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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 4: अपराधों की जांच, पूछताछ और विचारण का विधिक ढांचा

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 4: अपराधों की जांच, पूछताछ और विचारण का विधिक ढांचा

       भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली दो स्तंभों पर आधारित है—
(1) सारगर्भित आपराधिक कानून (Substantive Criminal Law), जो यह निर्धारित करता है कि कौन-सा कृत्य अपराध है (जैसे भारतीय न्याय संहिता – BNS), और
(2) प्रक्रियात्मक आपराधिक कानून (Procedural Criminal Law), जो यह बताता है कि उस अपराध से विधि कैसे निपटेगी (जैसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – BNSS)।

BNSS की धारा 4 इसी प्रक्रियात्मक ढांचे की आधारशिला है। यह धारा स्पष्ट करती है कि भारत में घटित अपराधों की जांच (Investigation), पूछताछ (Inquiry) और विचारण (Trial) किस कानूनी प्रणाली के अधीन होंगे। सरल शब्दों में, यह धारा आपराधिक न्याय प्रक्रिया का “संचालन नियम” (Operating Rule) निर्धारित करती है।


1. धारा 4 का विधिक चरित्र

धारा 4 एक प्राधिकरण निर्धारण धारा (Jurisdiction-defining Provision) है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि:

कोई भी अपराध प्रक्रियाहीन न रहे और हर अपराध एक वैध तथा स्थापित न्यायिक प्रक्रिया के अधीन ही निपटाया जाए।

यह धारा राज्य की दंडात्मक शक्ति (Penal Power of the State) को विधिक अनुशासन के अधीन रखती है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) की भावना संरक्षित रहती है।


2. धारा 4(1): BNS के अंतर्गत अपराध

धारा 4(1) कहती है कि यदि अपराध भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत परिभाषित है, तो उसकी समस्त प्रक्रिया BNSS के अनुसार संचालित होगी। इसमें शामिल हैं:

  • प्राथमिकी (FIR) दर्ज करना
  • गिरफ्तारी की विधि
  • तलाशी और जब्ती
  • पुलिस जांच
  • आरोपपत्र (Charge-sheet)
  • मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही
  • साक्ष्य का परीक्षण
  • अंतिम निर्णय (Judgment)

यहाँ स्पष्ट विभाजन है:
BNS = अपराध की परिभाषा
BNSS = अपराध से निपटने की विधि

इससे न्यायिक प्रणाली में स्पष्टता आती है और पुलिस अथवा न्यायालय के विवेकाधीन मनमाने प्रयोग की संभावना घटती है।


3. धारा 4(2): विशेष अधिनियमों (Special Laws) के अपराध

भारत में कई ऐसे विशेष अधिनियम हैं जिनका उद्देश्य विशिष्ट प्रकार के अपराधों से निपटना है, जैसे:

  • NDPS Act (मादक पदार्थ)
  • POCSO Act (बाल संरक्षण)
  • UAPA (आतंकवाद)
  • Prevention of Corruption Act
  • Information Technology Act

धारा 4(2) यह व्यवस्था करती है कि इन विशेष कानूनों के तहत अपराधों की प्रक्रिया भी सामान्यतः BNSS के अनुसार चलेगी।

परंतु, यदि उस विशेष अधिनियम में स्वयं कोई विशिष्ट प्रक्रिया निर्धारित है, तो वही प्रक्रिया लागू होगी।

यहाँ एक महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत लागू होता है:

“विशेष कानून सामान्य कानून पर प्रधान होता है” (Special Law overrides General Law).


4. सामान्य और विशेष कानून के बीच संतुलन

धारा 4 संतुलन की धारा है। यह न तो BNSS को पूर्ण वर्चस्व देती है, न ही Special Laws को पूर्ण स्वतंत्रता। यह स्थिति इस प्रकार समझी जा सकती है:

परिस्थिति लागू प्रक्रिया
सामान्य आपराधिक अपराध BNSS
विशेष अधिनियम, पर अलग प्रक्रिया नहीं BNSS
विशेष अधिनियम + विशिष्ट प्रक्रिया वही विशेष अधिनियम

यह संतुलन विधायी समन्वय (Legislative Harmony) का उदाहरण है।


5. धारा 4 का संवैधानिक महत्व

धारा 4 केवल प्रशासनिक सुविधा का प्रावधान नहीं है, बल्कि इसका संवैधानिक महत्व है:

  • यह राज्य की दंडात्मक शक्ति को विधिक सीमाओं में रखती है
  • यह मनमानी गिरफ्तारी और जांच को रोकती है
  • यह “Due Process of Law” की भारतीय अवधारणा को मजबूत करती है

यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध जांच या ट्रायल वैध प्रक्रिया के बिना चलाया जाए, तो यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन माना जा सकता है।


6. CrPC धारा 4 और BNSS धारा 4 का तुलनात्मक दृष्टिकोण

BNSS की धारा 4, पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC, 1973) की धारा 4 का आधुनिक रूप है। संरचनात्मक सिद्धांत समान है; केवल संदर्भ बदल गया है:

तत्व CrPC, 1973 BNSS, 2023
लागू सारगर्भित कानून IPC BNS
प्रक्रियात्मक कानून CrPC BNSS
Special Laws का सिद्धांत समान समान

यह निरंतरता दर्शाती है कि प्रक्रियात्मक स्थिरता न्याय व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है।


7. व्यावहारिक संचालन (Practical Application)

उदाहरण 1: चोरी का अपराध

चोरी BNS के अंतर्गत है। अतः FIR से लेकर ट्रायल तक BNSS लागू होगा।

उदाहरण 2: NDPS मामला

तलाशी और नमूना लेने की प्रक्रिया NDPS Act के अनुसार होगी, परंतु न्यायालयीन विचारण BNSS के ढांचे में चलेगा।

उदाहरण 3: POCSO मामला

POCSO की विशेष अदालतें और इन-कैमरा ट्रायल की व्यवस्था लागू होगी, किंतु समन, वारंट और साक्ष्य रिकॉर्डिंग BNSS के अनुरूप होगी।


8. न्यायपालिका की भूमिका

न्यायालय अक्सर यह तय करते हैं कि किसी मामले में BNSS की सामान्य प्रक्रिया लागू होगी या विशेष अधिनियम की। धारा 4 न्यायिक व्याख्या के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत देती है और अधिकार क्षेत्र विवादों को कम करती है।


9. अभियोजन और बचाव पक्ष पर प्रभाव

  • अभियोजन पक्ष को सुनिश्चित करना होता है कि जांच सही प्रक्रिया से हुई हो
  • बचाव पक्ष प्रक्रिया की त्रुटियों को चुनौती दे सकता है
  • यदि प्रक्रिया का उल्लंघन हो, तो मुकदमा निरस्त भी हो सकता है

इस प्रकार धारा 4 निष्पक्ष मुकदमे (Fair Trial) की गारंटी को मजबूत करती है।


10. पुलिस प्रशासन पर प्रभाव

पुलिस अधिकारी को तीन बातों की जांच करनी होती है:

  1. अपराध किस अधिनियम के तहत है
  2. क्या विशेष अधिनियम में अलग प्रक्रिया है
  3. उसी अनुरूप केस डायरी और आरोपपत्र तैयार करना

प्रक्रियात्मक त्रुटि से पूरा मामला कमजोर पड़ सकता है।


11. विधिक अनुशासन और न्यायिक स्थिरता

धारा 4 न्याय प्रणाली में एकरूपता और पूर्वानुमेयता (Predictability) लाती है। जब प्रक्रिया स्पष्ट हो, तो न्यायिक निर्णय भी स्थिर होते हैं और अपीलों में तकनीकी विवाद कम होते हैं।


12. निष्कर्ष

BNSS की धारा 4 आपराधिक न्याय प्रणाली की प्रक्रियात्मक रीढ़ है। यह:

  • हर अपराध के लिए कानूनी मार्ग तय करती है
  • सामान्य और विशेष कानूनों में समन्वय स्थापित करती है
  • पुलिस और न्यायालयों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश देती है
  • आरोपी और पीड़ित दोनों के अधिकारों की रक्षा करती है
  • संविधानसम्मत न्याय प्रक्रिया सुनिश्चित करती है

अपराध से न्याय तक की पूरी यात्रा, विधिक रूप से, धारा 4 के मार्गदर्शन में ही आगे बढ़ती है।


प्रश्न 1: BNSS की धारा 4 का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर:
BNSS की धारा 4 का मुख्य उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि भारत में होने वाले अपराधों की जांच, पूछताछ और विचारण किस प्रक्रियात्मक कानून के अंतर्गत होगा। यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी अपराध कानूनी प्रक्रिया से बाहर न रहे। यह धारा आपराधिक न्याय प्रणाली में एकरूपता, वैधता और विधिक अनुशासन स्थापित करती है। यह राज्य की दंडात्मक शक्ति को कानूनी सीमाओं में रखती है और संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुरूप “न्यायपूर्ण प्रक्रिया” (Fair Procedure) को मजबूत करती है।


प्रश्न 2: धारा 4(1) BNSS किस पर लागू होती है?

उत्तर:
धारा 4(1) उन अपराधों पर लागू होती है जो भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत आते हैं। इसका अर्थ है कि BNS में परिभाषित अपराधों से संबंधित FIR, गिरफ्तारी, जांच, आरोपपत्र और न्यायालयीन विचारण की संपूर्ण प्रक्रिया BNSS के प्रावधानों के अनुसार संचालित होगी। यहाँ BNS अपराध की प्रकृति बताती है, जबकि BNSS यह बताती है कि उस अपराध से विधिक रूप से कैसे निपटा जाएगा।


प्रश्न 3: धारा 4(2) BNSS और Special Laws के बीच क्या संबंध स्थापित करती है?

उत्तर:
धारा 4(2) यह स्पष्ट करती है कि NDPS Act, POCSO Act, UAPA जैसे विशेष कानूनों के अपराधों की प्रक्रिया सामान्यतः BNSS के अनुसार चलेगी। परंतु यदि किसी विशेष अधिनियम में जांच या ट्रायल की अलग प्रक्रिया निर्धारित है, तो वही प्रक्रिया प्राथमिकता से लागू होगी। यह “Special Law overrides General Law” के सिद्धांत पर आधारित है, जिससे विधिक टकराव से बचाव होता है।


प्रश्न 4: BNSS धारा 4 का आरोपी के अधिकारों से क्या संबंध है?

उत्तर:
यह धारा आरोपी के “निष्पक्ष मुकदमे” (Fair Trial) के अधिकार को मजबूत करती है। यदि गिरफ्तारी, जांच या ट्रायल निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार न हो, तो कार्यवाही को चुनौती दी जा सकती है। इस प्रकार धारा 4 यह सुनिश्चित करती है कि राज्य मनमानी प्रक्रिया न अपनाए और प्रत्येक आपराधिक मुकदमा विधिसम्मत ढंग से चले।


प्रश्न 5: CrPC धारा 4 और BNSS धारा 4 में क्या अंतर है?

उत्तर:
दोनों धाराओं का मूल सिद्धांत समान है। CrPC धारा 4, IPC के अपराधों के लिए प्रक्रियात्मक ढांचा देती थी, जबकि BNSS धारा 4 अब BNS के अपराधों के लिए वही भूमिका निभाती है। संरचना, उद्देश्य और Special Laws से संबंध का सिद्धांत समान है; केवल संहिताओं के नाम और आधुनिक संदर्भ में परिवर्तन हुआ है।