हाई कोर्ट की सख्ती और यूपी की ‘एनकाउंटर संस्कृति’: कानून के शासन की पुनर्स्थापना पर एक विस्तृत विधिक विमर्श
प्रस्तावना: जब न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में राज्य की शक्ति असीमित नहीं होती; वह संविधान द्वारा सीमित और नियंत्रित होती है। उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों से अपराध नियंत्रण के नाम पर की गई पुलिस मुठभेड़ों (Encounter) ने इसी संवैधानिक संतुलन पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े किए। विशेषकर ऐसे मामलों में जहाँ आरोपियों को पैरों में गोली मारकर स्थायी रूप से अपंग बना देने की घटनाएँ सामने आईं, एक चिंताजनक प्रवृत्ति उभरकर आई जिसे आम बोलचाल में “हाफ एनकाउंटर” या “ऑपरेशन लंगड़ा” जैसे शब्दों से संबोधित किया जाने लगा।
यह स्थिति केवल आपराधिक न्याय प्रणाली का मुद्दा नहीं रही, बल्कि यह राज्य की दंडात्मक शक्ति बनाम नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच टकराव का विषय बन गई। इसी पृष्ठभूमि में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप ऐतिहासिक महत्व रखता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अपराध नियंत्रण राज्य का कर्तव्य अवश्य है, परंतु दंड निर्धारण और दोषसिद्धि का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं। यह कथन भारतीय लोकतंत्र के मूल स्तंभ — कानून का शासन (Rule of Law) — की पुनः स्थापना जैसा है।
1. “एनकाउंटर संस्कृति” : एक विधिक और सामाजिक विश्लेषण
सैद्धांतिक रूप से, पुलिस मुठभेड़ वह स्थिति है जहाँ पुलिस आत्मरक्षा में या जनता की सुरक्षा हेतु अपरिहार्य परिस्थिति में बल प्रयोग करती है। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 96 से 106 तक निजी प्रतिरक्षा (Right of Private Defence) का सिद्धांत स्वीकार किया गया है, जो पुलिस पर भी लागू हो सकता है। परंतु यह अधिकार अनिवार्यता और आनुपातिकता (necessity & proportionality) के अधीन है।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब:
- अधिकांश गंभीर अपराधियों की गिरफ्तारी “मुठभेड़” के रूप में दर्शाई जाने लगे
- गोली लगने का पैटर्न एक जैसा दिखाई दे
- घटनाओं के तुरंत बाद पुलिस कर्मियों का सार्वजनिक महिमामंडन हो
यह स्थिति यह संकेत देती है कि कहीं कानूनी प्रक्रिया (due process) को दरकिनार कर “त्वरित दंड” की संस्कृति विकसित तो नहीं हो रही। यह प्रवृत्ति कानून के शासन की जड़ पर प्रहार करती है।
2. कानून का शासन बनाम त्वरित न्याय
भारतीय संविधान की आत्मा इस सिद्धांत पर आधारित है कि:
“कोई भी व्यक्ति तब तक दोषी नहीं है जब तक न्यायालय उसे दोषी सिद्ध न कर दे।”
यदि पुलिस ही आरोप लगाए, जांच करे, और दंड भी दे दे — तो न्यायपालिका की भूमिका समाप्त हो जाएगी। यह लोकतांत्रिक राज्य नहीं बल्कि पुलिस राज्य (Police State) की अवधारणा होगी।
त्वरित न्याय जनता को आकर्षक लग सकता है, परंतु विधिक दृष्टि से यह खतरनाक है क्योंकि:
- निर्दोष व्यक्ति भी शिकार हो सकता है
- न्यायिक परीक्षण की निष्पक्षता समाप्त हो जाती है
- राज्य शक्ति निरंकुश हो सकती है
न्याय केवल किया ही न जाए, बल्कि होते हुए दिखाई भी देना चाहिए — यह प्राकृतिक न्याय का मूल सिद्धांत है।
3. हाई कोर्ट की प्रमुख आपत्तियाँ
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कई गंभीर बिंदुओं पर चिंता व्यक्त की:
- पुलिस न्यायाधीश नहीं है — दंड देने का अधिकार केवल न्यायपालिका को है।
- कुछ मामलों में मुठभेड़ों को लोकप्रियता या पदोन्नति से जोड़ा जाना न्यायिक प्रक्रिया के लिए खतरनाक है।
- यह प्रवृत्ति न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार में सीधा हस्तक्षेप है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आत्मरक्षा की सीमा से बाहर कोई भी कार्रवाई अवैध और दंडनीय होगी।
4. PUCL बनाम महाराष्ट्र (2014) का महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने People’s Union for Civil Liberties (PUCL) v. State of Maharashtra (2014) में पुलिस मुठभेड़ों पर विस्तृत दिशानिर्देश दिए थे। इनका उद्देश्य था:
- हर मुठभेड़ की स्वतंत्र जांच
- पुलिस द्वारा स्वयं के विरुद्ध जांच से बचाव
- न्यायिक निगरानी सुनिश्चित करना
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि ये दिशानिर्देश केवल सलाह नहीं बल्कि अनिवार्य प्रक्रिया हैं।
5. हाई कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्देश
(1) अनिवार्य FIR
हर मुठभेड़ जिसमें चोट या मृत्यु हुई हो, उस पर तत्काल FIR दर्ज हो।
(2) स्वतंत्र जांच
जांच CBCID या स्वतंत्र एजेंसी द्वारा हो, न कि वही टीम जो घटना में शामिल थी।
(3) घायल का बयान
घायल आरोपी का बयान मजिस्ट्रेट/डॉक्टर की उपस्थिति में दर्ज हो।
(4) पुरस्कार/प्रमोशन पर रोक
जांच पूर्ण होने से पहले कोई पदोन्नति या वीरता पुरस्कार नहीं।
(5) न्यायिक निगरानी
जांच रिपोर्ट न्यायालय को सौंपी जाए।
(6) शिकायत का अधिकार
पीड़ित परिवार को न्यायिक मंच पर जाने का अधिकार हो।
6. वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही
न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि दिशानिर्देशों का पालन नहीं हुआ तो संबंधित SP/SSP/कमिश्नर को भी अवमानना का सामना करना पड़ सकता है। यह संस्थागत जिम्मेदारी तय करता है।
7. संवैधानिक आयाम
अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
यह अधिकार आरोपी को भी समान रूप से प्राप्त है। बिना न्यायिक प्रक्रिया के स्थायी शारीरिक क्षति पहुँचाना इस अधिकार का उल्लंघन है।
अनुच्छेद 14 — समानता का अधिकार
कानून के समक्ष समानता का अर्थ है कि हर व्यक्ति न्यायिक प्रक्रिया से गुजरे।
8. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानक
संयुक्त राष्ट्र के Basic Principles on the Use of Force and Firearms के अनुसार घातक बल का प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए। भारत भी इन मानकों से नैतिक रूप से बंधा है।
9. पुलिस सुधार की दिशा
- बॉडी कैमरा और ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग
- मानवाधिकार प्रशिक्षण
- स्पष्ट SOP
सुधार का उद्देश्य पुलिस को कमजोर करना नहीं, बल्कि कानूनी रूप से मजबूत और जवाबदेह बनाना है।
10. समाज पर प्रभाव
इस निर्णय से:
- न्याय व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा
- पुलिस की मनमानी पर अंकुश लगेगा
- न्यायपालिका की भूमिका सुदृढ़ होगी
निष्कर्ष: कानून सर्वोपरि है
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह रुख लोकतंत्र की आत्मा की पुनर्पुष्टि है।
“अपराध से लड़ना आवश्यक है, परंतु कानून के भीतर रहकर।”
यह निर्णय केवल यूपी तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए संदेश है कि राज्य की शक्ति भी संविधान के अधीन है। न्यायिक हस्तक्षेप ने यह स्थापित किया कि मानवाधिकार, न्यायिक सर्वोच्चता और कानून का शासन ही एक सशक्त लोकतंत्र की पहचान है।