भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 6 – ‘एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति’ (Res Gestae) : सिद्धांत, विकास, न्यायिक व्याख्या और व्यावहारिक उपयोग
1. भूमिका
भारतीय साक्ष्य कानून का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्यायालय के समक्ष वही तथ्य प्रस्तुत हों जो सत्य तक पहुँचने में सहायक हों। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) में भी कई ऐसी धाराएँ रखी गई हैं, जो पहले भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (IEA) का हिस्सा थीं। उनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण धारा है धारा 6, जो “एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति” से संबंधित है।
यह धारा उस स्थिति से जुड़ी है जहाँ कोई तथ्य सीधे विवादक तथ्य (fact in issue) नहीं होता, फिर भी वह मुख्य घटना से इतना निकटता से जुड़ा होता है कि उसे अलग करके नहीं देखा जा सकता। ऐसे तथ्यों को कानूनी भाषा में Res Gestae के सिद्धांत के अंतर्गत स्वीकार किया जाता है।
न्यायिक व्यवहार में यह धारा विशेष महत्व रखती है, क्योंकि अपराधों या विवादों में कई बार प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य उपलब्ध नहीं होता, लेकिन घटना के साथ-साथ या तुरंत बाद घटित परिस्थितियाँ सच्चाई को उजागर कर देती हैं।
2. धारा 6 का पाठ और उसका सार
धारा 6 का सार यह है कि—
जो तथ्य स्वयं विवादक तथ्य नहीं हैं, किंतु विवादक तथ्यों से इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि वे उसी संव्यवहार का भाग बन जाते हैं, वे सुसंगत माने जाएंगे, चाहे वे उसी समय और स्थान पर घटित हुए हों या नहीं।
इसका अभिप्राय यह है कि “same transaction” की अवधारणा केवल समय और स्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि घटनाओं की निरंतरता, उद्देश्य और कारण-परिणाम संबंध को भी सम्मिलित करती है।
3. “संव्यवहार” (Transaction) का अर्थ
कानून में “संव्यवहार” शब्द का कोई कठोर या सीमित अर्थ नहीं दिया गया है। इसका तात्पर्य उन घटनाओं की श्रृंखला से है, जो एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए या एक ही योजना के अंतर्गत घटित हों।
उदाहरण के लिए—
यदि किसी व्यक्ति ने पहले योजना बनाई, फिर हथियार खरीदा, उसके बाद हमला किया और अंत में भाग गया—तो ये सभी क्रियाएँ अलग-अलग होते हुए भी एक ही संव्यवहार का भाग मानी जाएँगी।
4. Res Gestae का सिद्धांत : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
Res Gestae लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है— “किया गया कार्य” या “घटित घटना।”
अंग्रेजी कॉमन लॉ में यह सिद्धांत विकसित हुआ ताकि उन कथनों और क्रियाओं को स्वीकार किया जा सके जो घटना के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़े हों और जिनके सत्य होने की संभावना अधिक हो।
भारतीय साक्ष्य कानून में धारा 6 के माध्यम से इसी सिद्धांत को विधिक रूप प्रदान किया गया है।
5. Res Gestae के अंतर्गत स्वीकार्य कथनों की प्रकृति
धारा 6 के अंतर्गत वही कथन स्वीकार्य होंगे—
- जो घटना के समय या तुरंत बाद कहे गए हों।
- जो स्वतःस्फूर्त (spontaneous) हों।
- जिनमें सोच-विचार या बनावट की संभावना न हो।
यदि कथन घटना के काफी समय बाद दिया गया हो, तो वह सामान्यतः hearsay evidence माना जाएगा और धारा 6 के अंतर्गत स्वीकार्य नहीं होगा।
6. समय और स्थान की बाध्यता नहीं
धारा 6 का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि घटना से जुड़े तथ्य उसी समय और स्थान पर होना आवश्यक नहीं है।
यदि किसी व्यक्ति ने घटना के तुरंत बाद दूसरे स्थान पर जाकर घबराहट में किसी को सारी बात बता दी, और यह स्पष्ट हो कि वह अभी भी उसी मानसिक अवस्था में था, तो वह कथन भी Res Gestae के अंतर्गत आ सकता है।
7. स्वतःस्फूर्ति (Spontaneity) का महत्व
स्वतःस्फूर्ति का अर्थ है कि कथन या प्रतिक्रिया बिना सोचे-समझे, स्वाभाविक रूप से निकली हो।
यदि किसी व्यक्ति को यह अवसर मिल जाए कि वह सोचकर, सलाह लेकर या योजना बनाकर बयान दे, तो वह कथन धारा 6 के दायरे से बाहर हो सकता है।
8. उदाहरणों द्वारा समझना
(क) मारपीट की घटना
यदि किसी व्यक्ति पर हमला हो रहा है और वह चिल्लाकर कहता है— “फलाँ आदमी मुझे मार रहा है”, तो यह कथन Res Gestae के अंतर्गत आएगा।
(ख) दुर्घटना
यदि सड़क दुर्घटना के तुरंत बाद घायल व्यक्ति कहे— “उस कार ने मुझे टक्कर मारी”, तो यह कथन सुसंगत माना जाएगा।
(ग) निरंतर अपराध
यदि डकैती के दौरान अलग-अलग स्थानों पर लूट होती है, तो प्रत्येक लूट उसी संव्यवहार का भाग मानी जाएगी।
9. धारा 6 और अनुश्रुत साक्ष्य (Hearsay Evidence) में अंतर
Hearsay Evidence वह साक्ष्य होता है जिसमें गवाह स्वयं घटना का प्रत्यक्षदर्शी नहीं होता, बल्कि उसने किसी और से सुनी हुई बात न्यायालय में बताई होती है।
धारा 6 के अंतर्गत आने वाले कथन इसीलिए स्वीकार्य होते हैं क्योंकि वे घटना से इतने निकट जुड़े होते हैं कि उनकी विश्वसनीयता अधिक मानी जाती है।
10. न्यायालयों द्वारा विकसित मापदंड
न्यायालयों ने समय-समय पर कुछ कसौटियाँ निर्धारित की हैं—
- क्या कथन घटना के साथ निकटता से जुड़ा है?
- क्या कथन स्वतःस्फूर्त है?
- क्या कथन करने वाले के पास झूठ बोलने का अवसर था?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर न्यायालय के संतोषजनक रूप से “नहीं” में है, तो कथन धारा 6 के अंतर्गत स्वीकार किया जा सकता है।
11. आपराधिक मामलों में धारा 6 की भूमिका
अपराधों में अक्सर प्रत्यक्षदर्शी उपलब्ध नहीं होते। ऐसे मामलों में—
- पीड़ित की चीख-पुकार
- आसपास के लोगों की तत्काल प्रतिक्रिया
- घटना के तुरंत बाद की परिस्थितियाँ
महत्वपूर्ण साक्ष्य बन जाती हैं।
12. दीवानी मामलों में धारा 6 का उपयोग
केवल आपराधिक ही नहीं, बल्कि दीवानी विवादों में भी यह धारा लागू होती है, जैसे—
- व्यापारिक लेन-देन से जुड़े पत्र
- अनुबंध से संबंधित तत्काल बातचीत
- संपत्ति विवादों में तत्काल विरोध या प्रतिक्रिया
13. धारा 6 की सीमाएँ
यह धारा असीमित नहीं है।
- बहुत अधिक समय बाद दिया गया कथन स्वीकार्य नहीं होगा।
- सुनियोजित बयान Res Gestae नहीं माने जाएँगे।
14. भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में निरंतरता
BSA ने धारा 6 को लगभग उसी रूप में बनाए रखा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि विधायिका इस सिद्धांत की प्रासंगिकता को आज भी स्वीकार करती है।
डिजिटल युग में भी, जैसे—
- तुरंत भेजे गए मैसेज
- लाइव कॉल पर कही गई बातें
यदि घटना से सीधे जुड़ी हों, तो धारा 6 के अंतर्गत आ सकती हैं।
15. निष्कर्ष
धारा 6 भारतीय साक्ष्य कानून की आत्मा कही जा सकती है, क्योंकि यह न्यायालय को किसी घटना की संपूर्ण तस्वीर देखने में सहायता करती है।
यह धारा यह सुनिश्चित करती है कि केवल तकनीकी कारणों से सत्य को दबाया न जाए और उन तथ्यों को भी महत्व मिले जो घटना से स्वाभाविक रूप से जुड़े हैं।
अंततः, Res Gestae का सिद्धांत न्याय के उस मूल उद्देश्य को पूरा करता है, जिसके अनुसार कानून का लक्ष्य केवल नियमों का पालन कराना नहीं, बल्कि सत्य की खोज करना है।