वन अधिकार और आदिवासी कानून (Forest Rights & Tribal Law): भूमि, पहचान, आरक्षण, विस्थापन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संवैधानिक संतुलन
प्रस्तावना: विकास की दौड़ में उपेक्षित वनवासी
भारत का विकास मॉडल लंबे समय तक उद्योग, खनन, बांध और शहरीकरण केंद्रित रहा है। इस विकास की सबसे बड़ी कीमत चुकाई है आदिवासियों और वनवासियों ने। जिन जंगलों को उन्होंने पीढ़ियों से संजोया, वही जंगल आधुनिक कानूनों की नजर में राज्य की संपत्ति बन गए।
परिणामस्वरूप, आदिवासी समुदाय भूमि से बेदखल हुए, उनकी आजीविका छिनी और सांस्कृतिक पहचान संकट में पड़ी।
इसी ऐतिहासिक अन्याय की पृष्ठभूमि में वन अधिकार और आदिवासी कानून का विकास हुआ, जिसका उद्देश्य केवल अधिकार देना नहीं, बल्कि सम्मान के साथ सह-अस्तित्व सुनिश्चित करना है।
1. आदिवासी समाज: केवल जनजाति नहीं, जीवन-दर्शन
आदिवासी समुदाय—
- प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीवन जीते हैं
- सामुदायिक स्वामित्व में विश्वास रखते हैं
- जंगल को संसाधन नहीं, माता मानते हैं
लेकिन आधुनिक कानूनों ने व्यक्तिगत स्वामित्व और सरकारी नियंत्रण को प्राथमिकता दी, जिससे आदिवासी जीवन पद्धति कानून से टकराने लगी।
2. संविधान और आदिवासी अधिकारों की नींव
भारतीय संविधान ने यह स्वीकार किया कि आदिवासी समाज को सामान्य कानून से अलग संरक्षण की आवश्यकता है।
(क) प्रमुख संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 46 – राज्य का दायित्व कि वह आदिवासियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों की रक्षा करे
- अनुच्छेद 244 – पाँचवीं और छठी अनुसूची द्वारा विशेष प्रशासन
- अनुच्छेद 275(1) – आदिवासी क्षेत्रों के विकास हेतु अनुदान
- अनुच्छेद 338A – राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
संविधान का दृष्टिकोण कल्याणकारी के साथ-साथ सशक्तिकरण आधारित है।
3. औपनिवेशिक वन कानून और आदिवासियों की बेदखली
ब्रिटिश शासन के दौरान—
- जंगलों का व्यावसायिक दोहन
- रेलवे और जहाज़ निर्माण के लिए लकड़ी की कटाई
- आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों का दमन
Indian Forest Act, 1927 ने जंगल को राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया और आदिवासी “अवैध” बन गए।
स्वतंत्र भारत ने भी लंबे समय तक इसी ढांचे को बनाए रखा।
4. वन अधिकार अधिनियम, 2006: ऐतिहासिक सुधार
(क) अधिनियम का दर्शन
वन अधिकार अधिनियम, 2006 का मूल उद्देश्य है—
- औपनिवेशिक अन्याय को समाप्त करना
- आदिवासियों को भूमि पर कानूनी मान्यता देना
- लोकतांत्रिक वन शासन स्थापित करना
(ख) अधिकारों की विस्तृत श्रेणियाँ
- वन भूमि पर व्यक्तिगत अधिकार (अधिकतम 4 हेक्टेयर)
- सामुदायिक वन अधिकार (CFR)
- वन उपज संग्रह और बिक्री का अधिकार
- मछली पकड़ने और चराई का अधिकार
- जंगल संरक्षण और प्रबंधन में भागीदारी
यह अधिनियम पहली बार ग्राम सभा को केंद्रीय भूमिका देता है।
5. ग्राम सभा: आदिवासी लोकतंत्र की आत्मा
वन अधिकार कानून और PESA अधिनियम, 1996 के अनुसार—
- ग्राम सभा सर्वोच्च निर्णयकारी संस्था है
- भूमि अधिग्रहण से पहले उसकी सहमति अनिवार्य है
- खनन, वन उपयोग और विस्थापन पर veto power
व्यवहार में, ग्राम सभा को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है, जो कानून की आत्मा के विरुद्ध है।
6. विस्थापन कानून और आदिवासी पीड़ा
(क) विकास परियोजनाओं का प्रभाव
- बांध परियोजनाएँ
- कोयला और खनिज खनन
- वन्यजीव अभयारण्य
इनसे लाखों आदिवासी विस्थापित हुए।
(ख) 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून
यह कानून—
- सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन
- ग्राम सभा की सहमति
- पुनर्वास और मुआवजा
को अनिवार्य बनाता है।
फिर भी, आदिवासी क्षेत्रों में इसका पालन कमजोर है।
7. आदिवासी आरक्षण: सामाजिक न्याय का उपकरण
(क) शिक्षा और रोजगार
आदिवासियों के लिए आरक्षण—
- ऐतिहासिक पिछड़ेपन की भरपाई
- प्रशासन में प्रतिनिधित्व
- सामाजिक समानता
का माध्यम है।
(ख) पाँचवीं और छठी अनुसूची की भूमिका
- पाँचवीं अनुसूची – राज्यपाल को विशेष शक्तियाँ
- छठी अनुसूची – स्वायत्त जिला परिषदें
इनका उद्देश्य आदिवासी पहचान और स्वशासन को सुरक्षित रखना है।
8. अत्याचार निवारण कानून और भूमि सुरक्षा
SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989—
- भूमि हड़पने को अपराध घोषित करता है
- सामाजिक बहिष्कार और हिंसा पर कठोर दंड
- पीड़ित-केंद्रित न्याय प्रणाली
यह कानून आदिवासियों की गरिमा और सुरक्षा की ढाल है।
9. पर्यावरण संरक्षण कानून और आदिवासी संघर्ष
(क) प्रमुख कानून
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972
(ख) टकराव का बिंदु
पर्यावरण संरक्षण के नाम पर—
- आदिवासियों को जंगल से बाहर करना
- पारंपरिक आजीविका पर प्रतिबंध
यह दृष्टिकोण मानवाधिकारों के विरुद्ध है।
10. आदिवासी: पर्यावरण के स्वाभाविक रक्षक
शोध और न्यायिक दृष्टिकोण मानते हैं कि—
- आदिवासी टिकाऊ जीवन जीते हैं
- उनकी जीवनशैली पर्यावरण-अनुकूल है
- वे जैव विविधता के संरक्षक हैं
इसलिए संरक्षण का अर्थ बहिष्कार नहीं, सहभागिता होना चाहिए।
11. न्यायपालिका का दृष्टिकोण
न्यायालयों ने कहा है—
- वन अधिकार अधिनियम सर्वोपरि है
- ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है
- बिना अधिकार निर्धारण के बेदखली अवैध है
न्यायपालिका ने विकास को मानव गरिमा से जोड़कर देखा है।
12. वर्तमान चुनौतियाँ और प्रशासनिक विफलताएँ
- दावों की धीमी प्रक्रिया
- अधिकारियों की मनमानी
- कॉर्पोरेट प्रभाव
- जागरूकता की कमी
ये सभी कानून के उद्देश्य को कमजोर करते हैं।
निष्कर्ष: कानून तभी सार्थक है जब जंगल में भी न्याय पहुँचे
वन अधिकार और आदिवासी कानून केवल कागज़ी प्रावधान नहीं हैं। ये उस संघर्ष की कहानी हैं जिसमें आदिवासी समाज ने अपनी भूमि, संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा के लिए आवाज़ उठाई है।
यदि भारत को सचमुच समावेशी और न्यायपूर्ण विकास चाहिए, तो—
- वन अधिकार अधिनियम का ईमानदार पालन
- विस्थापन को अंतिम विकल्प बनाना
- पर्यावरण और मानव अधिकारों में संतुलन
- ग्राम सभा को वास्तविक शक्ति
देना अनिवार्य है।
जंगल बचेंगे तभी देश बचेगा, और आदिवासी बचेगा तभी जंगल बचेगा।
प्रश्न 1. वन अधिकार अधिनियम, 2006 का उद्देश्य क्या है? इसके प्रमुख प्रावधानों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
वन अधिकार अधिनियम, 2006 का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को सुधारना है। ब्रिटिश कालीन वन कानूनों के कारण आदिवासियों को उनकी ही भूमि से अवैध घोषित कर दिया गया था। इस अधिनियम द्वारा उन्हें कानूनी मान्यता दी गई।
इसके प्रमुख प्रावधानों में व्यक्तिगत वन अधिकार, सामुदायिक वन अधिकार, लघु वन उपज पर अधिकार, निवास अधिकार तथा वन संरक्षण और प्रबंधन में भागीदारी शामिल है। यह अधिनियम ग्राम सभा को अधिकार निर्धारण की केंद्रीय इकाई बनाता है। इसका मूल दर्शन यह है कि आदिवासी केवल जंगल के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके संरक्षक हैं।
प्रश्न 2. ग्राम सभा की भूमिका वन अधिकार कानून और PESA अधिनियम के अंतर्गत क्या है?
उत्तर :
ग्राम सभा आदिवासी क्षेत्रों में लोकतांत्रिक शासन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। वन अधिकार अधिनियम, 2006 और PESA अधिनियम, 1996 दोनों ही ग्राम सभा को प्राकृतिक संसाधनों पर निर्णायक अधिकार प्रदान करते हैं।
ग्राम सभा वन अधिकार दावों की जाँच, सत्यापन और अनुशंसा करती है। किसी भी भूमि अधिग्रहण, खनन, या विस्थापन से पूर्व उसकी सहमति अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, ग्राम सभा को सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार भी दिया गया है। कानून का उद्देश्य प्रशासनिक निर्णयों में स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना है।
प्रश्न 3. विकास परियोजनाओं के कारण आदिवासियों के विस्थापन की समस्या पर संक्षेप में चर्चा कीजिए।
उत्तर :
भारत में बांध, खनन, औद्योगिक परियोजनाएँ और वन्यजीव अभयारण्य आदिवासियों के बड़े पैमाने पर विस्थापन का कारण बने हैं। विस्थापन केवल भौतिक स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि आजीविका, संस्कृति और सामाजिक संरचना का विघटन भी है।
भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 इस समस्या के समाधान हेतु सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन, उचित मुआवजा और पुनर्वास को अनिवार्य बनाता है। आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा की सहमति को विशेष महत्व दिया गया है। फिर भी, व्यवहार में इन प्रावधानों का पूर्ण पालन न होना एक गंभीर चुनौती है।
प्रश्न 4. आदिवासी आरक्षण और विशेष सुरक्षा कानूनों का महत्व क्या है?
उत्तर :
आदिवासी आरक्षण और विशेष सुरक्षा कानून सामाजिक न्याय की अवधारणा पर आधारित हैं। शिक्षा और रोजगार में आरक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक पिछड़ेपन की भरपाई करना और प्रशासन में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
इसके अतिरिक्त, पाँचवीं और छठी अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक संरक्षण प्रदान करती हैं। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 आदिवासियों के विरुद्ध भूमि हड़पने, हिंसा और सामाजिक अपमान को गंभीर अपराध घोषित करता है। ये कानून आदिवासियों की गरिमा, सुरक्षा और समानता की रक्षा करते हैं।
प्रश्न 5. पर्यावरण संरक्षण कानूनों और आदिवासी अधिकारों के बीच संघर्ष को कैसे संतुलित किया जा सकता है?
उत्तर :
पर्यावरण संरक्षण कानूनों का उद्देश्य वनों और जैव विविधता की रक्षा करना है, जबकि आदिवासी अधिकार कानून मानव गरिमा और आजीविका की सुरक्षा पर केंद्रित हैं। कई बार संरक्षण के नाम पर आदिवासियों को जंगल से बाहर कर दिया जाता है, जिससे संघर्ष उत्पन्न होता है।
इस संतुलन का समाधान सतत विकास के सिद्धांत में निहित है। आदिवासी समुदायों को पर्यावरण का शत्रु नहीं, बल्कि स्वाभाविक संरक्षक मानते हुए उन्हें संरक्षण प्रक्रिया में सहभागी बनाया जाना चाहिए। न्यायपालिका ने भी स्पष्ट किया है कि बिना अधिकार निर्धारण के आदिवासियों को बेदखल करना असंवैधानिक है।