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पंचायत चुनाव और दो बच्चों का नियम: ओडिशा उच्च न्यायालय का कड़ा संदेश और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की नई परिभाषा

पंचायत चुनाव और दो बच्चों का नियम: ओडिशा उच्च न्यायालय का कड़ा संदेश और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की नई परिभाषा

भूमिका: जनसंख्या नियंत्रण, नीति और स्थानीय लोकतंत्र

      भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जनसंख्या वृद्धि लंबे समय से नीति-निर्माताओं के लिए एक गंभीर चुनौती रही है। सीमित संसाधनों, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से जनसंख्या प्रबंधन केवल एक सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि विकास, शासन और न्यायपूर्ण वितरण से जुड़ा संवैधानिक प्रश्न बन चुका है। इसी संदर्भ में कुछ राज्यों ने स्थानीय स्वशासन संस्थाओं—ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद—के चुनावों में उम्मीदवारों की योग्यता को परिवार नियोजन से जोड़ा है।

ओडिशा राज्य ने ओडिशा ग्राम पंचायत अधिनियम, 1964 की धारा 25(1)(v) के माध्यम से स्पष्ट प्रावधान किया है कि जिन व्यक्तियों के दो से अधिक जीवित बच्चे हैं, वे पंचायत चुनाव लड़ने या पद पर बने रहने के लिए अयोग्य होंगे। हाल ही में ओडिशा उच्च न्यायालय ने इस प्रावधान के अनुपालन को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया, जिसने न केवल कानून की वैधता को पुनः पुष्ट किया, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी की अवधारणा को भी नई दृष्टि दी।


1. मामले की पृष्ठभूमि: तथ्य बनाम अधिकार

      विवाद एक निर्वाचित ग्राम पंचायत सदस्य की सदस्यता से जुड़ा था। आरोप यह था कि संबंधित प्रतिनिधि के दो से अधिक जीवित बच्चे हैं, जो कानूनन अयोग्यता का आधार है। याचिकाकर्ता ने निर्वाचन को चुनौती देते हुए कहा कि उम्मीदवार ने या तो तथ्य छिपाए या कानून की अनदेखी कर चुनाव लड़ा।

प्रतिवादी की ओर से मुख्य तर्क यह था कि:

  • चुनाव लड़ना लोकतांत्रिक अधिकार है
  • बच्चों की संख्या जैसे निजी विषय के आधार पर अयोग्यता कठोर है
  • यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप है

मामला अंततः उच्च न्यायालय के समक्ष पहुंचा, जहां प्रश्न यह बना कि क्या इस प्रकार की अयोग्यता संवैधानिक कसौटी पर खरी उतरती है?


2. धारा 25(1)(v): कानूनी प्रावधान की प्रकृति

ओडिशा ग्राम पंचायत अधिनियम की यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है:

यदि किसी व्यक्ति के दो से अधिक जीवित बच्चे हैं, तो वह पंचायत सदस्य या सरपंच बनने या बने रहने के लिए अयोग्य होगा।

यह प्रावधान पूर्व-नियोजित नीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य जनप्रतिनिधियों को परिवार नियोजन के आदर्श के रूप में स्थापित करना है। कानून केवल भविष्य की स्थिति को ध्यान में रखता है—अर्थात, किसी कट-ऑफ तिथि के बाद तीसरे बच्चे के जन्म की स्थिति में अयोग्यता लागू होती है।


3. उच्च न्यायालय का प्रमुख तर्क: चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं

अदालत ने सबसे पहले यह सिद्धांत दोहराया कि:

निर्वाचन लड़ना मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक सांविधिक (Statutory) अधिकार है।

इसका अर्थ यह है कि संसद या राज्य विधानमंडल, चुनावों के लिए पात्रता और अयोग्यता की शर्तें तय कर सकते हैं, बशर्ते वे मनमानी या भेदभावपूर्ण न हों। जैसे—

  • आयु सीमा
  • दिवालियापन
  • आपराधिक दोषसिद्धि
  • शैक्षणिक योग्यता (कुछ राज्यों में)

उसी प्रकार बच्चों की संख्या भी विधायिका द्वारा निर्धारित एक वैध शर्त हो सकती है।


4. संवैधानिक वैधता: जावेद बनाम हरियाणा राज्य

उच्च न्यायालय ने अपने तर्क को सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय Javed v. State of Haryana (2003) से समर्थन दिया। उस मामले में भी हरियाणा पंचायत कानून के तहत “दो बच्चों की नीति” को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

  • यह नीति अनुच्छेद 14 (समानता) का उल्लंघन नहीं है
  • यह अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप नहीं है
  • राज्य जनसंख्या नियंत्रण को सार्वजनिक हित (Public Interest) में बढ़ावा दे सकता है

अदालत ने यह भी कहा कि जनप्रतिनिधि समाज के लिए उदाहरण होते हैं, इसलिए उनसे अधिक जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा की जा सकती है।


5. ‘रोल मॉडल’ की अवधारणा

ओडिशा उच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत पर बल दिया कि पंचायत प्रतिनिधि केवल प्रशासक नहीं, बल्कि सामाजिक नेतृत्वकर्ता भी होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में उनका आचरण लोगों के व्यवहार को प्रभावित करता है।

यदि वही व्यक्ति परिवार नियोजन के सरकारी कार्यक्रमों का पालन न करे, तो:

  • सरकारी नीतियों की विश्वसनीयता कम होती है
  • जनता में भ्रम पैदा होता है
  • जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास कमजोर पड़ते हैं

इस प्रकार यह प्रावधान दंडात्मक कम, नीतिगत अनुशासनात्मक अधिक है।


6. समानता बनाम वर्गीकरण

याचिकाकर्ताओं द्वारा यह भी तर्क दिया गया कि यह नियम भेदभावपूर्ण है, क्योंकि:

  • यह केवल पंचायत चुनावों पर लागू है
  • विधानसभा और लोकसभा चुनावों में ऐसी शर्त नहीं

अदालत ने कहा कि विधायिका अलग-अलग स्तरों पर अलग शर्तें निर्धारित कर सकती है। स्थानीय स्वशासन संस्थाएं जमीनी स्तर पर विकास योजनाओं और जनसंख्या कार्यक्रमों से सीधे जुड़ी होती हैं, इसलिए वहां इस तरह की नीति का औचित्य अधिक है।

यह युक्तिसंगत वर्गीकरण (Reasonable Classification) की कसौटी पर खरा उतरता है।


7. तथ्य छिपाने और हलफनामे का महत्व

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई उम्मीदवार—

  • बच्चों की संख्या गलत बताता है
  • जन्म प्रमाण या रिकॉर्ड छिपाता है

तो यह न केवल अयोग्यता का आधार है, बल्कि निर्वाचन प्रक्रिया की शुचिता पर भी प्रहार है। लोकतंत्र की बुनियाद पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा है।


8. आलोचनात्मक दृष्टिकोण

कुछ विद्वान इस नीति की आलोचना भी करते हैं:

  • ग्रामीण और अशिक्षित वर्गों में जागरूकता की कमी
  • महिलाओं पर अप्रत्यक्ष दबाव
  • सामाजिक और सांस्कृतिक कारक

फिर भी न्यायालय का दृष्टिकोण यह है कि नीति की कठोरता का मूल्यांकन न्यायालय नहीं, बल्कि विधायिका का क्षेत्र है, जब तक वह स्पष्ट रूप से असंवैधानिक न हो।


9. लोकतंत्र में जिम्मेदारी का विस्तार

यह निर्णय एक व्यापक संदेश देता है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों का ढांचा नहीं, बल्कि कर्तव्यों की प्रणाली भी है। सार्वजनिक पद प्राप्त करना विशेषाधिकार है, और इसके साथ कुछ सामाजिक मानदंडों का पालन अपेक्षित है।


निष्कर्ष: कानून, नीति और सामाजिक संदेश

      ओडिशा उच्च न्यायालय का यह निर्णय निम्न बिंदुओं को स्थापित करता है:

  • दो बच्चों का नियम संवैधानिक रूप से वैध है
  • चुनाव लड़ना पूर्ण मौलिक अधिकार नहीं
  • जनप्रतिनिधि से उच्च सामाजिक जिम्मेदारी अपेक्षित है
  • कानून के समक्ष सभी समान हैं, चाहे पद कितना भी छोटा या बड़ा हो

यह फैसला केवल एक व्यक्ति की सदस्यता का मामला नहीं, बल्कि यह संकेत है कि लोकतंत्र में नेतृत्व का अर्थ अनुकरणीय आचरण है। जनसंख्या नियंत्रण केवल सरकारी नारा नहीं, बल्कि शासन के हर स्तर पर लागू की जाने वाली नीति है।

इस प्रकार न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि पंचायत प्रतिनिधित्व केवल सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन और सार्वजनिक हित की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।