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भरण-पोषण वसूली बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता: क्या मेंटेनेंस न देना ‘अपराध’ है? परिवार अदालतों की शक्तियों की संवैधानिक सीमा

भरण-पोषण वसूली बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता: क्या मेंटेनेंस न देना ‘अपराध’ है? परिवार अदालतों की शक्तियों की संवैधानिक सीमा

प्रस्तावना

भरण-पोषण (Maintenance) भारतीय पारिवारिक कानून का एक अत्यंत मानवीय प्रावधान है। इसका उद्देश्य पति-पत्नी के बीच प्रतिशोध पैदा करना नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से निर्भर पत्नी, बच्चे या माता-पिता को गरिमापूर्ण जीवन उपलब्ध कराना है। परंतु व्यवहार में अक्सर यह देखा गया है कि भरण-पोषण आदेशों की अवहेलना को सीधे “अपराधी आचरण” की तरह लिया जाने लगा है, और परिवार अदालतें गिरफ्तारी वारंट को एक त्वरित उपाय की तरह प्रयोग करने लगी हैं।

हाल के न्यायिक रुझानों में उच्च न्यायालयों ने इस प्रवृत्ति पर गंभीर आपत्ति जताई है। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण का भुगतान न करना स्वयं में आपराधिक अपराध नहीं, बल्कि एक विधिक/दीवानी दायित्व (Civil Liability) है। इसलिए वसूली की प्रक्रिया भी दीवानी सिद्धांतों और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर ही रहनी चाहिए।

यह विषय केवल प्रक्रिया का तकनीकी विवाद नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty), मानवीय गरिमा (Human Dignity) और अनुच्छेद 21 से जुड़ा गहरा संवैधानिक प्रश्न है।


1. भरण-पोषण: अधिकार बनाम दंड

धारा 125 CrPC (अब BNSS में समकक्ष प्रावधान) का मूल उद्देश्य सामाजिक न्याय है। यह दंड संहिता का हिस्सा होते हुए भी प्रकृति में कल्याणकारी (Beneficial) और अर्ध-दीवानी (Quasi-Civil) है।

न्यायालयों ने बार-बार कहा है:

  • यह प्रावधान भूख और परित्याग के विरुद्ध सुरक्षा कवच है
  • इसका उद्देश्य पति को जेल भेजना नहीं, बल्कि आश्रित को जीवन निर्वाह देना है
  • यह “पोषण” का कानून है, “प्रतिशोध” का नहीं

इसलिए यदि भुगतान नहीं हुआ, तो पहला प्रश्न होना चाहिए — “राशि कैसे वसूली जाए?”
न कि — “व्यक्ति को तुरंत जेल कैसे भेजा जाए?”


2. परिवार अदालतों की आम गलती: ‘रूटीन वारंट संस्कृति’

व्यवहार में यह प्रवृत्ति उभर रही है कि जैसे ही बकाया राशि बढ़ती है, पत्नी की ओर से गिरफ्तारी की मांग की जाती है और कई अदालतें बिना विस्तृत कारण दर्ज किए वारंट जारी कर देती हैं।

यहाँ तीन मूलभूत त्रुटियाँ होती हैं:

(i) दायित्व को अपराध समझ लेना

भरण-पोषण न देना = आदेश की अवमानना हो सकती है, परंतु यह स्वतः IPC जैसा अपराध नहीं है।

(ii) वसूली प्रक्रिया को छोड़कर दंडात्मक उपाय अपनाना

कानून ने पहले से वैकल्पिक उपाय दिए हैं, फिर भी सीधे हिरासत की ओर बढ़ना शक्ति का असंतुलित प्रयोग है।

(iii) व्यक्ति की गरिमा की अनदेखी

हथकड़ी लगाकर अदालत लाना, सार्वजनिक अपमान — यह व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को स्थायी नुकसान पहुँचाता है, जबकि विवाद मूलतः आर्थिक है।


3. अनुच्छेद 21: केवल अपराधियों के लिए नहीं, हर नागरिक के लिए

अनुच्छेद 21 कहता है कि किसी व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता, सिवाय विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार।

यहाँ दो शब्द महत्वपूर्ण हैं:

“प्रक्रिया” (Procedure)

यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत प्रक्रिया होनी चाहिए।

“गरिमा” (Dignity)

सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि गरिमा, स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है।
यदि किसी को केवल धन न दे पाने के कारण अपराधी की तरह पेश किया जाता है, तो यह संवैधानिक मर्यादा से टकराता है।


4. वसूली के वैधानिक तरीके: पहले ये, बाद में कारावास

परिवार अदालतें भूल जाती हैं कि मेंटेनेंस आदेश की तामील Execution Proceedings की तरह की जानी चाहिए। प्रमुख उपाय:

1. वेतन से कटौती (Salary Attachment)

यदि व्यक्ति नौकरी में है, तो सीधे वेतन से राशि कटवाई जा सकती है। यह सबसे प्रभावी और कम अपमानजनक तरीका है।

2. बैंक खाते/संपत्ति की कुर्की

चल संपत्ति, बैंक बैलेंस, वाहन, अचल संपत्ति — इन पर कुर्की संभव है।

3. किश्तों में भुगतान का निर्देश

यदि एकमुश्त भुगतान संभव नहीं, तो अदालत भुगतान योजना बना सकती है।

4. दीवानी कारावास (Civil Imprisonment)

यह अंतिम उपाय है, जब:

  • व्यक्ति भुगतान करने में सक्षम हो
  • जानबूझकर आदेश की अवहेलना कर रहा हो
  • शो कॉज़ नोटिस और सुनवाई का अवसर दिया गया हो

सीधे वारंट = प्रक्रिया का शॉर्टकट, जो अक्सर अवैध सिद्ध होता है।


5. “सक्षम लेकिन भुगतान नहीं” बनाम “वास्तव में असमर्थ”

कानून यह नहीं कहता कि हर बकायेदार निर्दोष है। अंतर समझना जरूरी है:

स्थिति न्यायिक दृष्टिकोण
आय है, संपत्ति है, फिर भी भुगतान नहीं कठोर दृष्टिकोण, कारावास संभव
बेरोजगारी, बीमारी, आर्थिक संकट नरम दृष्टिकोण, पुनर्निर्धारण संभव

अदालत को पहले क्षमता (Ability to Pay) तय करनी चाहिए, तभी कठोर कदम उठाने चाहिए।


6. सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण: वसूली, दंड नहीं

उच्चतम न्यायालय ने कई मामलों में कहा है कि मेंटेनेंस आदेशों को लागू करने के लिए Execution Mechanism अपनाया जाए। उद्देश्य है:

  • आदेश की प्रभावी तामील
  • संवैधानिक अधिकारों की रक्षा
  • पारिवारिक विवाद को आपराधिक टकराव में न बदलना

7. अधिवक्ताओं के लिए व्यावहारिक रणनीति

यदि पति की ओर से पेश हो रहे हैं:

  • वारंट से पहले की प्रक्रिया की जांच करें
  • क्या आय का निर्धारण हुआ?
  • क्या वसूली के अन्य उपाय आजमाए गए?
  • क्या शो कॉज़ नोटिस दिया गया?

यदि पत्नी की ओर से पेश हो रहे हैं:

  • केवल गिरफ्तारी पर जोर न दें
  • वेतन कटौती, संपत्ति कुर्की — ये अधिक कारगर उपाय हैं
  • वास्तविक आय छिपाने के प्रमाण जुटाएँ

8. सामाजिक प्रभाव: कानून बनाम बदले की भावना

परिवारिक मुकदमे भावनात्मक होते हैं। परंतु न्यायालयों को भावनाओं से नहीं, विधिक संतुलन से चलना होता है।

यदि हर भरण-पोषण विवाद “जेल भेजो” मानसिकता में बदलेगा:

  • समझौते की संभावना खत्म होगी
  • बच्चों पर मानसिक असर पड़ेगा
  • अदालतें दंड मंच बन जाएँगी, समाधान मंच नहीं

9. मानवीय न्याय की दिशा

न्याय का उद्देश्य केवल आदेश देना नहीं, बल्कि ऐसा समाधान देना है जिससे:

  • आश्रित को पैसा मिले
  • दायित्वधारी की गरिमा न कुचली जाए
  • संवैधानिक सीमाएँ सुरक्षित रहें

भरण-पोषण कानून करुणा और व्यावहारिकता का मिश्रण है। इसे आपराधिक रंग देना उसके मूल दर्शन के विरुद्ध है।


निष्कर्ष

भरण-पोषण का भुगतान न करना निश्चित रूप से गंभीर विधिक चूक है, परंतु यह स्वतः किसी को अपराधी नहीं बनाता। परिवार अदालतों को याद रखना होगा कि वे दंड अदालत नहीं, समाधान अदालत हैं। गिरफ्तारी अंतिम उपाय है, प्रारंभिक नहीं।

संविधान का संदेश स्पष्ट है:
राज्य का हर अंग, चाहे वह परिवार अदालत ही क्यों न हो, व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करते हुए ही शक्ति का प्रयोग करे।

मेंटेनेंस का कानून पेट भरने के लिए है, प्रतिष्ठा तोड़ने के लिए नहीं।