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विशिष्ट निष्पादन बनाम स्वामित्व विवाद: संशोधन की कानूनी सीमाएँ, CPC आदेश 6 नियम 17 और न्यायालयों का दृष्टिकोण

विशिष्ट निष्पादन बनाम स्वामित्व विवाद: संशोधन की कानूनी सीमाएँ, CPC आदेश 6 नियम 17 और न्यायालयों का दृष्टिकोण

प्रस्तावना

      दीवानी न्याय प्रणाली का मूल उद्देश्य केवल तकनीकी नियमों का पालन कराना नहीं, बल्कि वास्तविक न्याय सुनिश्चित करना है। इसी कारण सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) में अभिवचनों (Pleadings) में संशोधन की व्यवस्था दी गई है। परंतु यह सुविधा असीमित नहीं है। अदालतें बार-बार स्पष्ट कर चुकी हैं कि संशोधन का उद्देश्य मुकदमे को “स्पष्ट” करना है, न कि उसे “बदल” देना।

        व्यवहार में एक जटिल स्थिति तब उत्पन्न होती है जब कोई पक्ष विशिष्ट निष्पादन (Specific Performance) के मुकदमे को संशोधन के माध्यम से स्वामित्व (Title) के मुकदमे में बदलने का प्रयास करता है। कई बार इसमें यह भी जोड़ा जाता है कि संपत्ति संयुक्त परिवार की है, या किसी लोक अदालत (Lok Adalat) के आदेश को जाली या अवैध बताया जाता है। ऐसे संशोधन न केवल विधिक सिद्धांतों के विपरीत हैं, बल्कि मुकदमे की मूल प्रकृति को ही समाप्त कर देते हैं।


1. विशिष्ट निष्पादन का मुकदमा: मूल रूप से संविदात्मक अधिकार

विशिष्ट निष्पादन का वाद विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 के अंतर्गत दायर किया जाता है। इसका आधार एक अनुबंध (Agreement to Sell) होता है। यह मुकदमा इस सिद्धांत पर आधारित है कि यदि एक पक्ष ने अपनी संविदात्मक जिम्मेदारी पूरी करने की तत्परता दिखाई है, तो दूसरा पक्ष अनुबंध से पीछे नहीं हट सकता।

अदालत किन प्रश्नों पर विचार करती है?

  • क्या पक्षों के बीच वैध अनुबंध हुआ था?
  • क्या वादी अनुबंध निभाने के लिए तैयार और इच्छुक था?
  • क्या प्रतिवादी ने अनुबंध का उल्लंघन किया?

इस मुकदमे का फोकस केवल अनुबंध के पालन पर होता है। अदालत यह नहीं तय करती कि संपत्ति का अंतिम स्वामी कौन है, जब तक कि यह प्रश्न सीधे अनुबंध से जुड़ा न हो।

“In Personam” प्रकृति

विशिष्ट निष्पादन का अधिकार व्यक्ति विशेष के विरुद्ध लागू होता है। यह संपत्ति पर सार्वभौमिक घोषणा (Declaration of Title) नहीं है। इसलिए इसे स्वामित्व के मुकदमे के बराबर नहीं माना जा सकता।


2. स्वामित्व (Title) का मुकदमा: पूरी तरह अलग विधिक क्षेत्र

स्वामित्व से संबंधित मुकदमे में अदालत को संपत्ति की पूरी कानूनी स्थिति देखनी पड़ती है — जैसे:

  • उत्तराधिकार का क्रम
  • पूर्व विक्रय विलेख (Sale Deeds)
  • विभाजन (Partition)
  • संयुक्त परिवार संपत्ति का स्वरूप
  • कब्जा (Possession)

यह मुकदमा “In Rem” प्रकृति का होता है, यानी संपत्ति के संबंध में सार्वभौमिक अधिकार तय करता है। स्पष्ट है कि यह विशिष्ट निष्पादन के मुकदमे से पूरी तरह भिन्न है।


3. CPC आदेश 6 नियम 17: संशोधन की शक्ति और सीमा

आदेश 6 नियम 17 अदालत को यह शक्ति देता है कि वह न्याय के हित में अभिवचनों में संशोधन की अनुमति दे सके। लेकिन 2002 के संशोधन के बाद यह शक्ति सीमित कर दी गई। अब ट्रायल शुरू होने के बाद संशोधन तभी संभव है जब पक्ष यह साबित करे कि उसने पूरी सावधानी (Due Diligence) बरती थी।

संशोधन कब स्वीकार्य?

  • तथ्य स्पष्ट करने के लिए
  • टंकण या तकनीकी त्रुटि सुधारने के लिए
  • मूल दावे का बेहतर प्रस्तुतीकरण करने के लिए

संशोधन कब अस्वीकार्य?

  • जब मुकदमे की प्रकृति बदल जाए
  • जब नया Cause of Action जोड़ा जाए
  • जब विरोधी पक्ष का बचाव समाप्त हो जाए

4. विशिष्ट निष्पादन से स्वामित्व विवाद में बदलाव — कानूनी समस्या

यदि वादी पहले यह कहे कि प्रतिवादी ने उसे संपत्ति बेचने का अनुबंध किया, और बाद में संशोधन द्वारा यह कहे कि संपत्ति तो संयुक्त परिवार की है और प्रतिवादी को बेचने का अधिकार ही नहीं था — तो यह सीधा विरोधाभास है।

असंगत अभिवचन

कानून यह अनुमति नहीं देता कि एक पक्ष एक ही मुकदमे में दो विपरीत स्थितियाँ ले। इसे न्यायिक भाषा में कहा जाता है:
“A party cannot approbate and reprobate.”

मुकदमे की प्रकृति में मूल परिवर्तन

विशिष्ट निष्पादन = अनुबंध लागू करवाना
स्वामित्व मुकदमा = संपत्ति अधिकार घोषित कराना

दोनों मुकदमों की प्रकृति, साक्ष्य और मुद्दे पूरी तरह अलग हैं। संशोधन के माध्यम से एक को दूसरे में बदलना अदालतें स्वीकार नहीं करतीं।


5. लोक अदालत के आदेश को चुनौती: अलग मुकदमे की आवश्यकता

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 21 के अनुसार लोक अदालत का निर्णय दीवानी अदालत की डिक्री के समान होता है और अंतिम माना जाता है।

यदि कोई पक्ष यह कहता है कि लोक अदालत का आदेश धोखाधड़ी से प्राप्त हुआ, तो उसका उपाय यह है कि वह अलग दीवानी वाद दायर करे। विशिष्ट निष्पादन के मुकदमे में संशोधन करके लोक अदालत के आदेश को चुनौती देना विधिक रूप से गलत है।


6. न्यायालयों का दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि:

  • संशोधन से मुकदमे का मूल स्वरूप नहीं बदलना चाहिए
  • असंगत या नया मामला जोड़ना अनुचित है
  • देरी से किया गया संशोधन संदेहास्पद माना जाता है

न्यायालय प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए कठोर रुख अपनाते हैं।


7. व्यावहारिक प्रभाव

यदि ऐसे संशोधन स्वीकार किए जाएँ:

  • मुकदमा फिर से शुरू होगा
  • नए मुद्दे तय होंगे
  • गवाहों की पुनः परीक्षा होगी
  • वर्षों की देरी होगी

यह न्याय व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डालता है।


8. वैकल्पिक उपाय उपलब्ध

वादी के पास स्वामित्व का अलग मुकदमा दायर करने का अधिकार है। इसलिए अदालतें कहती हैं कि जब वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो, तो मूल मुकदमे को विकृत करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।


9. कानूनी सिद्धांत का सार

संशोधन का उद्देश्य न्याय में सहायता करना है, न कि मुकदमे को नया जीवन देना।
विशिष्ट निष्पादन और स्वामित्व विवाद दो अलग विधिक धाराएँ हैं, जिन्हें मिलाना प्रक्रिया का दुरुपयोग है।


निष्कर्ष

न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि मुकदमों की प्रकृति स्पष्ट और निश्चित रहे। यदि विशिष्ट निष्पादन जैसे संविदात्मक मुकदमे को संशोधन द्वारा स्वामित्व या जालसाजी के जटिल विवाद में बदल दिया जाए, तो यह न केवल कानून की भावना के विरुद्ध है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को अनिश्चित और अंतहीन बना देता है।

इसलिए न्यायालयों ने स्पष्ट रेखा खींच दी है — संशोधन की अनुमति है, परंतु मुकदमे की आत्मा को बदला नहीं जा सकता।