जमानत का आधार: जब आरोपों में ‘विशिष्टता’ का अभाव हो — व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर उच्च न्यायालय का सशक्त रुख
प्रस्तावना: भीड़ में खड़े व्यक्ति और अपराधी के बीच कानूनी अंतर
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत है कि दोष व्यक्तिगत होता है, सामूहिक नहीं। फिर भी, व्यवहार में अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जहाँ भीड़, झगड़ा, बलवा या सामूहिक मारपीट का मामला होता है, पुलिस धारा 147, 148, 149 IPC (अब BNS की समकक्ष धाराएँ) या धारा 34 IPC का सहारा लेकर सभी नामजद व्यक्तियों को एक समान जिम्मेदार ठहरा देती है।
ऐसे मामलों में एफआईआर में प्रायः यह वाक्य मिलता है— “सभी आरोपियों ने मिलकर लाठी-डंडों से हमला किया।” परंतु न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि “सबने मारा” कहना और “किसने क्या किया” बताना — ये दोनों बातें कानून की नजर में बिल्कुल अलग हैं।
उच्च न्यायालय ने जमानत देते हुए कहा कि जहाँ अभियोजन यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि किस आरोपी ने कौन सी चोट पहुँचाई, वहाँ निरंतर हिरासत व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) के विरुद्ध हो सकती है।
1. आपराधिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत: अपराध भी व्यक्तिगत, सजा भी
भारतीय दंड विधि का मूल दर्शन यह है कि—
“Liability follows the act.”
उत्तरदायित्व उसी पर आएगा जिसने कृत्य किया है या जिसकी मंशा स्पष्ट रूप से सिद्ध है।
धारा 149 (सामान्य उद्देश्य) और धारा 34 (सामान्य आशय) सामूहिक उत्तरदायित्व की अवधारणा अवश्य लाती हैं, लेकिन ये धाराएँ स्वतः दोष सिद्धि का लाइसेंस नहीं हैं। जमानत के स्तर पर न्यायालय यह देखता है कि—
- क्या आरोपी की भूमिका (Role) स्पष्ट है?
- क्या उसके विरुद्ध कोई विशिष्ट कृत्य (Overt Act) बताया गया है?
- क्या चिकित्सा साक्ष्य (Medical Evidence) उसके कथित कृत्य से मेल खाते हैं?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर “नहीं” हैं, तो आरोपी को जेल में रखना केवल “उपस्थिति” के आधार पर सजा जैसा हो जाता है।
2. ‘विशिष्ट आरोप’ बनाम ‘सामान्य कथन’ — जमानत का निर्णायक अंतर
(क) सामान्य आरोप (General Allegations)
- “सभी आरोपियों ने मारा।”
- “भीड़ ने हमला किया।”
- “सब लोग लाठी-डंडे से लैस थे।”
ऐसे कथन सामूहिक घटना तो बताते हैं, पर व्यक्तिगत दोष नहीं।
(ख) विशिष्ट आरोप (Specific Allegations)
- “अमुक व्यक्ति ने सिर पर वार किया।”
- “फलाँ आरोपी ने चाकू से पेट में चोट पहुँचाई।”
- “फलाँ ने पीड़ित को पकड़कर रखा।”
यही वह स्तर है जहाँ अदालत आरोपी की वास्तविक संलिप्तता का आकलन कर सकती है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि जमानत के स्तर पर विशिष्टता का अभाव आरोपी के पक्ष में जाता है, क्योंकि निरंतर हिरासत तभी उचित है जब प्रथम दृष्टया भूमिका स्पष्ट हो।
3. मेडिकल रिपोर्ट और एफआईआर का विरोधाभास
जमानत बहस में एक अत्यंत प्रभावी बिंदु है — चोटों की संख्या बनाम आरोपियों की संख्या।
मान लीजिए:
| मेडिकल रिपोर्ट | एफआईआर |
|---|---|
| 2 साधारण चोटें | 10 आरोपी |
| कोई फ्रैक्चर नहीं | सभी पर गंभीर हमला |
ऐसी स्थिति में अदालत स्वाभाविक प्रश्न उठाती है—
- क्या 10 लोगों ने मिलकर केवल 2 हल्की चोटें दीं?
- क्या सभी ने वास्तव में हमला किया?
- क्या कुछ लोग केवल उपस्थित थे?
जब मेडिकल साक्ष्य सामूहिक हिंसा के दावे को समर्थन नहीं देते, तो अभियोजन की कहानी कमजोर पड़ती है, और यह जमानत का मजबूत आधार बनता है।
4. धारा 149 IPC (सामान्य उद्देश्य) की वास्तविक सीमा
अक्सर अभियोजन कहता है— “एक बार सामान्य उद्देश्य सिद्ध हो गया, तो सब दोषी हैं।”
लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट किया है:
- सामान्य उद्देश्य सिद्ध होना चाहिए, अनुमानित नहीं।
- मात्र उपस्थित होना पर्याप्त नहीं है।
- कोई व्यक्ति यदि भीड़ में था पर हमला नहीं किया, तो उसका दायित्व स्वतः नहीं बनता।
जमानत के स्तर पर अदालत यह देखती है कि—
✔ क्या आरोपी के पास हथियार था?
✔ क्या गवाह ने उसका नाम लेकर विशिष्ट भूमिका बताई?
✔ क्या कोई स्वतंत्र साक्ष्य है?
यदि ये तत्व अनुपस्थित हैं, तो धारा 149 का प्रयोग जमानत अस्वीकार करने का स्वतः आधार नहीं बन सकता।
5. धारा 34 IPC (सामान्य आशय) — मंशा का साझा होना आवश्यक
धारा 34 लागू करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि—
- सभी आरोपियों की पूर्व या तत्क्षण साझा मंशा (Common Intention) थी
- वे सक्रिय सहभागिता कर रहे थे
यदि किसी आरोपी के विरुद्ध केवल उपस्थिति का आरोप है, तो साझा मंशा सिद्ध करना कठिन हो जाता है। जमानत के स्तर पर इसका लाभ आरोपी को मिलता है।
6. जमानत का संवैधानिक दृष्टिकोण: स्वतंत्रता सर्वोपरि
न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर का प्रसिद्ध सिद्धांत —
“Bail is the rule, Jail is the exception.”
Article 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है। अदालत ने कहा:
“सिर्फ इसलिए कि व्यक्ति घटनास्थल पर मौजूद था, उसे अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।”
यदि केस डायरी में विशिष्ट भूमिका नहीं है, तो हिरासत निवारक नहीं बल्कि दंडात्मक हो जाती है — जो जमानत सिद्धांत के विरुद्ध है।
7. गवाहों के “सामूहिक बयान” की कानूनी कमजोरी
जब गवाह कहते हैं— “सबने मारा”, अदालत इसे संदेह से देखती है क्योंकि—
- यह कथन स्वाभाविक मानवीय व्यवहार से मेल नहीं खाता
- घायल व्यक्ति अक्सर पहचान सकता है कि किसने वार किया
- सामूहिक आरोप अक्सर शत्रुता या दबाव का परिणाम हो सकते हैं
इसलिए ऐसे बयान जमानत के स्तर पर अभियोजन को मजबूत आधार नहीं देते।
8. अधिवक्ताओं के लिए व्यावहारिक रणनीति (Bail Advocacy Toolkit)
जमानत बहस में उठाए जाने वाले बिंदु:
- चोट बनाम आरोपी संख्या
- कोई विशिष्ट ओवरट एक्ट नहीं
- मेडिकल रिपोर्ट से मेल नहीं
- हथियार की बरामदगी नहीं
- पूर्व शत्रुता का संकेत
- केस डायरी में भूमिका अस्पष्ट
नमूना तर्क:
“मान्यवर, अभियोजन यह बताने में असफल है कि मेरे मुवक्किल ने कौन सी चोट पहुँचाई। मेडिकल रिपोर्ट केवल दो साधारण चोटें दर्शाती है, जबकि सात व्यक्तियों को नामजद किया गया है। विशिष्ट आरोपों के अभाव में निरंतर हिरासत अनुचित है।”
9. सामूहिक एफआईआर और झूठे फँसाव से सुरक्षा
ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में सामूहिक एफआईआर आम हैं, जहाँ—
- पूरा परिवार नामजद कर दिया जाता है
- वास्तविक हमलावर 2–3 लोग होते हैं
- बाकी लोग केवल दबाव बनाने हेतु शामिल किए जाते हैं
उच्च न्यायालय का यह दृष्टिकोण ऐसे निर्दोष व्यक्तियों के लिए सुरक्षा कवच है।
10. न्यायिक संतुलन: पीड़ित के अधिकार बनाम आरोपी की स्वतंत्रता
अदालत यह नहीं कहती कि सामूहिक अपराध असंभव है, बल्कि यह कहती है—
“सामूहिक अपराध का दावा करने के लिए भी व्यक्तिगत भूमिका का न्यूनतम संकेत आवश्यक है।”
यही न्यायिक संतुलन है।
निष्कर्ष: ‘किसने क्या किया’ — यही न्याय की आत्मा
उच्च न्यायालय का यह रुख जमानत न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है:
✔ भीड़ में खड़ा व्यक्ति स्वतः अपराधी नहीं
✔ विशिष्ट आरोप के बिना निरंतर हिरासत अन्यायपूर्ण
✔ व्यक्तिगत स्वतंत्रता राज्य की मनमानी से ऊपर
न्याय की तराजू पर अस्पष्ट आरोपों का वजन हल्का पड़ता है।
यदि राज्य स्वतंत्रता छीनना चाहता है, तो उसे सटीक, स्पष्ट और व्यक्तिगत साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
यह निर्णय याद दिलाता है कि कानून भीड़ को नहीं, व्यक्ति को देखता है — और यही सभ्य न्याय प्रणाली की पहचान है।