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पुलिस की ‘असीमित’ जांच शक्ति पर न्यायिक अंकुश: CrPC की धारा 173(8) और BNSS की धारा 193(9) की नई न्यायिक व्याख्या में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप

पुलिस की ‘असीमित’ जांच शक्ति पर न्यायिक अंकुश: CrPC की धारा 173(8) और BNSS की धारा 193(9) की नई न्यायिक व्याख्या में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप


प्रस्तावना

भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की आधारशिला “निष्पक्ष जांच” और “निष्पक्ष विचारण” पर टिकी हुई है। जांच का कार्य परंपरागत रूप से पुलिस का क्षेत्र रहा है, जबकि न्यायिक निगरानी अदालतों के हाथ में होती है। लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि पुलिस को यह अधिकार है कि वह किसी भी समय, किसी भी चरण पर, यदि नए तथ्य सामने आएं, तो “आगे की जांच” (Further Investigation) कर सकती है।

लेकिन इस शक्ति का प्रश्न तब गंभीर हो जाता है जब आरोपपत्र (Charge Sheet) दाखिल हो चुका हो और अदालत मामले का संज्ञान (Cognizance) ले चुकी हो। ऐसे में क्या पुलिस स्वतंत्र रूप से आगे की जांच शुरू कर सकती है, या उसे अदालत की अनुमति लेनी होगी?

इसी मूल प्रश्न पर हाल में Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि आरोपपत्र दाखिल होने और अदालत द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद पुलिस अपनी मर्जी से आगे की जांच शुरू नहीं कर सकती। इसके लिए न्यायालय की अनुमति अनिवार्य है। यह फैसला न केवल दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 173(8) की व्याख्या को स्पष्ट करता है, बल्कि अब लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 193(9) के दायरे को भी निश्चित करता है।


मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की जड़ एक दशक पुराने बलात्कार के आरोप से जुड़ी हुई थी। प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल कर दिया था और मामला विचाराधीन था। बाद में पुलिस ने कथित तौर पर कुछ नए तथ्यों के आधार पर आगे की जांच शुरू कर दी, वह भी बिना किसी न्यायिक अनुमति के।

इस कार्यवाही को चुनौती देते हुए मामला Allahabad High Court पहुँचा। उच्च न्यायालय ने पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराते हुए कहा कि जांच एजेंसी के पास यह शक्ति है कि वह नए साक्ष्य मिलने पर आगे की जांच कर सकती है।

लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, तो शीर्ष अदालत ने इस दृष्टिकोण से असहमति जताई और कहा कि ऐसी शक्ति निरंकुश नहीं हो सकती।


CrPC की धारा 173(8) और BNSS की धारा 193(9): विधिक ढांचा

CrPC की धारा 173(8) यह प्रावधान करती थी कि पुलिस अंतिम रिपोर्ट (Final Report) प्रस्तुत करने के बाद भी आगे की जांच कर सकती है और यदि अतिरिक्त साक्ष्य मिलें, तो उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है।

BNSS, 2023 की धारा 193(9) ने इस प्रावधान को लगभग उसी रूप में बनाए रखा है। परंतु दोनों कानूनों में कहीं भी यह स्पष्ट शब्दों में नहीं लिखा था कि पुलिस को अदालत से अनुमति लेना अनिवार्य है या नहीं।

यही शून्य (gap) न्यायिक व्याख्या के माध्यम से भरा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस शक्ति का प्रयोग न्यायिक निगरानी के अधीन होगा।


सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में तीन प्रमुख सिद्धांतों पर बल दिया—

  1. न्यायिक नियंत्रण का सिद्धांत
    जब पुलिस आरोपपत्र दाखिल कर देती है, तो मामला न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आ जाता है। इसके बाद यदि पुलिस बिना अदालत को बताए जांच जारी रखती है, तो यह न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार करने जैसा होगा।
  2. अभियुक्त के मौलिक अधिकार
    भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अनिश्चितकाल तक जांच चलती रहना अभियुक्त के अधिकारों का हनन है।
  3. जांच की अंतिमता (Finality)
    कानून यह नहीं चाहता कि किसी मामले की जांच कभी समाप्त ही न हो। आगे की जांच का उद्देश्य न्याय की सहायता करना है, न कि मुकदमे को अनंत काल तक लटकाना।

आगे की जांच बनाम पुनः जांच

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि “Further Investigation” और “Fresh / De Novo Investigation” में मौलिक अंतर है।

  • आगे की जांच (Further Investigation)
    पहले से की गई जांच की निरंतरता में नए साक्ष्य एकत्र करना।
  • पुनः जांच (Fresh / De Novo Investigation)
    पूरी पुरानी जांच को रद्द कर नए सिरे से जांच शुरू करना।

अदालत ने पूर्व निर्णय Vinubhai Haribhai Malaviya vs State of Gujarat का उल्लेख करते हुए कहा कि पुनः जांच केवल उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ही संभव है।


“Leave of the Court” क्यों आवश्यक है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत से अनुमति लेना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य सुरक्षा कवच है।

  • यह सुनिश्चित करता है कि पुलिस का उद्देश्य वास्तव में न्यायसंगत है।
  • यह रोकता है कि जांच का उपयोग किसी को परेशान करने या प्रताड़ित करने के लिए न किया जाए।
  • यह अदालत को यह अवसर देता है कि वह तय करे कि क्या वास्तव में आगे की जांच आवश्यक है या नहीं।

दशकीय पुराने मामलों पर विशेष टिप्पणी

इस मामले में अपराध लगभग दस वर्ष पुराना था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जितना अधिक समय बीत जाता है, उतना ही अधिक सावधानी से अदालत को आगे की जांच की अनुमति देनी चाहिए।

पुराने मामलों में अचानक जांच को पुनर्जीवित करना अक्सर दुर्भावनापूर्ण भी हो सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में अदालत को यह देखना चाहिए कि—

  • नए साक्ष्य वास्तव में ठोस हैं या नहीं।
  • पहले जांच के समय ये साक्ष्य क्यों उपलब्ध नहीं थे।
  • क्या आगे की जांच से न्याय की संभावना वास्तव में बढ़ेगी।

जांच एजेंसियों के लिए व्यावहारिक प्रभाव

इस निर्णय के बाद पुलिस को निम्नलिखित प्रक्रिया अपनानी होगी—

  1. मजिस्ट्रेट के समक्ष लिखित आवेदन देना।
  2. नए साक्ष्यों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करना।
  3. यह स्पष्ट करना कि ये साक्ष्य पहले क्यों उपलब्ध नहीं थे।
  4. अदालत द्वारा निर्धारित शर्तों और समय-सीमा का पालन करना।

निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शन

यह फैसला निचली अदालतों को यह संदेश देता है कि वे केवल मूक दर्शक न बनें। जब भी पुलिस आगे की जांच का अनुरोध करे, अदालत को यह देखना चाहिए कि—

  • क्या अनुरोध bona fide है?
  • क्या इससे मुकदमे में अनावश्यक देरी होगी?
  • क्या यह अभियुक्त के अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं करेगा?

न्यायशास्त्रीय महत्व

यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह “जांच की स्वतंत्रता” और “न्यायिक निगरानी” के बीच संतुलन स्थापित करता है।

अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि—

  • पुलिस की शक्ति व्यापक है, पर असीमित नहीं।
  • अदालत सर्वोच्च संरक्षक है।
  • कानून की प्रक्रिया का उपयोग किसी को उत्पीड़ित करने के लिए नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में कोई भी अंग निरंकुश न बने। पुलिस को जांच की स्वतंत्रता है, लेकिन वह स्वतंत्रता न्यायालय की निगरानी के अधीन है।

यह फैसला न केवल अभियुक्तों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि पीड़ितों के लिए भी यह सुनिश्चित करता है कि जांच वास्तव में न्याय की दिशा में हो।

इस प्रकार, CrPC की धारा 173(8) और BNSS की धारा 193(9) की यह नई व्याख्या भारतीय न्याय प्रणाली को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और संतुलित बनाती है।