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निजता बनाम पुरातन सोच: ‘कौमार्य परीक्षण’ पर न्यायपालिका का प्रहार और स्त्री गरिमा का संवैधानिक संरक्षण

निजता बनाम पुरातन सोच: ‘कौमार्य परीक्षण’ पर न्यायपालिका का प्रहार और स्त्री गरिमा का संवैधानिक संरक्षण

प्रस्तावना

         भारतीय समाज तीव्र आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, परंतु वैवाहिक विवादों में आज भी कुछ ऐसे तर्क सामने आ जाते हैं जो सदियों पुरानी सामाजिक धारणाओं से संचालित होते हैं। इन्हीं में से एक है — ‘कौमार्य परीक्षण’ (Virginity Test)। अदालतों के समक्ष जब इस प्रकार की मांग रखी जाती है, तो यह केवल एक निजी विवाद नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे-सीधे महिला की गरिमा, निजता और शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) से जुड़ा संवैधानिक प्रश्न बन जाता है। हाल के न्यायिक रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध ऐसे परीक्षण के लिए बाध्य करना कानून, नैतिकता और मानवाधिकार — तीनों के विरुद्ध है।


1. विवाद की प्रकृति: विवाह, संदेह और ‘चरित्र’ की गलत कसौटी

      अक्सर वैवाहिक मुकदमों में पति द्वारा यह आरोप लगाया जाता है कि पत्नी विवाह के समय ‘वर्जिन’ नहीं थी और इस आधार पर विवाह को निरस्त (Voidable) घोषित करने की मांग की जाती है। यह मांग प्रायः हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12 के अंतर्गत की जाती है, जहाँ धोखे (Fraud) के आधार पर विवाह रद्द करने का प्रावधान है।

परंतु कानूनी प्रश्न यह है —
क्या ‘कौमार्य’ विवाह की वैधता का आवश्यक तत्व है?
कानून का उत्तर स्पष्ट है — नहीं।

धारा 12 में जिन आधारों का उल्लेख है, उनमें नपुंसकता (Impotency), मानसिक विकार, या सहमति में धोखा जैसे तत्व आते हैं; परंतु ‘कौमार्य’ का कहीं उल्लेख नहीं। अतः इस आधार पर मेडिकल परीक्षण की मांग स्वयं में ही कानूनी रूप से अप्रासंगिक (Legally Irrelevant) है।


2. अनुच्छेद 21: गरिमामय जीवन का अधिकार

      भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन की रक्षा नहीं करता, बल्कि “गरिमामय जीवन” (Right to Live with Dignity) की गारंटी देता है। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि इसमें निम्न अधिकार शामिल हैं:

  • शारीरिक अखंडता (Bodily Integrity)
  • मानसिक सम्मान
  • व्यक्तिगत स्वायत्तता
  • यौनिकता पर नियंत्रण (Sexual Autonomy)

किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध ‘कौमार्य परीक्षण’ के लिए मजबूर करना उसकी देह को ‘साक्ष्य’ की वस्तु बना देना है। यह व्यक्ति को वस्तु में बदलने जैसा है, जिसे संविधान स्वीकार नहीं करता।


3. निजता का अधिकार — पुट्टस्वामी निर्णय का प्रभाव

के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया। इस निर्णय के अनुसार:

“निजता में व्यक्ति का शरीर, मन और यौनिक पहचान शामिल है।”

कौमार्य परीक्षण सीधे तौर पर महिला के निजी यौन जीवन की जांच है, जो उसकी सहमति के बिना की जाए तो यह निजता का घोर उल्लंघन है। अदालतें अब इस सिद्धांत को वैवाहिक मामलों में भी समान रूप से लागू कर रही हैं।


4. ‘टू-फिंगर टेस्ट’ पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति — समान सिद्धांत

     सुप्रीम कोर्ट ने Lillu @ Rajesh v. State of Haryana (2013) में बलात्कार पीड़िताओं पर किए जाने वाले ‘टू-फिंगर टेस्ट’ को असंवैधानिक बताया था। अदालत ने कहा:

  • यह परीक्षण वैज्ञानिक रूप से अविश्वसनीय है
  • यह पीड़िता की गरिमा का अपमान है
  • इससे उसके ‘चरित्र’ का आकलन करना अवैध है

यही तर्क ‘कौमार्य परीक्षण’ पर भी लागू होता है। हाइमेन (Hymen) का अस्तित्व या अनुपस्थिति ‘चरित्र’ या ‘नैतिकता’ का प्रमाण नहीं हो सकता।


5. साक्ष्य अधिनियम के तहत प्रासंगिकता (Relevancy)

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के अनुसार केवल वही तथ्य स्वीकार्य हैं जो विवाद के निपटारे के लिए आवश्यक हों। यदि कोई तथ्य कानूनी मुद्दे से जुड़ा ही नहीं है, तो वह ‘अप्रासंगिक’ (Irrelevant) है।

चूंकि:

  • विवाह की वैधता ‘कौमार्य’ पर निर्भर नहीं
  • वैज्ञानिक रूप से भी परीक्षण निर्णायक नहीं
  • और यह महिला की गरिमा का उल्लंघन करता है

अतः अदालतें इसे अप्रासंगिक और अस्वीकार्य साक्ष्य मान रही हैं।


6. स्त्री गरिमा और संवैधानिक नैतिकता

भारतीय न्यायपालिका ने हाल के वर्षों में “Constitutional Morality” की अवधारणा पर बल दिया है। इसका अर्थ है कि न्याय केवल परंपराओं से नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों से निर्देशित होगा।

महिला को ‘पवित्रता’ की कसौटी पर परखना:

  • लैंगिक समानता (Article 14) के विरुद्ध
  • गरिमा (Article 21) के विरुद्ध
  • और भेदभावरहित समाज की अवधारणा (Article 15) के विरुद्ध है

7. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दृष्टिकोण

भारत CEDAW (Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination Against Women) का हस्ताक्षरकर्ता है। यह संधि महिलाओं के विरुद्ध अपमानजनक प्रथाओं को समाप्त करने की मांग करती है। संयुक्त राष्ट्र ने भी ‘Virginity Testing’ को मानवाधिकार उल्लंघन माना है।


8. सामाजिक प्रभाव: न्यायालय का संदेश

अदालतों का यह रुख केवल कानूनी आदेश नहीं, बल्कि समाज को संदेश है कि:

  • महिला का सम्मान उसके शरीर की जैविक स्थिति से नहीं जुड़ा
  • विवाह विश्वास पर आधारित है, चिकित्सा प्रमाणपत्र पर नहीं
  • न्यायालय ‘चरित्र हनन’ को मुकदमेबाजी का हथियार बनने नहीं देंगे

9. वैवाहिक मुकदमों पर प्रभाव

इस दृष्टिकोण के बाद:

  • निचली अदालतें ऐसे परीक्षण आदेश देने से बचेंगी
  • मेडिकल जांच केवल तब होगी जब वह कानूनी रूप से आवश्यक और सहमति आधारित हो
  • ‘चरित्र’ पर आधारित दलीलें कमजोर होंगी

10. वकालत के क्षेत्र के लिए सीख

एक वकील के लिए यह निर्णय महत्वपूर्ण है:

  1. संवेदनशील पैरवी: अदालतें अब अपमानजनक मांगों को गंभीरता से देखती हैं।
  2. संवैधानिक तर्कों का महत्व: अब निजी विवादों में भी मौलिक अधिकारों की दलील निर्णायक बन रही है।
  3. नैतिक जिम्मेदारी: वकालत केवल कानूनी जीत नहीं, बल्कि न्याय और गरिमा की रक्षा भी है।

निष्कर्ष

‘कौमार्य परीक्षण’ पर न्यायपालिका का सख्त रुख यह स्पष्ट करता है कि भारतीय कानून अब महिला को ‘सम्मान की वस्तु’ नहीं, बल्कि अधिकारों से युक्त स्वायत्त व्यक्ति के रूप में देखता है। विवाह संबंध विश्वास, समानता और गरिमा पर आधारित हैं — न कि किसी जैविक मिथक पर।

यह न्यायिक दृष्टिकोण भारतीय समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश देता है:
स्त्री का सम्मान परंपराओं से नहीं, संविधान से तय होगा।