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“वकील का आचरण शर्मनाक”: रेप पीड़िता को ‘चरित्रहीन’ बताने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी फटकार —

“वकील का आचरण शर्मनाक”: रेप पीड़िता को ‘चरित्रहीन’ बताने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी फटकार — गरिमा, कानून और वकालत की नैतिक सीमाओं पर ऐतिहासिक टिप्पणी

प्रस्तावना: जब न्यायालय को गरिमा की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करना पड़े

भारतीय न्याय प्रणाली केवल अपराध और दंड का ढांचा नहीं है, बल्कि यह मानव गरिमा, संवैधानिक नैतिकता और विधिक मर्यादा की भी संरक्षक है। विशेष रूप से यौन अपराधों के मामलों में अदालतों की भूमिका और भी संवेदनशील हो जाती है, क्योंकि यहाँ केवल कानूनी प्रश्न नहीं, बल्कि पीड़िता की अस्मिता, निजता और सम्मान सीधे दांव पर होते हैं।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय इसी संवेदनशील संतुलन का एक सशक्त उदाहरण है, जहाँ अदालत ने न केवल आरोपी की अपील को खारिज किया, बल्कि उसके वकील द्वारा अपनाई गई “चरित्र हनन” की रणनीति को कड़े शब्दों में अस्वीकार करते हुए उसे पूरी तरह से अनुचित और शर्मनाक आचरण करार दिया।

यह फैसला केवल एक आपराधिक अपील तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वकालत की नैतिकता, पीड़िता के अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा पर एक स्पष्ट और मजबूत संदेश देता है।


मामले की पृष्ठभूमि: इलाज के बहाने अपराध का आरोप

यह मामला उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जिले के थाना बांसी में दर्ज केस क्राइम संख्या 132/2022 से संबंधित है। पीड़िता ने 28 मई 2022 को प्राथमिकी दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि वह इलाज के लिए आरोपी के क्लिनिक गई थी। आरोप है कि इलाज के बहाने उसे नशीली दवा दी गई, जिससे वह बेहोश हो गई और इसी अवस्था में आरोपी ने उसके साथ दुष्कर्म किया।

पीड़िता का यह भी आरोप था कि होश में आने पर उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और बाद में उसे यह पता चला कि वह गर्भवती हो गई है। यह आरोप न केवल गंभीर था, बल्कि यह दर्शाता है कि मामला सहमति या निजी संबंधों का नहीं, बल्कि विश्वास के दुरुपयोग और हिंसा का था।

पुलिस जांच के बाद आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(v) के अंतर्गत चार्जशीट दाखिल की गई। विशेष न्यायाधीश (SC/ST Act) ने 10 नवंबर 2022 को संज्ञान लिया।

इसी संज्ञान आदेश और चार्जशीट को चुनौती देते हुए आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की।


बचाव पक्ष की रणनीति: कानून से ज़्यादा चरित्र पर हमला

अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने जो रुख अपनाया, वही इस पूरे मामले का सबसे विवादास्पद और चिंताजनक पहलू बन गया।

बचाव पक्ष ने यह दावा किया कि पीड़िता “ब्लैकमेल करने की आदी” है और वह लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी देकर पैसे ऐंठती है। इस दावे के समर्थन में पाँच व्यक्तियों के शपथ पत्र प्रस्तुत किए गए, जिनके आधार पर यह तर्क दिया गया कि पीड़िता “आसान चरित्र” (Easy Virtue) की महिला है।

यह दलील न केवल कानूनी रूप से कमजोर थी, बल्कि यह स्पष्ट रूप से पीड़िता के चरित्र हनन का प्रयास थी। विशेष बात यह रही कि ये शपथ पत्र केस डायरी का हिस्सा नहीं थे, न ही इनकी किसी न्यायिक जांच या पुलिस सत्यापन का आधार प्रस्तुत किया गया।

इसके अतिरिक्त, बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि एफआईआर करीब 9 महीने की देरी से दर्ज की गई, जिससे मामला संदिग्ध हो जाता है। आरोपी ने अपनी एलिबी के समर्थन में एक उपस्थिति पंजिका भी प्रस्तुत की, जिसमें दावा किया गया कि वह घटना के समय बहराइच के एक अस्पताल में फार्मासिस्ट के रूप में कार्यरत था।


कोर्ट की सख्त टिप्पणी: कानून चरित्र हनन की अनुमति नहीं देता

न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X की पीठ ने बचाव पक्ष की इन दलीलों पर तीखी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीड़िता के चरित्र या अतीत पर सवाल उठाना न केवल अप्रासंगिक है, बल्कि कानून द्वारा स्पष्ट रूप से निषिद्ध है

कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 53A और धारा 146 का उल्लेख करते हुए कहा कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता के नैतिक चरित्र या यौन इतिहास को मुद्दा बनाना कानून के खिलाफ है। ये प्रावधान विशेष रूप से इस उद्देश्य से बनाए गए हैं कि पीड़िता को दोबारा मानसिक उत्पीड़न का शिकार न बनाया जाए

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि किसी महिला को “आसान चरित्र” का बताकर उसे बदनाम करने का प्रयास Character Assassination के समान है और यह सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त गरिमा और निजता के अधिकार का उल्लंघन है।


वकालत की नैतिकता पर सीधा प्रहार

इस मामले में अदालत की टिप्पणी केवल कानूनी सीमाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने वकालत की नैतिक जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल उठाए।

जब सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने यह टिप्पणी की कि “इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी”, तो हाईकोर्ट ने इसे अदालत पर दबाव बनाने (Browbeat) की कोशिश माना।

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायालय इस तरह के आचरण की निंदा करता है, क्योंकि यह न केवल अदालत की गरिमा के खिलाफ है, बल्कि यह नैतिक वकालत की मूल भावना पर भी चोट करता है। एक वकील का कर्तव्य केवल अपने मुवक्किल का बचाव करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि वह कानून और नैतिकता की सीमाओं के भीतर रहकर ऐसा करे।


देरी से एफआईआर: ट्रायल का विषय, संज्ञान का नहीं

एफआईआर में देरी के मुद्दे पर भी हाईकोर्ट ने स्पष्ट रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में देरी एक सामान्य सामाजिक और मनोवैज्ञानिक वास्तविकता है। पीड़िता सामाजिक दबाव, डर, बदनामी और मानसिक आघात के कारण तुरंत रिपोर्ट दर्ज कराने में असमर्थ हो सकती है।

इसलिए, एफआईआर में देरी का मूल्यांकन संज्ञान के चरण पर नहीं, बल्कि ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। इस आधार पर चार्जशीट को खारिज करने की मांग को अदालत ने अस्वीकार कर दिया।


अंतिम आदेश: अपील खारिज, चरित्र पर हमले रिकॉर्ड से बाहर

हाईकोर्ट ने अपील को योग्यता-हीन मानते हुए खारिज कर दिया और यह निर्देश दिया कि पीड़िता के चरित्र से संबंधित सभी दलीलें और शपथ पत्र रिकॉर्ड से हटाए जाएँ तथा उन पर कोई विचार न किया जाए।

साथ ही, ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार कार्यवाही आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया।


निष्कर्ष: न्याय, गरिमा और मर्यादा का स्पष्ट संदेश

यह निर्णय केवल एक आपराधिक अपील का निपटारा नहीं है, बल्कि यह न्यायिक चेतावनी है—उन सभी के लिए जो अब भी यह मानते हैं कि पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाकर अपराध को कमजोर किया जा सकता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून पीड़िता की गरिमा के साथ खड़ा है, और न्याय की प्रक्रिया को चरित्र हनन का मंच नहीं बनने दिया जाएगा। साथ ही, यह फैसला वकीलों को भी याद दिलाता है कि वकालत एक पेशा ही नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व है।

यह निर्णय आने वाले समय में यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण और वकालती आचरण दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बनेगा।


केस विवरण

केस टाइटल: बेचन प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 9287 ऑफ 2022
न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
कोरम: न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X