UP मोटर वाहन अधिनियम संशोधन: सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति, सरकार का संशोधित प्रस्ताव और विधिक निहितार्थ
पृष्ठभूमि: विवाद की शुरुआत और उद्देश्य
उत्तर प्रदेश सरकार ने 2023 में एक नया विधान पारित किया — Uttar Pradesh Criminal Law (Composition of Offences and Abatement of Trials) Act, 2023 — जिसका लक्ष्य उन मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act, 1988) के तहत चल रहे लंबित मुकदमों को समाप्त करना था जो 31 दिसंबर, 2021 तक अदालतों में विचाराधीन थे। सरकार का उद्देश्य था कि लंबित ट्रायल्स को ‘abate’ करने से आगे की कार्रवाई स्वतः समाप्त हो जाए, जिससे अदालतों पर बोझ कम हो सके।
हालाँकि, इस कदम ने कानून और सड़क सुरक्षा से जुड़े विचारों को फिर से गरमा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने जब मामले की सुनवाई की, तो उसने इस प्रावधान की गंभीर नैतिक और संवैधानिक चुनौतियों पर कड़ी आपत्ति जताई।
सुप्रीम कोर्ट की आपत्तियाँ: गंभीर चिंताएँ और दलीलें
सुप्रीम कोर्ट की पीठ — जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन शामिल थे — ने इस संशोधन कानून की सीधी आलोचना की। अदालत ने कहा कि यह कानून न केवल न्याय के सिद्धांतों को कमजोर कर सकता है, बल्कि सामान्य जनता की सुरक्षा और सड़क नियमों की प्रभावशीलता को भी ख़तरे में डाल देता है।
मुख्य आपत्तियाँ इस प्रकार रही:
1) निवारकता (Deterrence) समाप्त हो जाएगी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ट्रायल्स का एक झटके में समाप्त हो जाना मोटर वाहन अधिनियम की निवारक क्षमता (deterrent effect) को मिटा दे सकता है।
विशेषकर ड्रंक ड्राइविंग, लाल बत्ती पार करना, नशे में गाड़ी चलाना जैसे मामलों में मुकदमों का ‘खत्म’ हो जाना सड़क सुरक्षा नियमों के उल्लंघन को बढ़ावा दे सकता है।
2) गंभीर अपराधों का भी निवारण हो रहा है
कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान उन गंभीर प्रावधानों को भी खत्म कर रहा था, जिन्हें compoundable (मामले तय करने योग्य) नहीं माना जाता। न्यायालय ने विशेष रूप से धारा 185 (ड्रंक ड्राइविंग) जैसे प्रावधान का उदाहरण दिया जिसमें न केवल जुर्माना बल्कि आवश्यकतः जेल या कड़ी कार्रवाई शामिल है — और ऐसे मामलों में ट्रायल समाप्त होना खतरनाक संकेत दे सकता है।
3) कानून बनाम कानून – संवैधानिकता का प्रश्न
पिटिशन में यह दलील भी पेश की गई कि यह राज्य कानून मोटर वाहन अधिनियम जैसे केंद्रीय कानून से प्रतिग्रही (Repugnant) है। उत्तर प्रदेश प्रशासन ने वर्ष 1979 से संशोधन के अधिकार का हवाला दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाए कि क्या यह एक केंद्रीय कानून के संचालन को प्रभावित करने का प्रयास नहीं है।
सारांश में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भीड़ घटाने के नाम पर सड़क सुरक्षा अपराधों की कार्यवाही बंद कर देना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
सरकार का संशोधित प्रस्ताव: संतुलन की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियों के बाद यूपी सरकार ने अपने प्रारंभिक प्रावधान को संशोधित करने का प्रस्ताव रखा है, ताकि गंभीर मामलों में ट्रायल समाप्त न हो। इस संशोधित प्रस्ताव की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
अपराधों का वर्गीकरण
अब सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि केवल हल्के तकनीकी या compoundable offences ही abate हों, जबकि वे मुकदमे जो गंभीर हैं, जिनके लिए अनिवार्य imprisonment है, या जो non-compoundable offences हैं जैसे:
- ड्रंक ड्राइविंग
- नशे में वाहन चलाना
- अन्य सांकेतिक रूप से गंभीर कानूनी प्रावधान
इन मामलों में ट्रायल समाप्त नहीं होंगे।
न्यायिक विवेकाधिकार का समावेश
संशोधित कानून में यह प्रस्ताव है कि मुकदमे खत्म करने का अंतिम निर्णय मजिस्ट्रेट या संबंधित अदालत के पास दिया जाए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया के तहत यह सुनिश्चित हो सके कि हर केस का व्यक्तिगत मूल्यांकन हो।
पक्षों के अधिकारों की रक्षा
यह भी प्रस्तावित किया जा रहा है कि जिन मामलों में पीड़ित का मुआवजा (Compensation) लंबित है, उन पर कानून का कोई प्रभाव नहीं पड़े। इससे यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि पीड़ित न्याय तथा मुआवजे के अधिकार से वंचित न हों।
प्रभाव और संभावित चुनौतियाँ
न्यायपालिका और मुकदमों का बोझ
यदि संशोधन लागू होता है, तो यह सभी मामलों को समाप्त करने वाला स्पष्ट रूप से नहीं, बल्कि एक चयनात्मक प्रणाली लागू करेगा, जिससे गंभीर मामलों में न्याय प्रक्रिया जारी रहेगी। इससे लंबित मुकदमों की संख्या में कुछ कटौती संभव है, परंतु यह पूर्ण रूप से समाप्त नहीं होंगे। अदालतें अब यह भी मूल्यांकन करेंगी कि क्या यह संशोधन केंद्रीय कानून के अनुरूप है या नहीं।
सड़क सुरक्षा के दृष्टिकोण
यदि केवल हल्के अपराधों को ही abate किया जाता है, तो सड़क सुरक्षा के मुद्दों पर यह एक संतुलित कदम माना जा सकता है। हालांकि कोर्ट और विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पहले भी गंभीर नियमों का उल्लंघन संजीदा होता है और इसका प्रभाव सड़क दुर्घटनाओं व मौतों पर पड़ा है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह संशोधन वास्तविक जीवन में रोड डिसिप्लिन को प्रभावित करेगा या नहीं।
पीड़ितों के अधिकार
मोटर दुर्घटना दावों और मुआवजे के मामलों में, यदि ट्रायल रुक जाए तो पीड़ितों को न्याय तथा मुआवजा प्राप्त करने में देरी हो सकती है। संशोधन में इस बात पर बल दिया गया है कि पीड़ितों के मुआवजे के अधिकार को सुरक्षित रखा जाए, जो न्यायपालिका के मूल सिद्धांतों के अनुरूप है।
विधिक और संवैधानिक मूल्यांकन
मुख्य विवाद यह है कि क्या राज्य स्तर पर ट्रायल समाप्त करने का प्रावधान किसी केंद्रीय कानून की धारणाओं से प्रतिकूल (Repugnant) है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस बिंदु पर दी गयी दलीलों के आधार पर कहा है कि यदि दो कानून एक ही विषय पर वैधानिक रूप से टकराते हैं, तो केंद्रीय कानून को प्राथमिकता मिलती है; विशेषकर जब मोटर वाहन अधिनियम संसद द्वारा पारित केंद्रीय कानून हो।
इसलिए, सुप्रीम कोर्ट ने संशोधन को लागू करने की अनुमति देते समय भी कहा है कि यह मामला अगली सुनवाई तक constitutional validity के प्रश्न को खुला रखता है — जिससे आगे यह तय होगा कि संशोधन कानून के कुछ हिस्से केंद्रीय कानून के विपरीत हैं या नहीं।
निष्कर्ष: संतुलन बनाम सरल समाधान
उत्तर प्रदेश सरकार का लक्ष्य अदालतों पर लंबित मुकदमों का बोझ कम करना था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि भीड़ कम करने का प्रयास तभी न्यायसंगत है जब मुख्य उद्देश्यों — सड़क सुरक्षा, पीड़ितों के अधिकार, और सार्वजनिक विश्वास — की रक्षा हो। संशोधित प्रस्ताव सरकार की तरफ से इसी संतुलन की कोशिश है, जो केवल महत्त्वहीन मामलों को ही प्रभावित करेगा।