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गिरफ्तारी अपवाद है, नियम नहीं BNSS, 2023 की धारा 35(3) पर माननीय Supreme Court of India की निर्णायक व्याख्या और भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में नया संतुलन

गिरफ्तारी अपवाद है, नियम नहीं BNSS, 2023 की धारा 35(3) पर माननीय Supreme Court of India की निर्णायक व्याख्या और भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में नया संतुलन


प्रस्तावना: स्वतंत्रता बनाम राज्य की शक्ति

भारतीय दंड प्रक्रिया का मूल दर्शन यह रहा है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोच्च है और राज्य की दमनकारी शक्ति पर निरंतर नियंत्रण आवश्यक है। जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल संवैधानिक शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर उस प्रक्रिया में जीवंत रहना चाहिए जिसके माध्यम से राज्य किसी व्यक्ति को दंडित करता है। गिरफ्तारी, राज्य द्वारा प्रयोग की जाने वाली सबसे कठोर प्रक्रियाओं में से एक है, क्योंकि इसके साथ न केवल व्यक्ति की शारीरिक स्वतंत्रता छिनती है, बल्कि उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, मानसिक शांति और पारिवारिक जीवन भी प्रभावित होता है।

इसी संदर्भ में, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35 के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई हालिया व्याख्या आपराधिक न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में उभरती है। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी सामान्य नियम नहीं, बल्कि अपवाद है, और ऐसे मामलों में धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना अनिवार्य है।

यह निर्णय केवल एक वैधानिक व्याख्या नहीं है, बल्कि व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और कानून के शासन के प्रति न्यायालय की गहरी प्रतिबद्धता का प्रतीक है।


BNSS की धारा 35: गिरफ्तारी की पुनर्परिभाषा

पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41 का स्थान अब BNSS की धारा 35 ने ले लिया है। हालांकि संरचना और भाषा में कुछ समानताएँ हैं, परंतु BNSS ने गिरफ्तारी की अवधारणा को अधिक स्पष्ट, सीमित और उत्तरदायी बना दिया है।

धारा 35(1) यह बताती है कि किन परिस्थितियों में पुलिस अधिकारी बिना वारंट के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है। लेकिन यह शक्ति पूर्णतः स्वेच्छाचारी नहीं है। यह विवेकाधीन है और इसका प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब कानून द्वारा निर्धारित शर्तें पूरी हों।

न्यायालय ने रेखांकित किया कि—

केवल यह तथ्य कि कानून किसी अपराध के लिए गिरफ्तारी की अनुमति देता है, इसका अर्थ यह नहीं कि पुलिस को हर स्थिति में गिरफ्तारी ही करनी है।

इस प्रकार, गिरफ्तारी को “अधिकार” से अधिक “उत्तरदायित्व” के रूप में देखा जाना चाहिए।


धारा 35(3): नोटिस का अनिवार्य स्वरूप

BNSS की धारा 35(3) एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह कहती है कि यदि किसी मामले में धारा 35(1) के तहत गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है, तो पुलिस अधिकारी को आरोपी व्यक्ति को जांच में उपस्थित होने हेतु नोटिस देना होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को “अनिवार्य” घोषित करते हुए कहा कि:

  1. जिन अपराधों में अधिकतम सजा सात वर्ष या उससे कम है, वहाँ सीधी गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए।
  2. पहले आरोपी को नोटिस जारी किया जाना आवश्यक है।
  3. यदि आरोपी नोटिस का पालन करता है और जांच में सहयोग करता है, तो सामान्यतः उसे गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए।

इस व्याख्या का सीधा अर्थ यह है कि पुलिस को अब “पहले गिरफ्तार करो, फिर पूछताछ करो” की मानसिकता छोड़नी होगी।


गिरफ्तारी से पहले ‘दोहरी संतुष्टि’ का सिद्धांत

न्यायालय ने धारा 35(1)(b) के अंतर्गत गिरफ्तारी के लिए “दोहरी संतुष्टि” (Dual Satisfaction) का सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

प्रथम स्तर की संतुष्टि
पुलिस अधिकारी के पास यह विश्वास करने का उचित कारण होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति ने अपराध किया है।

द्वितीय स्तर की संतुष्टि
पुलिस अधिकारी को यह भी संतुष्ट होना चाहिए कि गिरफ्तारी निम्नलिखित उद्देश्यों में से किसी एक के लिए आवश्यक है:

  • आरोपी को आगे अपराध करने से रोकना
  • निष्पक्ष और प्रभावी जांच सुनिश्चित करना
  • साक्ष्यों से छेड़छाड़ रोकना
  • गवाहों को डराने या प्रभावित करने से रोकना
  • आरोपी की न्यायालय में उपस्थिति सुनिश्चित करना

यदि ये दोनों स्तर पूरे नहीं होते, तो गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी।


मनमानी गिरफ्तारी पर न्यायिक चिंता

न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि व्यवहार में गिरफ्तारी की शक्ति का अक्सर दुरुपयोग होता रहा है। कई मामलों में गिरफ्तारी का उद्देश्य जांच नहीं, बल्कि दबाव बनाना, अपमानित करना या समझौते के लिए मजबूर करना होता है।

न्यायालय ने टिप्पणी की कि—

गिरफ्तारी व्यक्ति की गरिमा पर गहरा आघात करती है और इसे यंत्रवत ढंग से लागू नहीं किया जा सकता।

यह टिप्पणी राज्य की दमनकारी प्रवृत्तियों पर एक सशक्त न्यायिक चेतावनी है।


मजिस्ट्रेट की भूमिका का पुनर्स्थापन

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पुलिस ही नहीं, बल्कि मजिस्ट्रेट भी इस प्रक्रिया में उत्तरदायी हैं।

अब मजिस्ट्रेट को रिमांड आदेश देते समय यह देखना होगा कि:

  • क्या धारा 35(3) के तहत नोटिस दिया गया था?
  • यदि नहीं दिया गया, तो क्यों?
  • क्या गिरफ्तारी के लिए ठोस और लिखित कारण दर्ज हैं?

यदि इन प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं है, तो रिमांड देना कानून के विरुद्ध होगा।

इससे न्यायिक नियंत्रण और अधिक मजबूत होता है।


जेलों में विचाराधीन कैदियों की समस्या

भारत की जेलों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग बंद हैं जिनके खिलाफ मुकदमे अभी लंबित हैं और जिन पर लगाए गए अपराधों की सजा सात वर्ष या उससे कम है।

न्यायालय का मानना है कि यदि धारा 35(3) का सही ढंग से पालन किया जाए, तो:

  • अनावश्यक गिरफ्तारियाँ कम होंगी
  • जेलों पर बोझ घटेगा
  • व्यक्ति और राज्य दोनों के संसाधनों की बचत होगी

यह दृष्टिकोण “दंडात्मक न्याय” से “संतुलित न्याय” की ओर संक्रमण को दर्शाता है।


पुलिस कार्यप्रणाली में अपेक्षित बदलाव

इस निर्णय के बाद पुलिस के लिए केवल यह लिख देना पर्याप्त नहीं होगा कि “जांच के लिए गिरफ्तारी आवश्यक है।”

अब आवश्यक होगा कि:

  • प्रत्येक मामले में गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप से दर्ज हों
  • नोटिस जारी करने या न करने के कारण स्पष्ट हों
  • केस डायरी में ठोस तर्क मौजूद हों

यह पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक बड़ा कदम है।


नागरिकों के लिए इसका महत्व

इस व्याख्या का सीधा लाभ आम नागरिकों को मिलेगा। अब:

  • छोटे अपराधों में तुरंत जेल जाने का खतरा कम होगा
  • व्यक्ति को अपनी बात रखने और सहयोग करने का अवसर मिलेगा
  • पुलिस के साथ शक्ति-संतुलन कुछ हद तक बराबरी पर आएगा

यह लोकतंत्र की आत्मा के अनुरूप है।


निष्कर्ष: न्याय की मानवीय दिशा

BNSS की धारा 35(3) पर सर्वोच्च न्यायालय की यह व्याख्या केवल एक कानूनी घोषणा नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता के प्रति एक सशक्त संवैधानिक संदेश है।

यह निर्णय बताता है कि:

  • गिरफ्तारी दंड नहीं, बल्कि प्रक्रिया है
  • प्रक्रिया का उद्देश्य न्याय है, प्रतिशोध नहीं
  • राज्य की शक्ति पर कानून का अंकुश अनिवार्य है

आने वाले वर्षों में यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के विकास में एक मील का पत्थर माना जाएगा।


संक्षेप में

  • सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी अपवाद है।
  • धारा 35(3) का नोटिस देना अनिवार्य है।
  • गिरफ्तारी के लिए दोहरी संतुष्टि आवश्यक है।
  • मजिस्ट्रेट को भी गिरफ्तारी की वैधता जांचनी होगी।

यदि आप चाहें, तो मैं अगली कड़ी में BNSS की धारा 35 और पुरानी CrPC की धारा 41 का विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कर सकता हूँ।