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भारत मित्तल बनाम राजस्थान राज्य व अन्य (2026 (1) J.Cr.C. 1): चेक बाउंस मामलों में कंपनी के ‘समापन’ की स्थिति, निदेशक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी और धारा 148 का संवैधानिक प्रश्न

भारत मित्तल बनाम राजस्थान राज्य व अन्य (2026 (1) J.Cr.C. 1): चेक बाउंस मामलों में कंपनी के ‘समापन’ की स्थिति, निदेशक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी और धारा 148 का संवैधानिक प्रश्न — एक विस्तृत विधिक विश्लेषण

       भारतीय वाणिज्यिक व्यवस्था में चेक को भुगतान के विश्वसनीय माध्यम के रूप में स्थापित करने में परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) की केंद्रीय भूमिका रही है। इस अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत चेक बाउंस को अपराध घोषित कर कानून ने यह सुनिश्चित किया कि व्यापारिक लेन-देन में अनुशासन और भरोसा बना रहे। समय के साथ, विधायिका ने इसमें धारा 141 और धारा 148 जैसे प्रावधान जोड़कर कंपनियों, उनके निदेशकों तथा अपीलीय प्रक्रिया से संबंधित प्रश्नों को स्पष्ट करने का प्रयास किया।

     फिर भी, जब कोई कंपनी ‘लिक्विडेशन’ (Liquidation) की प्रक्रिया में हो और उसके द्वारा जारी चेक अनादरित हो जाए, तो यह प्रश्न उभरता है कि क्या केवल हस्ताक्षरकर्ता निदेशक को व्यक्तिगत रूप से धारा 148 के तहत 20% राशि जमा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है। इसी जटिल प्रश्न को भारत का उच्चतम न्यायालय ने भारत मित्तल बनाम राजस्थान राज्य व अन्य के मामले में ‘वृहत पीठ’ (Larger Bench) को संदर्भित किया है।

यह निर्णय भारतीय आपराधिक और वाणिज्यिक विधि में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है, क्योंकि यह धारा 138, 141 और 148 के पारस्परिक संबंधों की अंतिम व्याख्या की दिशा तय करेगा।


1. मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता भारत मित्तल एक कंपनी के निदेशक तथा अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता थे। कंपनी ने व्यापारिक देनदारी के निर्वहन हेतु एक चेक जारी किया, जो बैंक द्वारा अनादरित (Dishonoured) कर दिया गया। इसके पश्चात परिवादी ने धारा 138 तथा धारा 141 के अंतर्गत कंपनी एवं उसके निदेशकों के विरुद्ध आपराधिक शिकायत दायर की।

कार्यवाही के दौरान कुछ निदेशकों के विरुद्ध आरोप समाप्त हो गए, किंतु भारत मित्तल के विरुद्ध मुकदमा चलता रहा। इसी बीच संबंधित कंपनी के विरुद्ध समापन (Liquidation) की कार्यवाही प्रारंभ हो गई। इसके बावजूद परीक्षण न्यायालय ने भारत मित्तल को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।

जब इस आदेश के विरुद्ध अपील दायर की गई, तो अपीलीय न्यायालय ने धारा 148 के अंतर्गत यह शर्त लगाई कि अपीलकर्ता को चेक राशि का न्यूनतम 20% जमा करना होगा।


2. विवाद का मूल प्रश्न

मूल प्रश्न यह था कि—

यदि कंपनी स्वयं ‘लिक्विडेशन’ में है और उसके विरुद्ध प्रभावी अभियोजन नहीं चल पा रहा, तो क्या केवल हस्ताक्षरकर्ता निदेशक पर धारा 148 के तहत राशि जमा करने का दायित्व डाला जा सकता है?

अपीलकर्ता का तर्क था कि धारा 141 के अंतर्गत निदेशक की जिम्मेदारी ‘व्युत्पन्न’ (Derivative) है, अर्थात वह कंपनी की जिम्मेदारी से उत्पन्न होती है। जब कंपनी ही प्रभावी रूप से अभियोजन के दायरे में नहीं है, तो निदेशक पर धारा 148 का कठोर प्रावधान लागू करना अनुचित होगा।


3. सुप्रीम कोर्ट की पीठ और संदर्भ आदेश

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ के समक्ष हुई।

पीठ ने पाया कि इस विषय पर पहले से दिए गए निर्णयों में परस्पर विरोधाभास है। कुछ फैसलों में धारा 148 को अनिवार्य माना गया है, जबकि कुछ में विशेष परिस्थितियों में इससे छूट दी गई है।

इसी कारण पीठ ने निर्देश दिया कि यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जाए ताकि इसे बड़ी पीठ को सौंपा जा सके।


4. धारा 138 का उद्देश्य

धारा 138 का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चेक भुगतान का भरोसेमंद साधन बना रहे। यह प्रावधान एक प्रकार का ‘सख्त दायित्व’ (Strict Liability) स्थापित करता है, जिसमें दोषसिद्धि के लिए केवल यह दिखाना पर्याप्त है कि चेक वैध देनदारी के लिए जारी हुआ था और अनादरित हो गया।

यह धारा दंडात्मक होने के साथ-साथ निवारक (Deterrent) भी है।


5. धारा 141: कंपनी और उसके अधिकारी

धारा 141 के अनुसार यदि अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है, तो कंपनी के साथ-साथ वह प्रत्येक व्यक्ति जो उस समय कंपनी के कार्यभार के लिए जिम्मेदार था, भी दोषी माना जाएगा।

यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि निदेशक की जिम्मेदारी ‘प्रत्यक्ष’ नहीं, बल्कि कंपनी की जिम्मेदारी से उत्पन्न होती है।


6. धारा 148: अपील में 20% राशि जमा करने का प्रावधान

धारा 148 का उद्देश्य यह है कि दोषसिद्ध व्यक्ति अपील के माध्यम से केवल देरी न करे और परिवादी को न्यूनतम सुरक्षा मिले।

यह धारा अपीलीय न्यायालय को विवेकाधिकार देती है कि वह सजा स्थगन के लिए 20% तक राशि जमा करने की शर्त लगा सके।


7. कानूनी असंगति (Inconsistency of Views)

कुछ निर्णयों में कहा गया है कि धारा 148 का अनुपालन अनिवार्य है, चाहे आरोपी कोई भी हो।

अन्य निर्णयों में यह माना गया है कि यदि कंपनी के विरुद्ध कार्यवाही व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है, तो निदेशक को व्यक्तिगत रूप से धारा 148 के बोझ से मुक्त किया जा सकता है।

इसी असंगति को दूर करने के लिए यह मामला बड़ी पीठ को भेजा गया।


8. कॉर्पोरेट परदा (Corporate Veil) और उसकी सीमा

कॉर्पोरेट परदा कंपनी को उसके निदेशकों से पृथक पहचान देता है। किंतु धारा 141 इस परदे को आंशिक रूप से हटाकर निदेशकों को उत्तरदायी बनाती है।

प्रश्न यह है कि क्या धारा 148 भी इसी सीमा तक लागू होगी या नहीं।


9. संवैधानिक दृष्टिकोण

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि केवल निदेशक पर 20% राशि जमा करने का दायित्व डालना अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (न्यायसंगत प्रक्रिया) के विरुद्ध हो सकता है, क्योंकि यह असमान और कठोर व्यवहार होगा।


10. संभावित परिणाम

यदि बड़ी पीठ यह तय करती है कि निदेशक को धारा 148 से छूट मिलनी चाहिए, तो यह निदेशकों के लिए राहतकारी होगा, किंतु इससे परिवादियों के हित प्रभावित हो सकते हैं।

यदि धारा 148 को अनिवार्य रखा जाता है, तो इससे चेक बाउंस मामलों में कठोरता बनी रहेगी, परंतु निदेशकों पर व्यक्तिगत आर्थिक दबाव बढ़ेगा।


11. व्यावहारिक महत्व

यह निर्णय कॉर्पोरेट गवर्नेंस, जोखिम प्रबंधन और निदेशकों की जवाबदेही की दिशा तय करेगा।

अब निदेशकों को यह समझना होगा कि कंपनी की विफलता उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर भी गंभीर परिणामों की ओर ले जा सकती है।


12. निष्कर्ष

भारत मित्तल बनाम राजस्थान राज्य व अन्य का संदर्भ आदेश यह दर्शाता है कि सर्वोच्च न्यायालय कानून में निश्चितता (Certainty) लाने के लिए प्रतिबद्ध है।

यह मामला केवल एक अपीलकर्ता की सजा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि चेक बाउंस मामलों में कंपनी के ‘समापन’ की स्थिति में निदेशक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी की सीमा क्या होगी।

अब संपूर्ण विधिक समुदाय की निगाहें उस बड़ी पीठ के निर्णय पर टिकी हैं, जो इस जटिल प्रश्न का अंतिम समाधान प्रस्तुत करेगी और भविष्य के लिए एक स्पष्ट मिसाल स्थापित करेगी।