चयन प्रक्रिया में निष्पक्षता का संवैधानिक सिद्धांत: ‘पूर्वाग्रह’ से दूषित चयन और न्यायिक नियंत्रण की आवश्यकता
प्रस्तावना: चयन समिति केवल प्रशासनिक निकाय नहीं, न्यायिक दायित्व भी
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में नियुक्ति, पदोन्नति और चयन की प्रक्रियाएँ केवल प्रशासनिक औपचारिकताएँ नहीं होतीं; वे राज्य की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विधिक विश्वसनीयता का दर्पण होती हैं। जब कोई चयन समिति गठित होती है, तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह व्यक्तिगत संबंधों, पूर्व विवादों, विभागीय राजनीति या निजी भावनाओं से परे रहकर केवल योग्यता, नियमों और वस्तुनिष्ठ मानदंडों के आधार पर निर्णय लेगी।
किन्तु समस्या तब उत्पन्न होती है जब चयन समिति में ऐसा अधिकारी शामिल हो, जिसके विरुद्ध उम्मीदवार ने पूर्व में कोई गंभीर कानूनी कार्यवाही—जैसे अवमानना (Contempt of Court)—आरंभ की हो। ऐसी स्थिति में प्रश्न यह नहीं रहता कि निर्णय वास्तव में पक्षपाती था या नहीं, बल्कि यह कि क्या निष्पक्षता दिखाई दे रही थी?
न्यायालयों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि ऐसी परिस्थितियाँ चयन प्रक्रिया को विधिक रूप से दूषित (vitiated) कर सकती हैं। यह दृष्टिकोण प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों की आधुनिक व्याख्या है।
प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का केंद्रीय स्थान
प्रशासनिक कानून का पूरा ढांचा दो मूल सिद्धांतों पर आधारित है:
- Audi Alteram Partem – दूसरे पक्ष को सुनो
- Nemo Judex in Causa Sua – कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता
दूसरा सिद्धांत यहाँ अत्यंत प्रासंगिक है। इसका अर्थ केवल यह नहीं कि अधिकारी स्वयं सीधे विवाद का पक्षकार हो, बल्कि यह भी कि उसकी स्थिति ऐसी न हो जिससे उसकी निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हो।
न्यायालय का दृष्टिकोण है कि निष्पक्षता केवल वास्तविक नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष (apparent) भी होनी चाहिए।
पूर्वाग्रह (Bias) की अवधारणा: केवल भावना नहीं, विधिक दोष
पूर्वाग्रह का अर्थ है—ऐसी मानसिक स्थिति जिसमें निर्णय लेने वाला व्यक्ति पहले से झुका हुआ हो। प्रशासनिक कानून में यह एक गंभीर विधिक दोष माना जाता है।
पूर्वाग्रह के प्रकार
- व्यक्तिगत पूर्वाग्रह (Personal Bias)
जब निर्णय लेने वाले और प्रभावित व्यक्ति के बीच व्यक्तिगत शत्रुता या निकटता हो। उदाहरण: पूर्व मुकदमा, विभागीय विवाद, अनुशासनात्मक कार्यवाही। - आर्थिक पूर्वाग्रह (Pecuniary Bias)
जब निर्णय से अधिकारी को आर्थिक लाभ या हानि हो सकती हो। - विषयगत पूर्वाग्रह (Subject-Matter Bias)
जब अधिकारी पहले से उस विषय पर स्पष्ट राय बना चुका हो। - संस्थागत पूर्वाग्रह (Departmental/Institutional Bias)
जब अधिकारी किसी विभागीय नीति या हित के कारण प्रभावित हो सकता हो।
इनमें व्यक्तिगत पूर्वाग्रह सबसे खतरनाक माना जाता है, क्योंकि यह सीधे मानवीय भावनाओं से जुड़ा होता है।
“Real Likelihood of Bias” — न्यायालय की कसौटी
न्यायालय यह नहीं देखता कि पूर्वाग्रह सिद्ध हुआ या नहीं, बल्कि यह देखता है:
क्या परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि एक सामान्य, विवेकशील व्यक्ति निष्पक्षता पर संदेह कर सकता है?
यदि उत्तर “हाँ” है, तो निर्णय रद्द किया जा सकता है। इसे ही “Real likelihood of bias” कहा जाता है।
अवमानना (Contempt) विवाद: विशेष संवेदनशील स्थिति
अवमानना की कार्यवाही किसी भी सरकारी अधिकारी के लिए अत्यंत गंभीर होती है। इसके परिणामस्वरूप:
- न्यायालय की फटकार
- दंड या जुर्माना
- प्रतिष्ठा को आघात
- सेवा रिकॉर्ड पर नकारात्मक प्रभाव
यदि किसी उम्मीदवार ने ऐसे अधिकारी के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही शुरू की हो, तो दोनों के बीच स्वाभाविक रूप से तनाव, कटुता और मनोवैज्ञानिक दूरी उत्पन्न हो सकती है।
न्यायालयों का दृष्टिकोण यह है कि ऐसी स्थिति में उस अधिकारी से पूर्ण तटस्थता की अपेक्षा करना अव्यावहारिक है। इसलिए उसकी उपस्थिति ही चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा सकती है।
रिक्यूजल (Recusal): प्रशासनिक नैतिकता का दायित्व
निष्पक्ष प्रशासन केवल नियमों से नहीं, बल्कि नैतिकता से चलता है। यदि किसी अधिकारी को यह आभास हो कि:
- उसका उम्मीदवार से पूर्व विवाद रहा है
- उसकी उपस्थिति से निष्पक्षता पर संदेह उठ सकता है
तो उसे स्वेच्छा से स्वयं को अलग कर लेना चाहिए। इसे रिक्यूजल (Recusal) कहा जाता है।
ऐसा न करना केवल नैतिक कमी नहीं, बल्कि न्यायिक समीक्षा में निर्णय को अस्थिर बना सकता है।
“Justice must be seen to be done” — दिखाई देने वाला न्याय
यह एक स्थापित न्यायिक सिद्धांत है कि:
न्याय केवल किया जाना पर्याप्त नहीं; वह होता हुआ दिखना भी चाहिए।
चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी निष्पक्षता। यदि जनता या उम्मीदवार को लगे कि निर्णय किसी व्यक्तिगत कारण से प्रभावित हो सकता है, तो प्रक्रिया की वैधता कमजोर पड़ जाती है।
प्रक्रिया की शुद्धता बनाम परिणाम की शुद्धता
न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि:
✔ भले ही चयन वस्तुतः मेरिट पर हुआ हो
✔ भले ही कोई ठोस दुर्भावना सिद्ध न हो
फिर भी यदि प्रक्रिया में पूर्वाग्रह की संभावना है, तो परिणाम शून्य घोषित किया जा सकता है।
इसका अर्थ है कि विधिक वैधता का आधार प्रक्रिया की शुद्धता है, परिणाम की नहीं।
संवैधानिक आयाम
पूर्वाग्रह से दूषित चयन प्रक्रिया निम्न संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकती है:
- अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
- मनमानी का निषेध (Doctrine of Arbitrariness)
- न्यायसंगत प्रक्रिया का सिद्धांत (Fair Procedure)
इस आधार पर उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत हस्तक्षेप कर सकता है।
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की भूमिका
न्यायालय प्रशासनिक निर्णयों में तभी हस्तक्षेप करता है जब:
- प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हो
- निर्णय मनमाना हो
- प्रक्रिया पूर्वाग्रह से दूषित हो
चयन समिति की संरचना और उसकी निष्पक्षता न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है।
व्यावहारिक उपाय: उम्मीदवार क्या कर सकता है
यदि किसी उम्मीदवार को संदेह हो कि चयन समिति में शत्रुतापूर्ण अधिकारी है, तो उसे:
- चयन प्रक्रिया के दौरान लिखित आपत्ति दर्ज करनी चाहिए
- पूर्व विवाद के दस्तावेज प्रस्तुत करने चाहिए
- चयन परिणाम के बाद रिट याचिका दायर करनी चाहिए
- “Real likelihood of bias” का तर्क उठाना चाहिए
प्रशासनिक तंत्र के लिए संदेश
यह सिद्धांत प्रशासनिक अधिकारियों को याद दिलाता है कि:
- पद व्यक्तिगत शक्ति नहीं, सार्वजनिक विश्वास है
- कुर्सी प्रतिशोध का माध्यम नहीं
- पारदर्शिता और तटस्थता प्रशासनिक वैधता की शर्त है
निष्कर्ष: निष्पक्षता लोकतंत्र की आत्मा है
चयन प्रक्रिया में पूर्वाग्रह केवल व्यक्तिगत अन्याय नहीं, बल्कि संस्थागत विश्वसनीयता पर प्रहार है। यदि चयन समिति में ऐसा अधिकारी बैठा हो जिसकी मानसिक तटस्थता पर संदेह हो, तो पूरी प्रक्रिया विधिक रूप से अस्थिर हो जाती है।
न्यायपालिका का स्पष्ट संदेश है:
जहाँ पूर्वाग्रह की वास्तविक संभावना है, वहाँ चयन प्रक्रिया वैध नहीं मानी जा सकती।
लोकतांत्रिक शासन की स्थिरता इसी सिद्धांत पर टिकी है कि निर्णय लेने वाला तटस्थ हो—और तटस्थ दिखाई भी दे।