
न्यायिक रूप से अस्वीकार्य है।
क्योंकि विवाद का मूल कारण खरीद के समय दी गई सेवा की कमी है, न कि फ्लैट का बाद का उपयोग।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की उद्देश्यपरक व्याख्या
उपभोक्ता कानून की व्याख्या करते समय न्यायालयों ने हमेशा उद्देश्यपरक दृष्टिकोण अपनाया है। इसका उद्देश्य—
- उपभोक्ता को प्रभावी उपचार देना,
- सेवा प्रदाताओं को जवाबदेह बनाना,
- और तकनीकी आधारों पर न्याय से वंचित न करना।
यदि केवल किराये पर देने के आधार पर उपभोक्ता का दर्जा छीन लिया जाए, तो यह अधिनियम को निष्प्रभावी बना देगा।
2019 अधिनियम के संदर्भ में भी स्थिति समान
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 ने भी “उपभोक्ता” की परिभाषा को मूलतः उसी भावना में बनाए रखा है। यद्यपि शब्दावली में कुछ परिवर्तन हुए हैं, परंतु—
- “Commercial Purpose” की अवधारणा अब भी सीमित और सुस्पष्ट है,
- और व्यक्तिगत निवेश या सीमित आय-उत्पादन को इससे बाहर नहीं किया गया है।
इसलिए, नए अधिनियम के अंतर्गत भी फ्लैट मालिक, जो उसे किराये पर देता है, सामान्यतः उपभोक्ता ही रहेगा।
व्यावहारिक प्रभाव और संदेश
यह सिद्धांत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि—
- अधिकांश फ्लैट खरीदार मध्यम वर्ग से आते हैं,
- जो अपनी जीवनभर की बचत से संपत्ति खरीदते हैं,
- और बाद में उसे किराये पर देकर ऋण चुकाते हैं या आय अर्जित करते हैं।
यदि ऐसे लोगों को उपभोक्ता संरक्षण से वंचित कर दिया जाए, तो यह सामाजिक और आर्थिक रूप से अन्यायपूर्ण होगा।
निष्कर्ष: अधिकार उपयोग से समाप्त नहीं होते
स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि—
फ्लैट को किराये पर देना, अपने-आप में, मालिक को उपभोक्ता की परिभाषा से बाहर नहीं करता।
जब तक यह सिद्ध न हो कि फ्लैट की खरीद विशुद्ध रूप से बड़े पैमाने पर व्यावसायिक लाभ के लिए की गई थी, तब तक मालिक—
- उपभोक्ता मंच में शिकायत दर्ज कर सकता है,
- बिल्डर की सेवा-कमी के विरुद्ध राहत मांग सकता है,
- और उपभोक्ता संरक्षण कानून के सभी लाभ प्राप्त कर सकता है।
यह सिद्धांत न केवल कानूनसम्मत है, बल्कि न्याय, समानता और उपभोक्ता अधिकारों की मूल भावना के भी अनुरूप है।