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BNS में ‘चोरी’ (Theft) की परिभाषा और सजा IPC और नए कानून में क्या अंतर है?

BNS में ‘चोरी’ (Theft) की परिभाषा और सजा IPC और नए कानून में क्या अंतर है?

प्रस्तावना: आपराधिक न्याय प्रणाली का नया युग

      भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली ने 1 जुलाई 2024 से एक नए युग में प्रवेश किया है। औपनिवेशिक काल से चले आ रहे भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) को निरस्त कर उसकी जगह भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) को लागू किया गया है। यह परिवर्तन केवल नाम का नहीं, बल्कि सोच और दृष्टिकोण का भी है। नया कानून दंड के साथ-साथ न्याय और सुधार पर अधिक बल देता है।

     ‘चोरी’ (Theft) भारतीय समाज में सबसे सामान्य और प्रचलित अपराधों में से एक है। सड़क पर मोबाइल झपटना, दुकान से सामान उठा लेना, या किसी के घर से नकदी चुरा लेना—ये सभी चोरी के उदाहरण हैं। हालांकि BNS में चोरी की मूल अवधारणा को IPC से बहुत अलग नहीं किया गया है, लेकिन धाराओं की संरचना, सजा के प्रावधान और अपराध के वर्गीकरण में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।

इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि:

  • BNS में चोरी की नई परिभाषा क्या है
  • IPC और BNS की धाराओं में क्या अंतर है
  • सजा के प्रावधान कितने बदले हैं
  • और यह बदलाव आम नागरिकों व कानून के छात्रों के लिए क्या मायने रखते हैं

1. चोरी की परिभाषा: IPC धारा 378 बनाम BNS धारा 303(1)

IPC की धारा 378 में चोरी की जो परिभाषा दी गई थी, उसे भारतीय न्याय संहिता ने लगभग उसी रूप में अपनाया है। BNS की धारा 303(1) चोरी को परिभाषित करती है।

सरल शब्दों में, चोरी का अर्थ है—
किसी व्यक्ति की चल संपत्ति को उसकी सहमति के बिना बेईमानी से उसके कब्जे से हटाना।


चोरी के पाँच अनिवार्य तत्व (Essential Ingredients of Theft)

चोरी का अपराध तभी बनता है जब निम्नलिखित पाँचों तत्व एक साथ मौजूद हों:

1. बेईमानी से इरादा (Dishonest Intention)

आरोपी का उद्देश्य संपत्ति को गलत तरीके से हासिल करना होना चाहिए। यदि इरादा बेईमानी का नहीं है, तो चोरी नहीं मानी जाएगी।

2. चल संपत्ति (Movable Property)

चोरी केवल चल संपत्ति की ही हो सकती है—जैसे:

  • मोबाइल फोन
  • पैसा
  • गहने
  • वाहन

अचल संपत्ति (जैसे जमीन या मकान) की चोरी संभव नहीं है।

3. कब्जे से बाहर ले जाना (Taking Out of Possession)

संपत्ति को किसी व्यक्ति के कब्जे से हटाया जाना आवश्यक है। मालिक होना जरूरी नहीं, कब्जे में होना पर्याप्त है।

4. सहमति के बिना (Without Consent)

यदि मालिक या कब्जेदार की स्पष्ट या निहित सहमति है, तो चोरी नहीं बनेगी।

5. हटाने की क्रिया (Moving)

संपत्ति को उसके स्थान से थोड़ा सा भी हटाना चोरी के अपराध को पूर्ण कर देता है।

इन पाँचों तत्वों में IPC और BNS के बीच कोई मौलिक अंतर नहीं है, जो यह दर्शाता है कि चोरी की बुनियादी अवधारणा को बदला नहीं गया है।


2. धाराओं का नया गणित: IPC से BNS तक

BNS में सबसे बड़ा व्यावहारिक बदलाव धाराओं के क्रमांक को लेकर है। वकीलों, पुलिस और कानून के छात्रों के लिए यह बदलाव शुरुआती दौर में चुनौतीपूर्ण है।

IPC बनाम BNS: चोरी से संबंधित धाराओं की तुलना

अपराध का प्रकार IPC (पुरानी धारा) BNS (नई धारा)
चोरी की परिभाषा धारा 378 धारा 303(1)
सामान्य चोरी की सजा धारा 379 धारा 303(2)
घर में चोरी धारा 380 धारा 305
क्लर्क/नौकर द्वारा चोरी धारा 381 धारा 306
चोरी हेतु चोट की तैयारी धारा 382 धारा 307

अब पुलिस FIR और अदालतों के आदेशों में IPC की जगह BNS की धाराओं का प्रयोग अनिवार्य हो गया है।


3. सजा के प्रावधानों में मुख्य बदलाव

BNS ने चोरी के अपराध में दंडात्मक और सुधारात्मक (Reformative) दोनों दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया है।


(A) सामान्य चोरी – BNS धारा 303(2)

IPC की धारा 379 के अंतर्गत:

  • अधिकतम सजा: 3 वर्ष की कैद
  • या जुर्माना
  • या दोनों

BNS की धारा 303(2) में:

  • अधिकतम सजा: 3 वर्ष की कैद
  • जुर्माना
  • और कुछ मामलों में सामुदायिक सेवा (Community Service) का विकल्प

यह बदलाव दर्शाता है कि हर चोरी के मामले में जेल ही अंतिम समाधान नहीं है।


(B) बार-बार चोरी करने पर सख्ती

BNS में Recurrent Offenders यानी बार-बार अपराध करने वालों के लिए अधिक कठोर दंड का संकेत दिया गया है। यदि कोई व्यक्ति पहले भी चोरी के अपराध में दोषसिद्ध हो चुका है, तो न्यायालय:

  • सजा की अवधि बढ़ा सकती है
  • जुर्माने की राशि अधिक कर सकती है

(C) पहचान छिपाकर या तकनीकी माध्यम से चोरी

BNS ने आधुनिक अपराधों को ध्यान में रखते हुए यह स्पष्ट किया है कि:

  • फर्जी पहचान
  • डिजिटल या तकनीकी साधनों
  • या छलपूर्वक तरीके

से की गई चोरी को भी गंभीरता से लिया जाएगा। यह प्रावधान साइबर और संगठित अपराधों से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण है।


4. घर, टेंट या जहाज में चोरी – BNS धारा 305

यदि चोरी:

  • घर
  • दुकान
  • गोदाम
  • जहाज
  • या ऐसे स्थान से की गई हो जहाँ लोग रहते हैं या संपत्ति सुरक्षित रखते हैं

तो इसे अधिक गंभीर अपराध माना गया है।

सजा:

  • 7 वर्ष तक का कारावास
  • और जुर्माना

IPC में यही अपराध धारा 380 के अंतर्गत आता था। BNS ने इसे और अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया है।


5. स्नैचिंग (Snatching): BNS का नया और महत्वपूर्ण प्रावधान

IPC की सबसे बड़ी कमी यह थी कि स्नैचिंग के लिए कोई अलग धारा नहीं थी। मोबाइल या चेन झपटने जैसे मामलों को या तो चोरी या जबरन वसूली में डाल दिया जाता था।

BNS धारा 304

अब स्नैचिंग को एक स्वतंत्र अपराध के रूप में मान्यता दी गई है।

यदि कोई व्यक्ति:

  • अचानक किसी की संपत्ति छीनता है
  • और तुरंत भागने का प्रयास करता है

तो:

  • 3 वर्ष तक की कैद
  • और जुर्माना

हो सकता है। यह शहरी अपराधों को नियंत्रित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


6. सामुदायिक सेवा (Community Service): सुधारवादी न्याय

BNS की सबसे क्रांतिकारी विशेषताओं में से एक है सामुदायिक सेवा

यदि:

  • चोरी की गई संपत्ति का मूल्य बहुत कम है
  • आरोपी पहली बार अपराध कर रहा है
  • और परिस्थितियाँ अनुकूल हैं

तो न्यायालय:

  • जेल की सजा के बजाय
  • अस्पताल, स्कूल या सार्वजनिक स्थल पर सेवा

का आदेश दे सकती है।

यह व्यवस्था अपराधी को समाज से काटने के बजाय उसे सुधारने का प्रयास करती है।


7. कानून के छात्रों के लिए विशेष परीक्षा-उपयोगी नोट्स

  • अब परीक्षा उत्तरों में IPC नहीं, BNS की धाराओं का उल्लेख आवश्यक है
  • FIR में IPC 379 के स्थान पर BNS 303(2) दर्ज होगी
  • पुराने केस लॉ जैसे K.N. Mehra v. State of Rajasthan आज भी परिभाषा समझने में उपयोगी हैं
  • तुलनात्मक प्रश्नों में IPC और BNS दोनों का उल्लेख करना बेहतर रहेगा

निष्कर्ष

      भारतीय न्याय संहिता ने चोरी जैसे सामान्य अपराध को अधिक स्पष्ट, आधुनिक और व्यावहारिक बना दिया है। स्नैचिंग के लिए अलग धारा, बार-बार अपराध करने वालों पर सख्ती और छोटे मामलों में सामुदायिक सेवा—ये सभी बदलाव यह दर्शाते हैं कि भारतीय आपराधिक कानून अब केवल सजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि सुधार और सामाजिक संतुलन की ओर बढ़ रहा है।

     IndianLawNotes.com का उद्देश्य इन कानूनी परिवर्तनों को सरल भाषा में आपके सामने रखना है, ताकि आप कानून को केवल पढ़ें नहीं, बल्कि समझें भी।