न्याय के द्वार पर नई ऊर्जा: अनुच्छेद 224A और इलाहाबाद उच्च न्यायालय का संस्थागत कायाकल्प
प्रस्तावना: लंबित न्याय और संवैधानिक समाधान
भारतीय न्यायपालिका आज जिस सबसे गंभीर चुनौती का सामना कर रही है, वह है—मुकदमों का भारी बोझ और न्यायाधीशों की निरंतर कमी। विशेषकर उच्च न्यायालयों में वर्षों, कभी-कभी दशकों से लंबित मामलों की संख्या न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती रही है। ऐसी स्थिति में जब पारंपरिक नियुक्ति प्रक्रिया अपनी गति से चल रही हो और तत्काल राहत की आवश्यकता हो, तब संविधान के कुछ कम प्रयुक्त प्रावधान नई ऊर्जा के स्रोत बनकर उभरते हैं। अनुच्छेद 224A ऐसा ही एक संवैधानिक उपकरण है, जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में पुनर्जीवित होते देखा जा रहा है। यह कदम केवल प्रशासनिक उपाय नहीं, बल्कि न्याय तक शीघ्र पहुँच सुनिश्चित करने की एक संवैधानिक रणनीति है।
अनुच्छेद 224A: संवैधानिक ढांचे में एक विशेष प्रावधान
अनुच्छेद 224A भारतीय संविधान का वह प्रावधान है जो किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को—राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से—किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से पुनः न्यायिक कार्य करने का अनुरोध करने की अनुमति देता है। यह व्यवस्था स्थायी नियुक्ति का विकल्प नहीं है, बल्कि असाधारण परिस्थितियों में न्यायिक क्षमता बढ़ाने का एक लचीला उपाय है।
इस प्रावधान के कुछ मूल तत्व अत्यंत महत्वपूर्ण हैं—
- स्वैच्छिकता का सिद्धांत: सेवानिवृत्त न्यायाधीश को तदर्थ रूप से कार्य करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता; उनकी स्पष्ट सहमति आवश्यक है।
- न्यायिक शक्तियाँ: कार्यकाल के दौरान उन्हें उस उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान अधिकार, शक्तियाँ और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।
- अस्थायी स्वरूप: वे नियमित कैडर का हिस्सा नहीं होते; उनकी नियुक्ति एक विशिष्ट उद्देश्य और सीमित अवधि के लिए होती है।
संविधान निर्माताओं ने यह समझा था कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियाँ आ सकती हैं जब न्यायिक संसाधनों का अस्थायी विस्तार आवश्यक होगा। इसलिए अनुच्छेद 224A को एक “सुरक्षा वाल्व” की तरह रखा गया—जो सामान्य समय में निष्क्रिय रहे, पर आवश्यकता पड़ने पर सक्रिय हो सके।
ऐतिहासिक संदर्भ और न्यायिक दृष्टिकोण
लंबे समय तक अनुच्छेद 224A का उपयोग लगभग नगण्य रहा। इसे एक “निष्क्रिय प्रावधान” माना जाने लगा था। परंतु हाल के वर्षों में न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या और न्यायाधीशों की रिक्तियों ने इस प्रावधान को फिर प्रासंगिक बना दिया। उच्चतम न्यायालय ने भी यह संकेत दिया कि जब तक नियमित नियुक्तियाँ पूरी क्षमता से नहीं हो पातीं, तब तक तदर्थ न्यायाधीशों की व्यवस्था एक व्यावहारिक अंतरिम समाधान हो सकती है। न्यायपालिका ने स्पष्ट किया है कि यह उपाय नियमित नियुक्तियों का विकल्प नहीं, बल्कि एक पूरक व्यवस्था है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय: चुनौतियों का केंद्र
इलाहाबाद उच्च न्यायालय देश के सबसे बड़े और व्यस्त उच्च न्यायालयों में से एक है। यहाँ लंबित मामलों की संख्या वर्षों से चिंता का विषय रही है। विशेष रूप से—
- आपराधिक अपीलें, जिनमें कई अभियुक्त वर्षों से निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं,
- भूमि, सेवा, और दीवानी विवादों से जुड़े पुराने मामले,
- सरकारी अपीलों का भारी बोझ।
इन मामलों में देरी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है; यह सीधे नागरिकों के मौलिक अधिकारों—विशेषकर अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार—से जुड़ी हुई है। लंबित आपराधिक अपीलों में सज़ा भुगत रहे व्यक्ति के लिए विलंबित न्याय एक प्रकार की अतिरिक्त दंडात्मक स्थिति उत्पन्न करता है।
ऐसी परिस्थिति में अनुभवी सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की पुनर्नियुक्ति एक त्वरित और व्यावहारिक उपाय प्रतीत होती है।
तदर्थ न्यायाधीश: अनुभव की पूंजी
सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायिक प्रक्रिया, साक्ष्य मूल्यांकन, और विधिक सिद्धांतों की गहरी समझ रखते हैं। उन्हें न तो प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, न ही न्यायालयीन संस्कृति को समझने में समय लगता है। यह “तत्काल उत्पादकता” का मॉडल है—जहाँ नियुक्ति के साथ ही कार्यकुशलता उपलब्ध हो जाती है।
इसके कुछ प्रमुख लाभ—
- पुराने मामलों का लक्षित निस्तारण: तदर्थ न्यायाधीशों को विशेष रूप से पुरानी आपराधिक अपीलों या दीवानी मामलों के निपटारे के लिए लगाया जा सकता है।
- नियमित पीठों पर दबाव कम होना: इससे स्थायी न्यायाधीश जटिल संवैधानिक या समसामयिक मामलों पर अधिक समय दे सकते हैं।
- निर्णय की गुणवत्ता: अनुभवी न्यायाधीशों का दृष्टिकोण संतुलित और परिपक्व होता है, जिससे न्यायिक निर्णयों की गुणवत्ता प्रभावित नहीं होती।
संवैधानिक संतुलन और न्यायिक स्वतंत्रता
कुछ आलोचकों ने आशंका व्यक्त की है कि तदर्थ न्यायाधीशों की व्यवस्था न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है। परंतु अनुच्छेद 224A की संरचना इस चिंता को काफी हद तक कम करती है। नियुक्ति प्रक्रिया में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की स्वीकृति, और न्यायपालिका की संस्थागत भूमिका शामिल है। इसके अतिरिक्त, तदर्थ न्यायाधीशों को वही संरक्षण और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं जो स्थायी न्यायाधीशों को प्राप्त हैं। अतः वे कार्यपालिका के प्रभाव में आने की आशंका से अपेक्षाकृत मुक्त रहते हैं।
व्यावहारिक चुनौतियाँ
यद्यपि यह कदम सकारात्मक है, पर इसके सफल क्रियान्वयन के लिए कुछ शर्तें अनिवार्य हैं—
- भौतिक अवसंरचना: अतिरिक्त कोर्ट रूम, स्टाफ, शोध सहायक और डिजिटल सुविधाएँ उपलब्ध करानी होंगी।
- स्पष्ट कार्य-आवंटन: तदर्थ न्यायाधीशों को किस प्रकार के मामलों पर ध्यान देना है, इसका स्पष्ट निर्धारण आवश्यक है।
- चयन में पारदर्शिता: केवल उन न्यायाधीशों को आमंत्रित किया जाए जिनकी कार्यशैली निष्पक्ष और दक्ष रही हो।
यदि ये व्यवस्थाएँ नहीं की गईं, तो तदर्थ नियुक्तियाँ केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाएँगी।
नियमित नियुक्तियों का विकल्प नहीं
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 224A स्थायी समाधान नहीं है। न्यायपालिका में रिक्त पदों की नियमित नियुक्ति, न्यायालयों का आधुनिकीकरण, और न्यायिक प्रक्रियाओं का सरलीकरण ही दीर्घकालिक समाधान हैं। तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति एक “आपातकालीन पुल” है—जो स्थायी ढाँचा मजबूत होने तक सहारा देता है।
जनसामान्य के लिए महत्व
इस पूरी व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य किसी संवैधानिक प्रयोग को सफल घोषित करना नहीं, बल्कि आम नागरिक को समय पर न्याय उपलब्ध कराना है। जब कोई अपील वर्षों तक लंबित रहती है, तो न्याय की आशा धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है। अनुच्छेद 224A के माध्यम से न्यायिक क्षमता में तात्कालिक वृद्धि नागरिकों में विश्वास पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक कदम है।
भविष्य की राह: एक मॉडल के रूप में
यदि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में यह प्रयोग सफल होता है, तो अन्य उच्च न्यायालय—जैसे बॉम्बे, कलकत्ता, या मद्रास—भी इस मॉडल को अपनाने पर विचार कर सकते हैं। इससे देशव्यापी स्तर पर लंबित मामलों के निपटान में गति आ सकती है। साथ ही, यह संदेश भी जाता है कि संविधान केवल सिद्धांतों का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि व्यावहारिक समाधान प्रदान करने वाला जीवंत साधन है।
निष्कर्ष: संवैधानिक लचीलापन और न्याय की आशा
अनुच्छेद 224A का पुनः प्रयोग भारतीय न्यायपालिका के लचीले और उत्तरदायी स्वरूप को दर्शाता है। यह कदम यह सिद्ध करता है कि जब परिस्थितियाँ असाधारण हों, तो समाधान भी संवैधानिक ढांचे के भीतर से ही खोजे जा सकते हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक समझ और संवैधानिक दूरदर्शिता का संगम है।
अंततः, इस पहल की सफलता इस बात से मापी जाएगी कि कितने पुराने मामले निपटते हैं, कितने नागरिकों को राहत मिलती है, और न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास कितना सुदृढ़ होता है। यदि यह प्रयास न्याय को अधिक सुलभ, शीघ्र और प्रभावी बनाता है, तो यह निस्संदेह भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होगा।