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Agreement to Sell पर कितनी लगेगी स्टाम्प ड्यूटी? बिना कब्जे वाली संपत्ति पर सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश


Agreement to Sell पर कितनी लगेगी स्टाम्प ड्यूटी? बिना कब्जे वाली संपत्ति पर सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश

प्रस्तावना: संपत्ति का सौदा और स्टाम्प ड्यूटी का गणित

      भारत में अचल संपत्ति (Immovable Property) का लेन-देन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील विषय है। घर, फ्लैट, प्लॉट या दुकान खरीदते समय आमतौर पर लोग सबसे पहले Agreement to Sell करते हैं। यहीं से एक बड़ा भ्रम शुरू होता है—
क्या इस एग्रीमेंट पर भी उतनी ही स्टाम्प ड्यूटी देनी होगी जितनी रजिस्ट्री (Sale Deed) पर लगती है?
क्या कब्जा (Possession) मिलने या न मिलने से स्टाम्प ड्यूटी की दर बदल जाती है?

     व्यवहार में देखा गया है कि स्टाम्प ड्यूटी को लेकर गलत सलाह, अधूरी जानकारी और राजस्व अधिकारियों की अलग-अलग व्याख्याओं के कारण आम नागरिकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। कई मामलों में लाखों रुपये की पेनल्टी भी लगा दी जाती है।

     इसी पृष्ठभूमि में हाल ही में भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने Agreement to Sell और स्टाम्प ड्यूटी से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर स्पष्ट और व्यावहारिक दिशा-निर्देश दिए हैं, जो रियल एस्टेट सेक्टर और आम जनता—दोनों के लिए अत्यंत राहतकारी हैं।


Agreement to Sell और Sale Deed: मूल कानूनी अंतर

     स्टाम्प ड्यूटी को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि Agreement to Sell और Sale Deed कानूनी रूप से एक जैसे नहीं हैं।

1. Agreement to Sell (विक्रय हेतु करार)

Agreement to Sell एक ऐसा दस्तावेज है, जिसमें:

  • भविष्य की किसी तिथि पर संपत्ति बेचने का वादा किया जाता है
  • संपत्ति का स्वामित्व (Title) ट्रांसफर नहीं होता
  • खरीदार को केवल यह अधिकार मिलता है कि वह तय शर्तों पर भविष्य में रजिस्ट्री करा सके

यह दस्तावेज़ Transfer of Property Act, 1882 की धारा 54 के अनुसार “Sale” नहीं माना जाता।

2. Sale Deed (विक्रय विलेख / रजिस्ट्री)

Sale Deed वह अंतिम और निर्णायक दस्तावेज है:

  • जिससे संपत्ति का स्वामित्व पूरी तरह खरीदार को स्थानांतरित हो जाता है
  • जो अनिवार्य रूप से रजिस्टर्ड होना चाहिए
  • जिस पर राज्य सरकार द्वारा निर्धारित पूर्ण स्टाम्प ड्यूटी देय होती है

यहीं से स्पष्ट होता है कि दोनों दस्तावेजों की कानूनी प्रकृति अलग-अलग है, और इसी अंतर के कारण स्टाम्प ड्यूटी में भी भिन्नता होती है।


कब्जे (Possession) का स्टाम्प ड्यूटी पर प्रभाव

भारत के लगभग सभी राज्यों के स्टाम्प अधिनियमों में कब्जे को एक निर्णायक तत्व माना गया है। सामान्यतः दो स्थितियाँ होती हैं:


1. कब्जे के साथ Agreement to Sell (With Possession)

यदि Agreement to Sell के समय ही संपत्ति का कब्जा खरीदार को दे दिया जाता है, तो अधिकांश राज्य स्टाम्प कानून इसे “Deemed Conveyance” मानते हैं।

इसका परिणाम यह होता है कि:

  • Agreement को लगभग Sale Deed के समान माना जाता है
  • खरीदार को पूरी या लगभग पूरी स्टाम्प ड्यूटी चुकानी पड़ती है

उदाहरण के लिए:

  • दिल्ली: लगभग 6%
  • उत्तर प्रदेश: लगभग 7%
  • महाराष्ट्र: 5% से अधिक

यही वह स्थिति है, जहां लोग अनजाने में भारी स्टाम्प ड्यूटी और भविष्य की पेनल्टी में फँस जाते हैं।


2. बिना कब्जे वाला Agreement to Sell (Without Possession)

यदि Agreement में स्पष्ट रूप से यह लिखा हो कि:

“संपत्ति का कब्जा सेल डीड के निष्पादन के समय दिया जाएगा”

तो इसे केवल एक कार्यकारी करार (Executory Contract) माना जाता है।

ऐसी स्थिति में:

  • स्टाम्प ड्यूटी नाममात्र होती है
  • आमतौर पर ₹100 से ₹1000 तक (राज्य के अनुसार)

यही अंतर लाखों रुपये के स्टाम्प ड्यूटी विवाद की जड़ है।


सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Vayyaeti Srinivasarao बनाम Gaineedi Jagajyothi (2026)

जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश स्टाम्प एक्ट से जुड़े एक मामले में Agreement to Sell और कब्जे की व्याख्या पर एक ऐतिहासिक निर्णय दिया।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कोर्ट ने राजस्व अधिकारियों की मशीनी और अनुमान आधारित (Assumptive) कार्यप्रणाली पर रोक लगाई।


1. कब्जा पहले से होने का अर्थ Agreement के तहत कब्जा नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि: यदि कोई व्यक्ति पहले से ही संपत्ति में किरायेदार (Tenant) या लीज़ होल्डर के रूप में रह रहा है, और बाद में वह उसी संपत्ति के लिए Agreement to Sell करता है, तो केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि उसे कब्जा Agreement के कारण मिला है।

इस स्थिति में:

  • Agreement को “With Possession” नहीं माना जाएगा
  • भारी स्टाम्प ड्यूटी नहीं लगाई जा सकती

2. Deemed Conveyance की सीमित व्याख्या

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि: Agreement to Sell को “बिक्री के समान” तभी माना जा सकता है, जब दस्तावेज़ में स्पष्ट और असंदिग्ध रूप से यह लिखा हो कि:

  • कब्जा इसी Agreement के कारण हस्तांतरित किया जा रहा है

यदि कब्जा Agreement से स्वतंत्र है, तो उसे Deemed Conveyance नहीं माना जा सकता।


राज्यों के अनुसार स्टाम्प ड्यूटी की दरें (अनुमानित)

यह समझना जरूरी है कि स्टाम्प ड्यूटी राज्य का विषय है। बिना कब्जे वाले Agreement to Sell पर सामान्यतः निम्नलिखित दरें देखने को मिलती हैं:

राज्य स्टाम्प ड्यूटी (बिना कब्जे के)
दिल्ली ₹50 – ₹100
उत्तर प्रदेश ₹100
महाराष्ट्र ₹1,000
कर्नाटक ₹1,000 – ₹20,000 (मूल्य पर निर्भर)

नोट: यदि Agreement में कब्जा दिया गया हो, तो यही दरें बढ़कर 5% से 8% तक पहुँच सकती हैं।


Registration Act, 1908 की धारा 17 और 49 का महत्व

कानून के छात्रों और प्रैक्टिसिंग वकीलों के लिए यह भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है।

धारा 17(1A)

2001 के संशोधन के बाद:

  • यदि Agreement to Sell कब्जे के साथ है
  • तो उसका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है

यदि रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ, तो:

  • Transfer of Property Act की धारा 53A (Part Performance) का लाभ नहीं मिलेगा

धारा 49 (Proviso)

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि:

  • एक अपंजीकृत Agreement to Sell
  • Specific Performance के मुकदमे में
  • सबूत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है

यह अंतर व्यवहार में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


आम नागरिकों के लिए व्यावहारिक सलाह (Practical Tips)

यदि आप संपत्ति खरीदने या बेचने जा रहे हैं, तो निम्न बातों का विशेष ध्यान रखें:

  1. Possession Clause साफ लिखवाएँ
    यदि आप अभी कब्जा नहीं ले रहे हैं, तो Agreement में स्पष्ट रूप से दर्ज हो।
  2. कम स्टाम्प = जोखिम नहीं
    ₹100 का Agreement भी यदि गलत क्लॉज के साथ है, तो भविष्य में लाखों की पेनल्टी बन सकता है।
  3. रजिस्ट्रेशन को प्राथमिकता दें
    नोटरी के बजाय Sub-Registrar के यहाँ रजिस्ट्रेशन अधिक सुरक्षित है।
  4. पेनल्टी से सावधान
    गलत स्टाम्प ड्यूटी देने पर Collector of Stamps संपत्ति मूल्य का 10 गुना तक जुर्माना लगा सकता है।

निष्कर्ष

      सुप्रीम कोर्ट का यह नया आदेश उन लाखों लोगों के लिए बड़ी राहत है जो पहले से संपत्ति में रह रहे थे और बाद में Agreement to Sell करने के कारण अनावश्यक स्टाम्प ड्यूटी विवाद में फँस जाते थे।

कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि:

  • केवल अनुमान के आधार पर Agreement को Deemed Conveyance नहीं माना जा सकता
  • राजस्व अधिकारियों को दस्तावेज़ की वास्तविक शर्तों की जाँच करनी होगी

IndianLawNotes.com का मानना है कि यह फैसला रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता लाएगा और अनावश्यक मुकदमेबाजी को काफी हद तक कम करेगा।


महत्वपूर्ण केस लॉ (Quick Reference for Students)

  • Suraj Lamp & Industries v. State of Haryana
    — GPA / Agreement से मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं होता
  • Vayyaeti Srinivasarao v. Gaineedi Jagajyothi (2026)
    — कब्जे और स्टाम्प ड्यूटी पर ताजा व स्पष्ट दिशा-निर्देश