RTE एक्ट और मानदेय का अधिकार: “केंद्र का बहाना नहीं चलेगा” — राज्य की वैधानिक जिम्मेदारी पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट रेखा
प्रस्तावना: जब ‘फंड की कमी’ संवैधानिक दायित्व से टकराती है
भारतीय कल्याणकारी राज्य की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि वह अपने नागरिकों को दिए गए वैधानिक और मौलिक अधिकारों को कितनी गंभीरता से लागू करता है। शिक्षा का अधिकार (Right to Education) केवल नीति नहीं, बल्कि अनुच्छेद 21-A के तहत संरक्षित एक मौलिक अधिकार है।
अक्सर राज्य सरकारें यह तर्क देती हैं कि केंद्र से अनुदान (grant) समय पर न मिलने के कारण वे योजनाओं का पूरा भुगतान नहीं कर पा रही हैं। परंतु न्यायपालिका ने बार-बार स्पष्ट किया है कि—
राज्य की आंतरिक वित्तीय व्यवस्था की कमी नागरिकों के अधिकारों को बाधित करने का वैध आधार नहीं हो सकती।
इसी सिद्धांत को शिक्षा के क्षेत्र में लागू करते हुए न्यायालय ने यह स्थापित किया कि यदि शिक्षक नियुक्त हैं, सेवा दे रहे हैं, और योजना वैधानिक ढांचे के अंतर्गत चल रही है, तो राज्य पहले भुगतान करेगा और बाद में केंद्र से वसूली करेगा।
1. विवाद का मूल: मानदेय बनाम गरिमामय जीवन
सर्व शिक्षा अभियान (अब समग्र शिक्षा) के अंतर्गत नियुक्त अंशकालिक अनुदेशक — जैसे शारीरिक शिक्षा, कला शिक्षा, कार्य शिक्षा के शिक्षक — वर्षों से कम मानदेय पर कार्य कर रहे थे।
मुख्य विवाद
| पक्ष | स्थिति |
|---|---|
| शिक्षकों को वास्तविक भुगतान | लगभग ₹7,000 प्रतिमाह |
| योजना के मानक अनुसार अपेक्षित भुगतान | लगभग ₹17,000 प्रतिमाह |
| राज्य का तर्क | केंद्र ने अपना हिस्सा जारी नहीं किया |
| शिक्षकों का दावा | कार्य लिया जा रहा है, तो पूर्ण मानदेय दें |
यह विवाद केवल धनराशि का नहीं था, बल्कि यह सवाल था —
क्या सरकार “संविदा” शब्द का उपयोग कर शिक्षकों को न्यूनतम सम्मानजनक पारिश्रमिक से वंचित कर सकती है?
2. RTE अधिनियम, 2009 की धारा 7 — वित्तीय जिम्मेदारी का ढांचा
RTE अधिनियम केवल शिक्षा की नीति नहीं बनाता, बल्कि उसके क्रियान्वयन की वित्तीय रूपरेखा भी तय करता है।
धारा 7(1):
केंद्र और राज्य मिलकर व्यय वहन करेंगे।
धारा 7(3):
केंद्र वित्तीय सहायता प्रदान करेगा।
सबसे महत्वपूर्ण — धारा 7(5):
यह प्रावधान कहता है कि यदि किसी कारणवश केंद्र का हिस्सा समय पर उपलब्ध न हो, तो भी राज्य सरकार अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए स्वयं संसाधन उपलब्ध कराएगी।
यही वह बिंदु है जहाँ न्यायालय ने कहा कि—
राज्य “फंड नहीं आया” कहकर वैधानिक दायित्व से बच नहीं सकता।
यह धारा राज्य पर एक ओवरराइडिंग (अधिभावी) जिम्मेदारी डालती है।
3. “Pay and Recover” सिद्धांत — प्रशासनिक कानून का व्यावहारिक समाधान
न्यायपालिका ने एक व्यावहारिक सिद्धांत अपनाया:
“Pay First, Recover Later”
अर्थात:
- राज्य शिक्षकों को पूरा मानदेय दे
- बाद में केंद्र से अपना वित्तीय हिस्सा वसूल करे
यह सिद्धांत सामान्यतः मोटर दुर्घटना मामलों, बीमा विवादों और वैधानिक देनदारियों में लागू होता रहा है, परंतु इसे शिक्षा के क्षेत्र में लागू कर न्यायालय ने यह संदेश दिया:
सरकारी विभागों के बीच वित्तीय विवाद का भार कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता।
4. अनुच्छेद 21 और “गरिमामय जीवन”
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि:
- अल्प मानदेय पर कार्य लेना मानवीय गरिमा (Human Dignity) के विपरीत है
- अनुच्छेद 21 केवल जीवन का अधिकार नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का अधिकार देता है
- शिक्षक राष्ट्र निर्माण का आधार हैं; उन्हें न्यूनतम जीवन स्तर से नीचे रखना असंवैधानिक है
इस प्रकार यह मामला केवल सेवा शर्तों का नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों का प्रश्न बन गया।
5. राज्य एक “Model Employer” क्यों?
न्यायिक दृष्टिकोण यह है कि:
सरकार निजी नियोक्ता नहीं है; उससे उच्च नैतिक मानक अपेक्षित हैं।
एक मॉडल नियोक्ता के रूप में राज्य को चाहिए कि:
- समान कार्य का उचित भुगतान दे
- संविदा शब्द का उपयोग शोषण के लिए न करे
- कर्मचारियों को अनिश्चितता में न रखे
6. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और शिक्षक का मनोबल
RTE का उद्देश्य केवल स्कूल खोलना नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है।
यदि शिक्षक:
- आर्थिक असुरक्षा में हों
- न्यूनतम जीवन स्तर से जूझ रहे हों
- सम्मान से वंचित हों
तो शिक्षा की गुणवत्ता गिरना स्वाभाविक है। इसलिए पर्याप्त मानदेय शिक्षा नीति का अभिन्न हिस्सा है, न कि अतिरिक्त सुविधा।
7. प्रशासनिक कानून का व्यापक प्रभाव
यह निर्णय शिक्षा तक सीमित नहीं है। इसका सिद्धांत लागू हो सकता है जहाँ:
- योजना केंद्र-राज्य साझेदारी में चल रही हो
- कर्मचारी संविदा या परियोजना आधारित हों
- राज्य फंड की कमी का बहाना बना रहा हो
उदाहरण:
- स्वास्थ्य मिशन कर्मी
- आंगनवाड़ी कार्यकर्ता
- मिशन मोड प्रोजेक्ट कर्मचारी
8. अधिवक्ताओं के लिए व्यावहारिक रणनीति
यदि आपके पास संविदा कर्मियों के मामले आते हैं, तो निम्न तर्क प्रभावी हैं:
मुख्य विधिक आधार
- RTE Act Section 7(5)
- अनुच्छेद 21 (गरिमामय जीवन)
- वैधानिक दायित्व बनाम प्रशासनिक असमर्थता
अदालत में प्रभावी प्रस्तुति
“मान्यवर, विभागों के बीच वित्तीय समन्वय की कमी कर्मचारी के संवैधानिक अधिकारों को बाधित करने का आधार नहीं हो सकती।”
9. संविदा रोजगार और शोषण का प्रश्न
सरकारी ढांचे में “संविदा” का उपयोग कई बार:
- स्थायी कार्य के लिए
- कम वेतन देने हेतु
- सामाजिक सुरक्षा से बचने के लिए
किया जाता है। न्यायिक दृष्टिकोण यह बन रहा है कि यदि कार्य नियमित प्रकृति का है, तो न्यूनतम सम्मानजनक भुगतान से इनकार नहीं किया जा सकता।
10. संघीय ढांचे में जिम्मेदारी का संतुलन
भारत संघीय ढांचे वाला देश है। परंतु न्यायालय का दृष्टिकोण स्पष्ट है:
संघीय वित्तीय विवाद का समाधान सरकारें करें — नागरिक को पीड़ित न बनाएं।
11. नीति-निर्माताओं के लिए संदेश
यह निर्णय संकेत देता है कि:
- योजनाएँ शुरू करने से पहले वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करें
- नियुक्ति के बाद भुगतान रोकना नीति विफलता है
- संविदा मॉडल का दुरुपयोग दीर्घकाल में महँगा पड़ता है
12. सामाजिक न्याय का आयाम
कम मानदेय पर कार्य करने वाले अधिकांश शिक्षक:
- ग्रामीण पृष्ठभूमि से
- सीमित संसाधनों वाले
- परिवार के एकमात्र कमाने वाले
होते हैं। इसलिए यह मुद्दा सामाजिक न्याय से भी जुड़ता है।
निष्कर्ष: अधिकार पहले, लेखा-जोखा बाद में
यह सिद्धांत स्थापित हो चुका है कि:
“राज्य की वित्तीय असुविधा नागरिक के अधिकारों को स्थगित नहीं कर सकती।”
शिक्षकों का मानदेय:
- सेवा का प्रतिफल है
- सम्मान का प्रतीक है
- संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है
एडवोकेट डायरी – प्रमुख बिंदु
- धारा 7(5) राज्य पर अधिभावी वित्तीय जिम्मेदारी डालती है
- Pay & Recover सिद्धांत लागू
- अनुच्छेद 21 = गरिमामय जीवन
- फंड की कमी वैधानिक बचाव नहीं
- संविदा कर्मियों के मामलों में उपयोगी मिसाल