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क्या दूसरी शादी कराने वाला पंडित भी उतना ही दोषी है जितना स्वयं द्विविवाह करने वाला व्यक्ति?

द्विविवाह, दुष्प्रेरण और धर्मगुरु की जिम्मेदारी: क्या दूसरी शादी कराने वाला पंडित भी उतना ही दोषी है जितना स्वयं द्विविवाह करने वाला व्यक्ति? — भारतीय विधि का विस्तृत और समग्र विश्लेषण

भारतीय समाज में विवाह को केवल एक निजी समझौता नहीं माना जाता, बल्कि इसे धर्म, नैतिकता और कानून से जुड़ी एक पवित्र संस्था के रूप में स्वीकार किया गया है। विवाह का उद्देश्य केवल दो व्यक्तियों को सामाजिक रूप से जोड़ना नहीं है, बल्कि उनके बीच निष्ठा, विश्वास, सम्मान और आजीवन सहयोग का संबंध स्थापित करना है। इसी कारण भारतीय विधि व्यवस्था विवाह की एकनिष्ठता (Monogamy) को विशेष महत्व देती है और बहुविवाह या द्विविवाह को अपराध घोषित करती है।

लेकिन जब हम द्विविवाह की बात करते हैं, तो सामान्यतः हमारा ध्यान केवल उस व्यक्ति पर केंद्रित होता है जो पहली शादी के रहते दूसरी शादी करता है। एक महत्वपूर्ण प्रश्न अक्सर अनदेखा रह जाता है—यदि कोई पंडित, मौलवी, पादरी या अन्य धर्मगुरु यह जानते हुए कि व्यक्ति पहले से विवाहित है, फिर भी उसकी दूसरी शादी संपन्न कराता है, तो क्या वह भी अपराधी माना जाएगा?

भारतीय कानून का उत्तर स्पष्ट और दृढ़ है—हाँ, ऐसा व्यक्ति अपराध का दुष्प्रेरक (Abettor) होगा और उस पर भी वही दंडात्मक प्रावधान लागू होंगे जो मुख्य अपराधी पर लागू होते हैं।

यह लेख इस प्रश्न का विस्तृत कानूनी, न्यायिक, सामाजिक और व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।


1. विवाह की कानूनी अवधारणा और एकनिष्ठता का सिद्धांत

भारतीय विधि व्यवस्था के अंतर्गत विवाह केवल एक सामाजिक रस्म नहीं, बल्कि एक वैधानिक स्थिति (Legal Status) प्रदान करता है। हिंदू कानून, ईसाई कानून और विशेष विवाह अधिनियम जैसे विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों में विवाह की वैधता और शर्तें निर्धारित की गई हैं।

हिंदू कानून के अंतर्गत एक मूलभूत सिद्धांत यह है कि—

  • एक समय में केवल एक वैध विवाह हो सकता है।
  • पहली शादी के रहते दूसरी शादी करना अवैध है।

यह सिद्धांत विवाह संस्था की स्थिरता और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विकसित किया गया है।


2. द्विविवाह (Bigamy): अपराध की प्रकृति

द्विविवाह तब माना जाता है जब—

  1. व्यक्ति की पहली शादी विधिपूर्वक हुई हो।
  2. पहली पत्नी/पति जीवित हो।
  3. इसके बावजूद दूसरी शादी वैध रस्मों के साथ संपन्न कर दी जाए।

द्विविवाह केवल नैतिक दोष नहीं, बल्कि एक दंडनीय अपराध है।


3. वैधानिक प्रावधान

(क) भारतीय न्याय संहिता, 2023 – धारा 82

यह धारा द्विविवाह को अपराध घोषित करती है और इसके लिए सात वर्ष तक के कारावास या जुर्माने या दोनों का प्रावधान करती है।

यह प्रावधान पुरानी भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 494 के समान है।

(ख) दुष्प्रेरण से संबंधित धाराएँ – BNS धारा 45 से 52

यदि कोई व्यक्ति अपराध को करने में सहायता करता है, उकसाता है या जानबूझकर सहयोग देता है, तो वह दुष्प्रेरक माना जाता है।

यदि पंडित को यह ज्ञात है कि व्यक्ति पहले से विवाहित है और फिर भी वह विवाह संपन्न कराता है, तो वह द्विविवाह के अपराध का दुष्प्रेरण करता है।

(ग) हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 – धारा 17

यह धारा घोषित करती है कि पहली शादी के रहते की गई दूसरी शादी शून्य होगी और द्विविवाह के दंडात्मक प्रावधान लागू होंगे।


4. दुष्प्रेरण (Abetment) की अवधारणा

दुष्प्रेरण का अर्थ है—

  • किसी को अपराध करने के लिए उकसाना,
  • अपराध में सहायता करना,
  • अपराध की योजना में भाग लेना।

पंडित की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि हिंदू विवाह तभी वैध माना जाता है जब आवश्यक रस्में विधिपूर्वक संपन्न हों। यदि पंडित जानबूझकर ये रस्में कराता है, तो वह अपराध की कड़ी में सक्रिय भूमिका निभाता है।


5. महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय

(क) Malti Devi v. State

न्यायालय ने कहा कि दूसरी शादी संपन्न कराने में सहायता करने वाला व्यक्ति, यदि उसे पहली शादी की जानकारी है, तो दुष्प्रेरण का दोषी होगा।

(ख) Gopal Lal v. State of Rajasthan

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि द्विविवाह तभी सिद्ध होगा जब दूसरी शादी आवश्यक रस्मों के साथ हुई हो। ऐसे में रस्में कराने वाला पंडित भी अपराध का भागीदार होगा।

(ग) Umashankar v. State

अदालत ने माना कि पंडित, गवाह और मध्यस्थ, यदि उन्हें पहली शादी की जानकारी थी, तो वे सभी उत्तरदायी होंगे।


6. Mens Rea (दोषपूर्ण मानसिक अवस्था) का महत्व

किसी भी दुष्प्रेरण के अपराध के लिए यह आवश्यक है कि आरोपी के पास दोषपूर्ण मानसिक अवस्था हो।

यदि पंडित को यह ज्ञात नहीं था कि व्यक्ति पहले से विवाहित है और उसे धोखे में रखा गया, तो उसे दोषमुक्त किया जा सकता है।


7. सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण

धर्मगुरुओं से अपेक्षा की जाती है कि वे समाज में नैतिकता और विधि का सम्मान करें। यदि वे स्वयं अवैध विवाह संपन्न कराएँ, तो यह समाज में गलत संदेश देता है।


8. व्यावहारिक प्रभाव

  • विवाह से पहले सत्यापन की प्रवृत्ति बढ़ेगी।
  • धर्मगुरु अधिक सतर्क होंगे।
  • पहली पत्नी/पति को बेहतर कानूनी संरक्षण मिलेगा।

9. अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण

कई देशों में भी द्विविवाह अपराध है और अपराध में सहायता करने वालों को भी दंडित किया जाता है। यह दर्शाता है कि एकनिष्ठ विवाह वैश्विक रूप से स्वीकार्य मूल्य है।


10. निष्कर्ष

यदि कोई पंडित यह जानते हुए कि व्यक्ति पहले से विवाहित है, फिर भी उसकी दूसरी शादी संपन्न कराता है, तो वह भारतीय कानून के अनुसार द्विविवाह के अपराध का दुष्प्रेरक होगा और उसे भी वही सजा मिल सकती है जो मुख्य आरोपी को मिलती है।

यह कानून यह सुनिश्चित करता है कि विवाह की पवित्रता बनी रहे और कोई भी व्यक्ति—चाहे वह आम नागरिक हो या धर्मगुरु—कानून से ऊपर न हो।

इस प्रकार, भारतीय विधि व्यवस्था विवाह संस्था की रक्षा के लिए न केवल अपराधी को, बल्कि अपराध में सहयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से उत्तरदायी ठहराती है।