मानवाधिकार कानून : 100 शॉर्ट प्रश्न
भाग–A : मूल अवधारणा
-
मानवाधिकार से आप क्या समझते हैं?
-
मानवाधिकारों की परिभाषा दीजिए।
-
मानवाधिकारों की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
-
मानवाधिकारों की प्रकृति क्या है?
-
प्राकृतिक अधिकार और मानवाधिकार में अंतर बताइए।
-
नागरिक अधिकार और मानवाधिकार में अंतर बताइए।
-
मानवाधिकारों का ऐतिहासिक विकास संक्षेप में लिखिए।
-
मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता से क्या तात्पर्य है?
-
मानवाधिकार अविभाज्य क्यों माने जाते हैं?
-
मानवाधिकारों की अंतर–निर्भरता का अर्थ क्या है?
भाग–B : अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून
-
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का मानवाधिकारों से क्या संबंध है?
-
संयुक्त राष्ट्र चार्टर में मानवाधिकारों का उल्लेख कहाँ है?
-
Universal Declaration of Human Rights क्या है?
-
UDHR को अपनाने की तिथि क्या है?
-
UDHR का कानूनी स्वरूप क्या है?
-
UDHR में कुल कितने अनुच्छेद हैं?
-
UDHR का अनुच्छेद 1 क्या कहता है?
-
UDHR का अनुच्छेद 21 किस अधिकार से संबंधित है?
-
UDHR का अनुच्छेद 25 किससे संबंधित है?
-
United Nations Human Rights Council क्या है?
भाग–C : अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियाँ
-
International Covenant on Civil and Political Rights क्या है?
-
ICCPR कब लागू हुआ?
-
ICCPR के अंतर्गत कौन–से अधिकार आते हैं?
-
ICCPR के अनुच्छेद 6 का विषय क्या है?
-
International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights क्या है?
-
ICESCR में कौन–से अधिकार शामिल हैं?
-
ICESCR के अनुच्छेद 11 का विषय क्या है?
-
ICCPR और ICESCR में मुख्य अंतर क्या है?
-
मानवाधिकारों का International Bill of Human Rights क्या है?
-
Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination Against Women का उद्देश्य क्या है?
भाग–D : विशेष समूहों के मानवाधिकार
-
CEDAW महिलाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
-
Convention on the Rights of the Child क्या है?
-
CRC के अनुसार बच्चे की परिभाषा क्या है?
-
बच्चों के सर्वोत्तम हित का सिद्धांत क्या है?
-
Convention on the Rights of Persons with Disabilities क्या है?
-
विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों का मुख्य उद्देश्य क्या है?
-
शरणार्थियों के अधिकार किस संधि से संरक्षित हैं?
-
International Labour Organization का मानवाधिकारों में क्या योगदान है?
-
श्रमिक अधिकार मानवाधिकार क्यों हैं?
-
अल्पसंख्यक अधिकारों का क्या महत्व है?
भाग–E : भारत में मानवाधिकार
-
भारतीय संविधान में मानवाधिकारों का आधार क्या है?
-
मौलिक अधिकारों और मानवाधिकारों में क्या संबंध है?
-
अनुच्छेद 14 का मानवाधिकार महत्व क्या है?
-
अनुच्छेद 19 किस प्रकार मानवाधिकारों से जुड़ा है?
-
अनुच्छेद 21 का विस्तृत अर्थ क्या है?
-
जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार क्या है?
-
मानव गरिमा का अधिकार किस अनुच्छेद में निहित है?
-
राज्य के नीति–निर्देशक तत्वों का मानवाधिकार महत्व क्या है?
-
मौलिक कर्तव्यों का मानवाधिकारों से क्या संबंध है?
-
न्यायिक सक्रियता मानवाधिकार संरक्षण में कैसे सहायक है?
भाग–F : मानवाधिकार संरक्षण तंत्र (भारत)
-
National Human Rights Commission क्या है?
-
NHRC की स्थापना कब हुई?
-
NHRC का अध्यक्ष कौन हो सकता है?
-
NHRC के मुख्य कार्य क्या हैं?
-
NHRC की सीमाएँ क्या हैं?
-
State Human Rights Commission क्या है?
-
मानवाधिकार उल्लंघन से क्या तात्पर्य है?
-
हिरासत में मृत्यु मानवाधिकार उल्लंघन क्यों है?
-
पुलिस अत्याचार मानवाधिकार के विरुद्ध क्यों है?
-
फर्जी मुठभेड़ मानवाधिकार उल्लंघन कैसे है?
भाग–G : न्यायपालिका और मानवाधिकार
-
जनहित याचिका (PIL) का मानवाधिकारों में क्या योगदान है?
-
न्यायिक पुनरावलोकन मानवाधिकारों की रक्षा कैसे करता है?
-
बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) का महत्व क्या है?
-
निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार क्या है?
-
त्वरित न्याय का अधिकार मानवाधिकार क्यों है?
-
कानूनी सहायता का अधिकार किससे जुड़ा है?
-
यातना निषेध का सिद्धांत क्या है?
-
मृत्युदंड और मानवाधिकारों के बीच संबंध क्या है?
-
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीमाएँ क्यों लगाई जाती हैं?
-
प्रेस की स्वतंत्रता मानवाधिकार कैसे है?
भाग–H : समकालीन मुद्दे
-
आतंकवाद और मानवाधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है?
-
राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम मानवाधिकार क्या है?
-
डिजिटल निजता मानवाधिकार क्यों है?
-
डेटा संरक्षण मानवाधिकार से कैसे जुड़ा है?
-
पर्यावरण संरक्षण मानवाधिकार क्यों माना जाता है?
-
स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार किससे संबंधित है?
-
स्वास्थ्य का अधिकार मानवाधिकार क्यों है?
-
शिक्षा का अधिकार मानवाधिकार कैसे है?
-
लैंगिक समानता मानवाधिकार क्यों है?
-
LGBTQ+ अधिकार मानवाधिकार कैसे हैं?
भाग–I : प्रवर्तन और दायित्व
-
राज्य का मानवाधिकार संरक्षण में क्या दायित्व है?
-
मानवाधिकार उल्लंघन के लिए कौन उत्तरदायी होता है?
-
प्रतिकर (Compensation) का मानवाधिकार महत्व क्या है?
-
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रवर्तन की सीमाएँ क्या हैं?
-
सार्वभौमिक अधिकार क्षेत्र (Universal Jurisdiction) क्या है?
-
मानवाधिकार और राज्य संप्रभुता में टकराव क्यों होता है?
-
गैर–सरकारी संगठन (NGOs) की भूमिका क्या है?
-
मानवाधिकार शिक्षा क्यों आवश्यक है?
-
मीडिया की भूमिका मानवाधिकारों में क्या है?
-
मानवाधिकार जागरूकता का क्या महत्व है?
भाग–J : समापन
-
मानवाधिकार कानून का भविष्य क्या है?
-
वैश्वीकरण का मानवाधिकारों पर क्या प्रभाव है?
-
मानवाधिकार और विकास में क्या संबंध है?
-
मानवाधिकारों का नैतिक आधार क्या है?
-
मानवाधिकारों की आलोचना क्यों की जाती है?
-
सांस्कृतिक सापेक्षता क्या है?
-
सार्वभौमिकता बनाम सांस्कृतिक विविधता क्या है?
-
मानवाधिकारों का दुरुपयोग कैसे होता है?
-
मानवाधिकार कानून की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
-
मानवाधिकार संरक्षण क्यों अनिवार्य है?
1. मानवाधिकार से आप क्या समझते हैं?
(What do you understand by Human Rights?)
मानवाधिकार उन मूलभूत अधिकारों और स्वतंत्रताओं का समुच्चय हैं, जो प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य होने के नाते प्राप्त होते हैं, न कि किसी राज्य, सरकार या कानून की कृपा से। ये अधिकार व्यक्ति के जन्म के साथ ही अस्तित्व में आ जाते हैं और जीवनपर्यंत बने रहते हैं। मानवाधिकारों का उद्देश्य व्यक्ति की गरिमा (dignity), स्वतंत्रता (liberty), समानता (equality) और न्याय (justice) की रक्षा करना है।
मानवाधिकारों की अवधारणा इस मूल विचार पर आधारित है कि प्रत्येक मानव समान मूल्य और सम्मान का अधिकारी है। कोई भी व्यक्ति अपनी जाति, धर्म, लिंग, भाषा, रंग, राष्ट्रीयता, आर्थिक स्थिति या किसी अन्य आधार पर इन अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। इस दृष्टि से मानवाधिकार सार्वभौमिक होते हैं।
आधुनिक काल में मानवाधिकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट रूप से मान्यता Universal Declaration of Human Rights (UDHR) के माध्यम से मिली, जिसे 10 दिसंबर 1948 को अपनाया गया। UDHR ने मानवाधिकारों को नैतिक सिद्धांत से आगे बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय मानक का स्वरूप प्रदान किया। यद्यपि यह घोषणा विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं है, फिर भी इसने अनेक अंतरराष्ट्रीय संधियों और राष्ट्रीय संविधानों को प्रभावित किया।
मानवाधिकार केवल नागरिक और राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार भी सम्मिलित हैं। उदाहरण के लिए—जीवन का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, काम करने का अधिकार और सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार—all मानवाधिकारों के अंतर्गत आते हैं।
भारत में मानवाधिकारों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। भारतीय संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) और भाग IV (राज्य के नीति–निर्देशक तत्व) मानवाधिकारों की भावना को सुदृढ़ करते हैं। विशेष रूप से अनुच्छेद 21, जिसे न्यायपालिका ने व्यापक रूप से व्याख्यायित किया है, मानवाधिकारों का केन्द्रीय आधार बन चुका है।
संक्षेप में, मानवाधिकार वह न्यूनतम मानक हैं, जिनके बिना किसी व्यक्ति का मानवीय जीवन संभव नहीं है। ये अधिकार राज्य की शक्ति पर अंकुश लगाते हैं और व्यक्ति को शोषण, उत्पीड़न तथा मनमानी से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
2. मानवाधिकारों की परिभाषा दीजिए
(Define Human Rights)
मानवाधिकारों की परिभाषा विभिन्न विद्वानों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और विधिक दस्तावेजों में भिन्न–भिन्न शब्दों में दी गई है, किंतु सभी का मूल भाव एक ही है—मानव गरिमा की रक्षा।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, मानवाधिकार वे अधिकार हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को उसकी मानवता के कारण प्राप्त होते हैं और जिनका उद्देश्य स्वतंत्रता, समानता और गरिमा को सुनिश्चित करना है। Universal Declaration of Human Rights की प्रस्तावना में कहा गया है कि “मानव परिवार के सभी सदस्यों की अंतर्निहित गरिमा तथा समान और अविच्छिन्न अधिकारों की मान्यता ही विश्व में स्वतंत्रता, न्याय और शांति की नींव है।”
प्रसिद्ध विधिशास्त्री लास्की (Laski) के अनुसार, मानवाधिकार वे परिस्थितियाँ हैं, जिनके बिना कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं कर सकता। वहीं हेनरी श्यू (Henry Shue) मानवाधिकारों को न्यूनतम आवश्यकताओं के रूप में देखते हैं, जिनके बिना कोई भी व्यक्ति सभ्य जीवन नहीं जी सकता।
विधिक दृष्टि से, मानवाधिकारों की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है—
“मानवाधिकार वे मौलिक, जन्मसिद्ध, सार्वभौमिक और अविच्छिन्न अधिकार हैं, जो प्रत्येक व्यक्ति को केवल मानव होने के कारण प्राप्त होते हैं और जिनका उद्देश्य उसकी गरिमा, स्वतंत्रता और समग्र विकास की रक्षा करना है।”
मानवाधिकारों की यह परिभाषा स्पष्ट करती है कि ये अधिकार राज्य द्वारा प्रदान नहीं किए जाते, बल्कि राज्य का दायित्व केवल इन्हें मान्यता देना, संरक्षण करना और प्रवर्तित करना है। जब राज्य इन अधिकारों का उल्लंघन करता है, तब वही कार्य मानवाधिकार उल्लंघन कहलाता है।
इस प्रकार, मानवाधिकारों की परिभाषा केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक, सामाजिक और दार्शनिक आधार भी रखती है।
3. मानवाधिकारों की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
(Main Characteristics of Human Rights)
मानवाधिकारों की कुछ विशिष्ट विशेषताएँ हैं, जो इन्हें अन्य अधिकारों से भिन्न बनाती हैं—
(1) सार्वभौमिकता (Universality):
मानवाधिकार प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के प्राप्त होते हैं। ये अधिकार सभी देशों, समाजों और संस्कृतियों में समान रूप से लागू होते हैं।
(2) जन्मसिद्ध (Inherent):
मानवाधिकार जन्म के साथ प्राप्त होते हैं। व्यक्ति को इन्हें अर्जित करने की आवश्यकता नहीं होती।
(3) अविच्छिन्नता (Inalienability):
इन अधिकारों को छीना, बेचा या त्यागा नहीं जा सकता। अत्यंत आपात स्थितियों में भी इनका मूल स्वरूप बना रहता है।
(4) अविभाज्यता (Indivisibility):
सभी मानवाधिकार समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। नागरिक अधिकारों को आर्थिक या सामाजिक अधिकारों से अलग नहीं किया जा सकता।
(5) अंतर–निर्भरता (Interdependence):
एक अधिकार की प्रभावशीलता अन्य अधिकारों पर निर्भर करती है। उदाहरणतः शिक्षा का अधिकार बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपूर्ण है।
(6) विधिक संरक्षण:
आधुनिक राज्यों में मानवाधिकारों को संविधान, कानूनों और न्यायालयों द्वारा संरक्षण प्राप्त है।
(7) राज्य पर दायित्व:
मानवाधिकार राज्य पर यह दायित्व डालते हैं कि वह न केवल उल्लंघन से बचे, बल्कि संरक्षण और प्रवर्तन भी करे।
इन विशेषताओं के कारण मानवाधिकार आधुनिक विधि व्यवस्था की आधारशिला बन चुके हैं।
4. मानवाधिकारों की प्रकृति क्या है?
(Nature of Human Rights)
मानवाधिकारों की प्रकृति बहुआयामी है—नैतिक, विधिक, सामाजिक और राजनीतिक। प्रारंभ में मानवाधिकारों को नैतिक सिद्धांत माना जाता था, किंतु आधुनिक युग में वे विधिक अधिकार का स्वरूप धारण कर चुके हैं।
नैतिक दृष्टि से, मानवाधिकार मानव गरिमा और न्याय की अवधारणा से जुड़े हैं। ये यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी व्यक्ति केवल साधन न बने, बल्कि अपने आप में एक उद्देश्य हो।
विधिक दृष्टि से, मानवाधिकार अब अंतरराष्ट्रीय संधियों, संविधानों और कानूनों में मान्यता प्राप्त अधिकार हैं। न्यायालय इनका प्रवर्तन करते हैं और उल्लंघन पर प्रतिकर प्रदान करते हैं।
सामाजिक दृष्टि से, मानवाधिकार सामाजिक न्याय, समान अवसर और समावेशी विकास को बढ़ावा देते हैं।
राजनीतिक दृष्टि से, मानवाधिकार राज्य की शक्ति पर नियंत्रण स्थापित करते हैं और लोकतंत्र को सुदृढ़ करते हैं।
इस प्रकार, मानवाधिकारों की प्रकृति स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील (dynamic) है, जो समय और परिस्थितियों के साथ विकसित होती रहती है।
5. प्राकृतिक अधिकार और मानवाधिकार में अंतर बताइए
(Difference between Natural Rights and Human Rights)
प्राकृतिक अधिकार और मानवाधिकार दोनों ही व्यक्ति–केंद्रित अवधारणाएँ हैं, किंतु इनके स्रोत, स्वरूप और विकास में महत्वपूर्ण अंतर है।
प्राकृतिक अधिकार (Natural Rights) वे अधिकार हैं, जिन्हें दर्शनशास्त्र में ईश्वर, प्रकृति या तर्क से उत्पन्न माना गया है। जॉन लॉक के अनुसार, जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति प्राकृतिक अधिकार हैं, जो राज्य की स्थापना से पूर्व भी अस्तित्व में थे। इनका आधार नैतिक और दार्शनिक है।
इसके विपरीत, मानवाधिकार (Human Rights) आधुनिक अवधारणा है, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय और राज्यों द्वारा औपचारिक रूप से मान्यता दी गई है। मानवाधिकारों का स्रोत अंतरराष्ट्रीय घोषणाएँ, संधियाँ और राष्ट्रीय संविधान हैं।
प्राकृतिक अधिकार अधिक सैद्धांतिक हैं और उनका प्रवर्तन स्पष्ट नहीं होता, जबकि मानवाधिकार विधिक रूप से संरक्षित और न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं। प्राकृतिक अधिकार सार्वभौमिक विचार के रूप में स्वीकार किए जाते हैं, परंतु मानवाधिकारों को संस्थागत ढांचे—जैसे मानवाधिकार आयोग और न्यायालय—का समर्थन प्राप्त है।
संक्षेप में, प्राकृतिक अधिकार मानवाधिकारों का दार्शनिक आधार हैं, जबकि मानवाधिकार उनका विधिक और व्यावहारिक रूप हैं।
6. नागरिक अधिकार और मानवाधिकार में अंतर बताइए
(Difference between Civil Rights and Human Rights)
नागरिक अधिकार और मानवाधिकार दोनों ही व्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और समानता से जुड़े हुए हैं, किंतु इनके स्रोत, क्षेत्र, प्रकृति और प्रवर्तन में मौलिक अंतर पाया जाता है। इन दोनों अवधारणाओं को समझना मानवाधिकार कानून के अध्ययन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
नागरिक अधिकार (Civil Rights) वे अधिकार हैं, जो किसी विशेष राज्य द्वारा अपने नागरिकों को संविधान या विधि के माध्यम से प्रदान किए जाते हैं। ये अधिकार नागरिक और राज्य के बीच संबंध को नियंत्रित करते हैं। उदाहरण के लिए—मतदान का अधिकार, सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति का अधिकार, और समान नागरिक संरक्षण का अधिकार। नागरिक अधिकारों का लाभ सामान्यतः केवल उस राज्य के नागरिकों को ही प्राप्त होता है।
इसके विपरीत, मानवाधिकार (Human Rights) सार्वभौमिक होते हैं और व्यक्ति को केवल मानव होने के कारण प्राप्त होते हैं। इनका लाभ नागरिक और गैर-नागरिक, दोनों को समान रूप से मिलता है। मानवाधिकार किसी विशेष राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं होते, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त होते हैं।
स्रोत (Source) का अंतर:
नागरिक अधिकारों का स्रोत राष्ट्रीय संविधान और घरेलू कानून होते हैं, जबकि मानवाधिकारों का स्रोत अंतरराष्ट्रीय घोषणाएँ, संधियाँ और परंपरागत अंतरराष्ट्रीय कानून हैं, जैसे 1948 की सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा।
क्षेत्र (Scope) का अंतर:
नागरिक अधिकार मुख्यतः राजनीतिक और विधिक अधिकारों तक सीमित रहते हैं, जबकि मानवाधिकारों का क्षेत्र कहीं अधिक व्यापक है। मानवाधिकारों में नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार सभी शामिल होते हैं।
प्रकृति (Nature) का अंतर:
नागरिक अधिकार राज्य द्वारा प्रदत्त और विनियमित होते हैं; इसलिए राज्य आवश्यक परिस्थितियों में इन्हें सीमित कर सकता है। मानवाधिकार जन्मसिद्ध और अविच्छिन्न माने जाते हैं, जिन्हें सिद्धांततः छीना नहीं जा सकता।
प्रवर्तन (Enforcement) का अंतर:
नागरिक अधिकारों का प्रवर्तन राष्ट्रीय न्यायालयों और विधिक संस्थाओं के माध्यम से होता है। मानवाधिकारों का प्रवर्तन राष्ट्रीय के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय तंत्रों द्वारा भी किया जाता है, जैसे मानवाधिकार आयोग और अंतरराष्ट्रीय निकाय।
निष्कर्ष:
नागरिक अधिकार मानवाधिकारों का एक उपसमुच्चय हैं। जहाँ नागरिक अधिकार राज्य-विशेष तक सीमित हैं, वहीं मानवाधिकार वैश्विक और सार्वभौमिक हैं। दोनों का उद्देश्य व्यक्ति की गरिमा की रक्षा है, किंतु मानवाधिकारों की अवधारणा अधिक व्यापक और समावेशी है।
7. मानवाधिकारों का ऐतिहासिक विकास संक्षेप में समझाइए
(Historical Development of Human Rights)
मानवाधिकारों का विकास एक क्रमिक और सतत प्रक्रिया रही है, जो प्राचीन काल से आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तक विस्तारित है। यह विकास मानव समाज के नैतिक, दार्शनिक और विधिक चिंतन के साथ जुड़ा हुआ है।
प्राचीन काल:
प्राचीन सभ्यताओं में मानवाधिकारों की स्पष्ट अवधारणा भले न रही हो, किंतु न्याय, समानता और कर्तव्य के विचार विद्यमान थे। भारत में धर्मशास्त्रों और अशोक के शिलालेखों में मानवता, करुणा और अहिंसा पर बल दिया गया। यूनान में अरस्तू और प्लेटो ने न्यायपूर्ण राज्य की अवधारणा प्रस्तुत की।
मध्यकाल:
मध्यकाल में अधिकारों की अवधारणा सीमित रही, किंतु 1215 की मैग्ना कार्टा ने पहली बार शासक की शक्ति पर विधिक नियंत्रण स्थापित किया। इसने यह सिद्धांत दिया कि राजा भी कानून से ऊपर नहीं है।
प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत:
17वीं और 18वीं शताब्दी में जॉन लॉक, रूसो और हॉब्स जैसे दार्शनिकों ने प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत दिया। लॉक ने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति को प्राकृतिक अधिकार माना, जिसने आधुनिक मानवाधिकारों की नींव रखी।
आधुनिक संवैधानिक युग:
अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणा (1776) और फ्रांसीसी मानव और नागरिक अधिकार घोषणा (1789) ने अधिकारों को संवैधानिक मान्यता दी। इन दस्तावेजों ने समानता, स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समानता के सिद्धांतों को स्थापित किया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद:
नाजी अत्याचारों के बाद मानवाधिकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। 1948 में सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा को अपनाया गया, जिसने मानवाधिकारों को वैश्विक नैतिक मानक बनाया।
निष्कर्ष:
मानवाधिकारों का इतिहास संघर्ष, सुधार और प्रगति की कहानी है। यह दर्शाता है कि मानवाधिकार स्थिर नहीं, बल्कि समय के साथ विकसित होने वाली अवधारणा है।
8. मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता से क्या तात्पर्य है?
(Universality of Human Rights)
मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता का अर्थ है कि ये अधिकार सभी व्यक्तियों को, हर स्थान और हर समय, बिना किसी भेदभाव के प्राप्त होते हैं। यह मानवाधिकार कानून का सबसे मौलिक सिद्धांत है।
सार्वभौमिकता का आधार यह धारणा है कि सभी मानव समान गरिमा और मूल्य के अधिकारी हैं। कोई भी सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक या आर्थिक भिन्नता इन अधिकारों को सीमित नहीं कर सकती।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, सार्वभौमिकता को 1948 की सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा में स्पष्ट रूप से मान्यता दी गई। इसमें कहा गया कि सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान अधिकारों के साथ जन्म लेते हैं।
हालाँकि, सार्वभौमिकता की अवधारणा पर सांस्कृतिक सापेक्षता के आधार पर आलोचना भी की जाती है। कुछ देशों का तर्क है कि मानवाधिकारों की व्याख्या स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के अनुसार होनी चाहिए। किंतु अंतरराष्ट्रीय समुदाय का सामान्य दृष्टिकोण यह है कि संस्कृति मानवाधिकारों का उल्लंघन करने का आधार नहीं बन सकती।
निष्कर्ष:
मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी व्यक्ति केवल अपनी पहचान या स्थान के कारण अधिकारों से वंचित न हो। यह सिद्धांत मानवाधिकारों को वैश्विक नैतिक शक्ति प्रदान करता है।
9. मानवाधिकार अविभाज्य क्यों माने जाते हैं?
(Why are Human Rights Indivisible?)
मानवाधिकारों की अविभाज्यता का अर्थ है कि सभी मानवाधिकार समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और किसी एक को दूसरे पर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार—सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
यदि किसी व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन शिक्षा या आजीविका का अधिकार नहीं है, तो उसकी स्वतंत्रता अर्थहीन हो जाती है। इसी प्रकार, केवल आर्थिक अधिकारों की पूर्ति बिना राजनीतिक स्वतंत्रता के अधूरी है।
अविभाज्यता का सिद्धांत शीत युद्ध के बाद विशेष रूप से स्वीकार किया गया, जब यह स्पष्ट हुआ कि केवल एक वर्ग के अधिकारों पर बल देने से मानव गरिमा की पूर्ण रक्षा संभव नहीं है।
निष्कर्ष:
मानवाधिकारों की अविभाज्यता यह सुनिश्चित करती है कि मानव जीवन को समग्र दृष्टि से देखा जाए और किसी भी अधिकार की उपेक्षा न हो।
10. मानवाधिकारों की अंतर–निर्भरता का अर्थ स्पष्ट कीजिए
(Interdependence of Human Rights)
मानवाधिकारों की अंतर–निर्भरता का अर्थ है कि एक मानवाधिकार की प्रभावशीलता अन्य मानवाधिकारों पर निर्भर करती है। कोई भी अधिकार स्वतंत्र रूप से पूर्ण नहीं हो सकता।
उदाहरण के लिए, शिक्षा का अधिकार बिना समानता और गैर-भेदभाव के अधिकार के प्रभावी नहीं हो सकता। स्वास्थ्य का अधिकार स्वच्छ पर्यावरण और जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है।
यह सिद्धांत दर्शाता है कि मानवाधिकार एक नेटवर्क की तरह हैं, जहाँ प्रत्येक अधिकार दूसरे को सुदृढ़ करता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून इसी समन्वित दृष्टिकोण पर आधारित है।
निष्कर्ष:
अंतर–निर्भरता का सिद्धांत मानवाधिकारों को एकीकृत प्रणाली के रूप में देखने की प्रेरणा देता है और यह सुनिश्चित करता है कि अधिकारों का संरक्षण समग्र रूप से किया जाए।
11. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का मानवाधिकारों से क्या संबंध है?
(Relationship between the Establishment of the United Nations and Human Rights)
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की स्थापना और मानवाधिकारों का संबंध अत्यंत गहरा और ऐतिहासिक है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए भीषण मानवाधिकार उल्लंघनों—जैसे यहूदी नरसंहार, युद्धबंदियों पर अत्याचार और नागरिकों की सामूहिक हत्या—ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह एहसास कराया कि केवल राज्य-केंद्रित संप्रभुता की अवधारणा मानव गरिमा की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई।
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का एक प्रमुख उद्देश्य भविष्य में युद्ध को रोकना था, किंतु इसके साथ-साथ यह भी स्वीकार किया गया कि स्थायी शांति तभी संभव है जब मानवाधिकारों का सम्मान और संरक्षण किया जाए। इसलिए मानवाधिकार संयुक्त राष्ट्र की विचारधारा और कार्यप्रणाली का केंद्रीय स्तंभ बन गए।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर की प्रस्तावना में ही “मानव अधिकारों में विश्वास की पुनः पुष्टि” की गई है। यह पहली बार था जब किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन के संस्थापक दस्तावेज़ में मानवाधिकारों को स्पष्ट रूप से मान्यता दी गई। इससे यह सिद्ध हुआ कि मानवाधिकार अब केवल आंतरिक विषय नहीं रहे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन गए हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकारों को केवल सैद्धांतिक स्तर पर स्वीकार नहीं किया, बल्कि उनके विकास, संवर्धन और संरक्षण के लिए संस्थागत ढाँचा भी विकसित किया। मानवाधिकार आयोग (अब मानवाधिकार परिषद), संधि-आधारित निकाय, विशेष प्रतिवेदक और सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (UPR) जैसे तंत्र इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं।
संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम 1948 में सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा का अंगीकरण रहा, जिसने मानवाधिकारों को वैश्विक नैतिक मानक का रूप दिया। इसके बाद अनेक अंतरराष्ट्रीय संधियाँ अस्तित्व में आईं, जिनसे मानवाधिकार विधिक रूप से बाध्यकारी बने।
इस प्रकार, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना ने मानवाधिकारों को अंतरराष्ट्रीय वैधता प्रदान की और यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी राज्य की संप्रभुता मानव गरिमा के उल्लंघन का औचित्य नहीं बन सकती। आज मानवाधिकार कानून का संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय ढाँचा संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की प्रत्यक्ष देन है।
12. संयुक्त राष्ट्र चार्टर में मानवाधिकारों का उल्लेख कहाँ और कैसे किया गया है?
(Human Rights under the United Nations Charter)
संयुक्त राष्ट्र चार्टर मानवाधिकारों के अंतरराष्ट्रीय संरक्षण का आधारभूत दस्तावेज़ है। यद्यपि चार्टर में मानवाधिकारों की विस्तृत सूची नहीं दी गई है, फिर भी इसके विभिन्न प्रावधान मानवाधिकारों की मान्यता और संवर्धन को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
चार्टर की प्रस्तावना में कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र “मानव अधिकारों, मानव व्यक्ति की गरिमा और मूल्य, तथा पुरुषों और महिलाओं के समान अधिकारों में विश्वास की पुनः पुष्टि” करता है। यह कथन मानवाधिकारों को संयुक्त राष्ट्र की मूल विचारधारा में स्थापित करता है।
अनुच्छेद 1(3) संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों में यह शामिल करता है कि वह “मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं के प्रति सम्मान को प्रोत्साहित और प्रोत्साहन देगा।” यह प्रावधान मानवाधिकारों को संगठन के मुख्य कार्यों में सम्मिलित करता है।
अनुच्छेद 55 के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र को यह दायित्व सौंपा गया है कि वह जीवन-स्तर में सुधार, सामाजिक-आर्थिक विकास और मानवाधिकारों के प्रति सार्वभौमिक सम्मान को बढ़ावा दे।
अनुच्छेद 56 में सदस्य राज्यों को यह वचनबद्ध किया गया है कि वे संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कार्य करेंगे।
यद्यपि चार्टर में मानवाधिकारों की परिभाषा या सूची नहीं है, फिर भी इन प्रावधानों ने आगे चलकर मानवाधिकार घोषणाओं और संधियों का मार्ग प्रशस्त किया। चार्टर के कारण ही मानवाधिकारों को अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय माना गया और राज्य अपने आंतरिक मामलों का हवाला देकर इससे पूर्णतः बच नहीं सकते।
इस प्रकार, संयुक्त राष्ट्र चार्टर मानवाधिकारों का संवैधानिक आधार है, जिस पर संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून निर्मित हुआ।
13. सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा (UDHR) क्या है?
(What is the Universal Declaration of Human Rights?)
Universal Declaration of Human Rights (UDHR) मानवाधिकारों का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़ है। इसे 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया गया। इसका उद्देश्य मानवाधिकारों के ऐसे सार्वभौमिक मानक स्थापित करना था, जिन्हें सभी राष्ट्र स्वीकार कर सकें।
UDHR की प्रस्तावना मानव गरिमा, समानता और अधिकारों की सार्वभौमिकता पर बल देती है। इसमें कुल 30 अनुच्छेद हैं, जिनमें नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को समाहित किया गया है।
UDHR का महत्व इस बात में निहित है कि इसने पहली बार मानवाधिकारों को समग्र रूप में प्रस्तुत किया। जीवन, स्वतंत्रता, समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा—सभी को एक ही दस्तावेज़ में मान्यता दी गई।
यद्यपि UDHR विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं है, फिर भी इसका नैतिक और राजनीतिक प्रभाव अत्यंत व्यापक रहा है। अनेक देशों के संविधान और मानवाधिकार कानून इससे प्रेरित हैं। भारत का संविधान भी UDHR की भावना को प्रतिबिंबित करता है।
इस प्रकार, UDHR मानवाधिकारों की “मैग्ना कार्टा” कही जाती है और यह आधुनिक मानवाधिकार कानून की आधारशिला है।
14. UDHR को अपनाने की तिथि क्या है और इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है?
(Date of Adoption and Historical Importance of UDHR)
Universal Declaration of Human Rights को 10 दिसंबर 1948 को पेरिस में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया गया। यह तिथि मानवाधिकारों के इतिहास में मील का पत्थर है और इसी कारण हर वर्ष 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है।
UDHR को अपनाने का ऐतिहासिक महत्व द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है। युद्ध के दौरान हुए अमानवीय कृत्यों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि मानवाधिकारों के लिए कोई वैश्विक मानक नहीं होगा, तो मानवता बार-बार ऐसी त्रासदियों का शिकार होती रहेगी।
UDHR ने पहली बार यह घोषणा की कि मानवाधिकार किसी राज्य की कृपा नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार हैं। इसने मानवाधिकारों को नैतिक दर्शन से निकालकर अंतरराष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना दिया।
इसके बाद UDHR ने अनेक बाध्यकारी संधियों—जैसे ICCPR और ICESCR—का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रकार, 10 दिसंबर 1948 केवल एक दस्तावेज़ के अंगीकरण की तिथि नहीं, बल्कि मानव गरिमा की वैश्विक स्वीकृति का प्रतीक है।
15. UDHR का कानूनी स्वरूप क्या है?
(Legal Status of the Universal Declaration of Human Rights)
Universal Declaration of Human Rights का कानूनी स्वरूप एक महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न रहा है। तकनीकी रूप से UDHR विधिक रूप से बाध्यकारी संधि नहीं है, क्योंकि इसे महासभा के प्रस्ताव के रूप में अपनाया गया था, न कि किसी संधि के रूप में।
इसके बावजूद, UDHR का कानूनी महत्व कम नहीं है। समय के साथ-साथ इसके कई प्रावधान परंपरागत अंतरराष्ट्रीय कानून (Customary International Law) का हिस्सा बन गए हैं। अनेक न्यायालयों ने UDHR को मानवाधिकारों की व्याख्या के लिए संदर्भ के रूप में अपनाया है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी UDHR का प्रभाव व्यापक है। कई देशों ने अपने संविधान और कानूनों में इसके सिद्धांतों को समाहित किया है। भारत में भी सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक मामलों में UDHR का उल्लेख किया है।
इसके अतिरिक्त, UDHR ने बाध्यकारी मानवाधिकार संधियों का आधार प्रदान किया, जिससे इसके सिद्धांत विधिक रूप से लागू हुए। इसलिए कहा जा सकता है कि UDHR भले ही औपचारिक रूप से बाध्यकारी न हो, किंतु इसका व्यावहारिक और नैतिक प्रभाव विधिक बाध्यता के समान है।
16. UDHR में कुल कितने अनुच्छेद हैं और उनकी संरचना क्या है?
(Number of Articles and Structure of the Universal Declaration of Human Rights)
Universal Declaration of Human Rights (UDHR) में कुल 30 अनुच्छेद हैं। इन अनुच्छेदों की संरचना सुव्यवस्थित और तार्किक है, ताकि मानवाधिकारों को समग्र, अविभाज्य और सार्वभौमिक रूप में प्रस्तुत किया जा सके। UDHR की प्रस्तावना के बाद अनुच्छेदों को विषयवस्तु के आधार पर समझा जा सकता है।
(1) अनुच्छेद 1–2: मूल सिद्धांत
अनुच्छेद 1 मानव गरिमा, स्वतंत्रता और समानता की घोषणा करता है—सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान अधिकारों के साथ जन्म लेते हैं। अनुच्छेद 2 गैर-भेदभाव के सिद्धांत को स्थापित करता है, जिसके अनुसार जाति, धर्म, लिंग, भाषा, राष्ट्रीयता आदि के आधार पर किसी प्रकार का भेद नहीं किया जा सकता।
(2) अनुच्छेद 3–11: नागरिक अधिकार
इन अनुच्छेदों में जीवन, स्वतंत्रता, सुरक्षा, दासता और यातना से मुक्ति, कानून के समक्ष समानता, निष्पक्ष सुनवाई और निर्दोषता की अनुमानना जैसे अधिकार शामिल हैं। ये अधिकार व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विधिक सुरक्षा का आधार हैं।
(3) अनुच्छेद 12–17: स्वतंत्रता और संपत्ति से जुड़े अधिकार
निजता, आवागमन की स्वतंत्रता, शरण का अधिकार, राष्ट्रीयता का अधिकार और संपत्ति का अधिकार इन अनुच्छेदों में निहित हैं।
(4) अनुच्छेद 18–21: राजनीतिक और वैचारिक अधिकार
धर्म, विचार, अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा और शासन में भागीदारी के अधिकार इन अनुच्छेदों का विषय हैं। ये लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला हैं।
(5) अनुच्छेद 22–27: आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार
सामाजिक सुरक्षा, कार्य, विश्राम, पर्याप्त जीवन-स्तर, शिक्षा और सांस्कृतिक जीवन में भागीदारी के अधिकार यहाँ सम्मिलित हैं।
(6) अनुच्छेद 28–30: कर्तव्य और सीमाएँ
इनमें सामाजिक व्यवस्था, कर्तव्यों और अधिकारों पर वैधानिक सीमाओं का उल्लेख है।
इस संरचना से स्पष्ट है कि UDHR मानवाधिकारों को किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं करता, बल्कि मानव जीवन के हर आयाम को समाहित करता है।
17. UDHR का अनुच्छेद 1 क्या कहता है और इसका महत्व क्या है?
(Article 1 of UDHR and Its Significance)
Universal Declaration of Human Rights का अनुच्छेद 1 मानवाधिकारों की आत्मा माना जाता है। इसमें कहा गया है—
“सभी मनुष्य स्वतंत्र और गरिमा तथा अधिकारों में समान जन्म लेते हैं। उन्हें बुद्धि और अंतरात्मा प्राप्त है और उन्हें परस्पर भ्रातृत्व की भावना से कार्य करना चाहिए।”
यह अनुच्छेद तीन मूलभूत सिद्धांतों को स्थापित करता है—स्वतंत्रता, समानता और गरिमा। यह स्पष्ट करता है कि मानवाधिकार किसी राज्य की देन नहीं, बल्कि जन्मसिद्ध हैं।
अनुच्छेद 1 का महत्व इस कारण भी है कि यह मानवाधिकारों को केवल विधिक नहीं, बल्कि नैतिक और दार्शनिक आधार प्रदान करता है। “भ्रातृत्व की भावना” का उल्लेख यह संकेत देता है कि अधिकारों के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी निहित हैं।
न्यायिक व्याख्याओं में भी अनुच्छेद 1 को मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में अपनाया गया है। अनेक राष्ट्रीय न्यायालयों ने समानता और गरिमा की व्याख्या करते समय इस अनुच्छेद का सहारा लिया है।
इस प्रकार, अनुच्छेद 1 मानवाधिकारों का मूल घोषवाक्य है, जिस पर संपूर्ण UDHR आधारित है।
18. UDHR का अनुच्छेद 21 किस अधिकार से संबंधित है?
(Article 21 of UDHR)
Universal Declaration of Human Rights का अनुच्छेद 21 राजनीतिक अधिकारों और लोकतांत्रिक शासन से संबंधित है। यह तीन प्रमुख अधिकारों को मान्यता देता है—
- प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश की सरकार में प्रत्यक्ष या स्वतंत्र रूप से चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से भाग लेने का अधिकार है।
- प्रत्येक व्यक्ति को समान शर्तों पर सार्वजनिक सेवा में प्रवेश का अधिकार है।
- सरकार की सत्ता जनता की इच्छा पर आधारित होगी, जो निष्पक्ष और नियमित चुनावों द्वारा व्यक्त की जाएगी।
अनुच्छेद 21 का महत्व यह है कि यह लोकतंत्र को मानवाधिकार के रूप में स्थापित करता है। यह स्पष्ट करता है कि शासन की वैधता जनता की सहमति से आती है, न कि बल या वंशानुक्रम से।
यह अनुच्छेद केवल मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक भागीदारी के व्यापक अधिकार को मान्यता देता है। इससे अभिव्यक्ति, संगठन और सभा की स्वतंत्रता जैसे अधिकार भी सुदृढ़ होते हैं।
आज अधिकांश लोकतांत्रिक संविधानों में जो चुनावी और राजनीतिक अधिकार निहित हैं, उनका वैचारिक स्रोत अनुच्छेद 21 में निहित है।
19. UDHR का अनुच्छेद 25 किस अधिकार से संबंधित है?
(Article 25 of UDHR)
Universal Declaration of Human Rights का अनुच्छेद 25 पर्याप्त जीवन-स्तर और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार से संबंधित है। यह अनुच्छेद कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे जीवन-स्तर का अधिकार है, जो उसके और उसके परिवार के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए पर्याप्त हो।
इसमें भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा देखभाल और आवश्यक सामाजिक सेवाओं का स्पष्ट उल्लेख है। साथ ही बेरोज़गारी, बीमारी, विकलांगता, वृद्धावस्था और अन्य परिस्थितियों में सुरक्षा का अधिकार भी प्रदान किया गया है।
अनुच्छेद 25 का महत्व इस बात में है कि यह आर्थिक और सामाजिक अधिकारों को मानवाधिकारों के समान दर्जे पर रखता है। यह सिद्ध करता है कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है; सम्मानजनक जीवन के लिए सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा भी आवश्यक है।
आधुनिक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा इसी अनुच्छेद की भावना से प्रेरित है।
20. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद क्या है?
(United Nations Human Rights Council)
United Nations Human Rights Council (UNHRC) संयुक्त राष्ट्र की एक प्रमुख संस्था है, जिसकी स्थापना 2006 में हुई। इसका उद्देश्य विश्व-भर में मानवाधिकारों के संरक्षण और संवर्धन को सुदृढ़ करना है।
मानवाधिकार परिषद महासभा की सहायक संस्था है और इसमें 47 सदस्य देश होते हैं, जिन्हें भौगोलिक प्रतिनिधित्व के आधार पर चुना जाता है। परिषद का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मानवाधिकार उल्लंघनों की समीक्षा और राज्यों को सुधार हेतु सिफारिशें देना है।
UNHRC की एक प्रमुख प्रक्रिया सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (UPR) है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक सदस्य देश के मानवाधिकार रिकॉर्ड की नियमित समीक्षा की जाती है। इसके अतिरिक्त, विशेष प्रतिवेदक, कार्य समूह और जांच आयोग भी परिषद के अधीन कार्य करते हैं।
यद्यपि परिषद के निर्णय बाध्यकारी नहीं होते, फिर भी इसका नैतिक और राजनीतिक प्रभाव अत्यंत व्यापक है। यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों की ओर आकर्षित करती है और जवाबदेही सुनिश्चित करने का मंच प्रदान करती है।
इस प्रकार, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद आधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण व्यवस्था की केन्द्रीय संस्था है।
21. अंतरराष्ट्रीय नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर करार (ICCPR) क्या है?
(International Covenant on Civil and Political Rights)
International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR) मानवाधिकारों के अंतरराष्ट्रीय विधिक ढाँचे का एक केंद्रीय स्तंभ है। इसे 1966 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंगीकृत किया गया और 1976 में यह लागू हुआ। ICCPR का उद्देश्य उन अधिकारों की रक्षा करना है, जो व्यक्ति की राजनीतिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत सुरक्षा और विधिक समानता से जुड़े हैं।
ICCPR, 1948 की सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा के सिद्धांतों को विधिक रूप से बाध्यकारी स्वरूप प्रदान करता है। यह घोषणा करता है कि कुछ अधिकार इतने मूलभूत हैं कि राज्य उन्हें न तो मनमाने ढंग से सीमित कर सकता है और न ही उनसे विमुख हो सकता है। इनमें जीवन का अधिकार, यातना से मुक्ति, दासता का निषेध, निष्पक्ष सुनवाई, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक भागीदारी जैसे अधिकार शामिल हैं।
इस करार की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह नकारात्मक दायित्वों (negative obligations) पर बल देता है, अर्थात् राज्य का कर्तव्य है कि वह इन अधिकारों के प्रयोग में अनावश्यक हस्तक्षेप न करे। साथ ही, कुछ अधिकारों के संबंध में सकारात्मक दायित्व भी निर्धारित किए गए हैं, जैसे प्रभावी विधिक उपचार उपलब्ध कराना।
ICCPR के अंतर्गत एक निगरानी तंत्र भी स्थापित किया गया है—मानवाधिकार समिति (Human Rights Committee)। सदस्य राज्य इस समिति के समक्ष आवधिक रिपोर्ट प्रस्तुत करते हैं, जिनके माध्यम से यह आकलन किया जाता है कि करार के प्रावधानों का पालन किस सीमा तक किया जा रहा है। वैकल्पिक प्रोटोकॉल के अंतर्गत व्यक्तिगत शिकायतों की व्यवस्था भी उपलब्ध है।
इस प्रकार, ICCPR नागरिक और राजनीतिक अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में लाकर उन्हें नैतिक दावों से विधिक अधिकारों में रूपांतरित करता है।
22. ICCPR कब लागू हुआ और इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है?
(Enforcement and Historical Significance of ICCPR)
International Covenant on Civil and Political Rights को 1966 में अपनाया गया, किंतु यह 23 मार्च 1976 को आवश्यक संख्या में राज्यों की पुष्टि के बाद लागू हुआ। इसका ऐतिहासिक महत्व शीत युद्ध की पृष्ठभूमि में विशेष रूप से समझा जा सकता है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मानवाधिकारों पर वैश्विक सहमति तो बनी, परंतु उन्हें बाध्यकारी रूप देने में राजनीतिक मतभेद आड़े आए। पश्चिमी देशों ने नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर, जबकि समाजवादी देशों ने आर्थिक और सामाजिक अधिकारों पर अधिक बल दिया। ICCPR का लागू होना इस बात का संकेत था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय कम-से-कम नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के संबंध में कानूनी सहमति तक पहुँच चुका है।
ICCPR ने यह स्पष्ट किया कि मानवाधिकार केवल आंतरिक विषय नहीं हैं। इसके लागू होने से राज्यों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्तरदायित्व स्थापित हुआ। अब किसी राज्य के मानवाधिकार रिकॉर्ड की समीक्षा केवल घरेलू नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी की जा सकती है।
इतिहास में पहली बार नागरिक और राजनीतिक अधिकारों—जैसे निष्पक्ष सुनवाई, राजनीतिक भागीदारी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता—को अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्गत बाध्यकारी बनाया गया। इसने अनेक देशों के संवैधानिक और विधिक सुधारों को भी प्रेरित किया।
इस प्रकार, ICCPR का लागू होना मानवाधिकारों के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ है, जिसने मानवाधिकार संरक्षण को राजनीतिक प्रतिबद्धता से आगे बढ़ाकर विधिक दायित्व बना दिया।
23. ICCPR के अंतर्गत कौन-कौन से अधिकार आते हैं?
(Rights Covered under ICCPR)
International Covenant on Civil and Political Rights के अंतर्गत अधिकारों को मुख्यतः नागरिक और राजनीतिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
सबसे प्रमुख अधिकार है जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 6), जिसे सर्वोच्च और अविच्छिन्न माना गया है। इसके अंतर्गत मनमानी हत्या और मृत्युदंड के दुरुपयोग पर रोक लगाई गई है।
यातना और अमानवीय व्यवहार का निषेध (अनुच्छेद 7) पूर्ण अधिकार है, जिस पर किसी भी परिस्थिति में अपवाद स्वीकार्य नहीं है।
इसके अतिरिक्त, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा (अनुच्छेद 9), निष्पक्ष और सार्वजनिक सुनवाई का अधिकार (अनुच्छेद 14), तथा कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 26) भी ICCPR के महत्वपूर्ण अधिकार हैं।
राजनीतिक अधिकारों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19), सभा और संगठन की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21–22), और राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी का अधिकार (अनुच्छेद 25) शामिल हैं। ये अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था के संचालन के लिए अनिवार्य माने जाते हैं।
इस प्रकार, ICCPR उन अधिकारों का व्यापक ढाँचा प्रस्तुत करता है, जो व्यक्ति को राज्य की शक्ति के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करते हैं।
24. ICCPR का अनुच्छेद 6 किस अधिकार से संबंधित है?
(Article 6 of ICCPR)
International Covenant on Civil and Political Rights का अनुच्छेद 6 जीवन के अधिकार से संबंधित है और इसे ICCPR का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान माना जाता है। इसमें कहा गया है कि प्रत्येक मानव को जीवन का अंतर्निहित अधिकार है और किसी को भी मनमाने ढंग से उसके जीवन से वंचित नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 6 जीवन के अधिकार को केवल जैविक अस्तित्व तक सीमित नहीं करता, बल्कि इसे गरिमापूर्ण जीवन के व्यापक अर्थ में देखता है। मानवाधिकार समिति ने अपनी व्याख्याओं में स्पष्ट किया है कि राज्य का दायित्व केवल जीवन से वंचित न करना नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा के लिए सकारात्मक उपाय करना भी है।
मृत्युदंड के संदर्भ में, अनुच्छेद 6 इसे पूर्णतः निषिद्ध नहीं करता, परंतु इसे अत्यंत सीमित परिस्थितियों तक प्रतिबंधित करता है। “सबसे गंभीर अपराधों” के अतिरिक्त मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता और निष्पक्ष प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
इस प्रकार, अनुच्छेद 6 जीवन के अधिकार को मानवाधिकार व्यवस्था की केन्द्रीय धुरी के रूप में स्थापित करता है।
25. अंतरराष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर करार (ICESCR) क्या है?
(International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights)
International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights (ICESCR) को 1966 में अपनाया गया और 1976 में लागू किया गया। इसका उद्देश्य उन अधिकारों की रक्षा करना है, जो व्यक्ति के सामाजिक-आर्थिक कल्याण और सांस्कृतिक विकास से संबंधित हैं।
ICESCR शिक्षा, स्वास्थ्य, कार्य, सामाजिक सुरक्षा, पर्याप्त जीवन-स्तर और सांस्कृतिक जीवन में भागीदारी जैसे अधिकारों को मान्यता देता है। इसकी एक प्रमुख विशेषता “प्रगतिशील कार्यान्वयन” का सिद्धांत है, जिसके अनुसार राज्य अपनी उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप धीरे-धीरे इन अधिकारों की पूर्ति करेंगे।
ICESCR ने यह स्पष्ट किया कि आर्थिक और सामाजिक अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने नागरिक और राजनीतिक अधिकार। इसके अंतर्गत आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की समिति निगरानी का कार्य करती है।
इस प्रकार, ICESCR मानवाधिकारों के सामाजिक-आर्थिक आयाम को विधिक मान्यता प्रदान करता है और मानव गरिमा की समग्र अवधारणा को सुदृढ़ करता है।
26. ICESCR में कौन-कौन से अधिकार शामिल हैं?
(Rights under the International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights)
International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights (ICESCR) मानवाधिकारों के सामाजिक-आर्थिक आयाम को विधिक मान्यता देने वाला एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय करार है। इसे 1966 में अंगीकृत किया गया और 1976 में लागू हुआ। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन, सामाजिक सुरक्षा और सांस्कृतिक विकास के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ प्राप्त हों।
ICESCR के अंतर्गत अधिकारों को व्यापक रूप से निम्नलिखित वर्गों में समझा जा सकता है:
(1) कार्य और श्रम अधिकार
करार का अनुच्छेद 6 प्रत्येक व्यक्ति को कार्य का अधिकार प्रदान करता है। यह केवल रोजगार पाने का अधिकार नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से चुने गए कार्य और कौशल विकास के अवसरों का भी संरक्षण करता है।
अनुच्छेद 7 निष्पक्ष और अनुकूल कार्य परिस्थितियों—जैसे समान वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल और विश्राम—का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 8 श्रमिक संघ बनाने और उनमें शामिल होने की स्वतंत्रता को मान्यता देता है।
(2) सामाजिक सुरक्षा का अधिकार
अनुच्छेद 9 सामाजिक सुरक्षा के अधिकार को स्वीकार करता है। इसमें वृद्धावस्था, बीमारी, विकलांगता, बेरोज़गारी और मातृत्व के दौरान सुरक्षा शामिल है। यह प्रावधान कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को सुदृढ़ करता है।
(3) परिवार और मातृत्व संरक्षण
अनुच्छेद 10 परिवार को समाज की मूल इकाई मानते हुए विशेष संरक्षण प्रदान करता है। मातृत्व के दौरान महिलाओं की सुरक्षा और बच्चों के शोषण के निषेध पर विशेष बल दिया गया है।
(4) पर्याप्त जीवन-स्तर का अधिकार
अनुच्छेद 11 प्रत्येक व्यक्ति को पर्याप्त भोजन, वस्त्र और आवास का अधिकार देता है। इसमें भूख से मुक्ति को विशेष महत्व दिया गया है। यह अधिकार जीवन के अधिकार का सामाजिक-आर्थिक विस्तार है।
(5) स्वास्थ्य का अधिकार
अनुच्छेद 12 शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के सर्वोच्च संभव स्तर का अधिकार प्रदान करता है। इसमें स्वच्छता, रोग-नियंत्रण और चिकित्सा सेवाओं तक पहुँच शामिल है।
(6) शिक्षा का अधिकार
अनुच्छेद 13 और 14 शिक्षा के अधिकार को मान्यता देते हैं। प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और निःशुल्क बनाने पर विशेष बल दिया गया है।
(7) सांस्कृतिक अधिकार
अनुच्छेद 15 सांस्कृतिक जीवन में भागीदारी, वैज्ञानिक प्रगति का लाभ उठाने और रचनात्मक कार्यों के संरक्षण का अधिकार देता है।
निष्कर्ष:
ICESCR यह स्पष्ट करता है कि मानवाधिकार केवल राजनीतिक स्वतंत्रताओं तक सीमित नहीं हैं। सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा और सांस्कृतिक विकास मानव गरिमा के लिए उतने ही आवश्यक हैं। इस प्रकार, ICESCR मानवाधिकारों की समग्र अवधारणा को पूर्णता प्रदान करता है।
27. ICESCR के अनुच्छेद 11 का विषय क्या है?
(Article 11 of ICESCR)
International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights का अनुच्छेद 11 पर्याप्त जीवन-स्तर और भूख से मुक्ति के अधिकार से संबंधित है। यह प्रावधान ICESCR के सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक अनुच्छेदों में से एक माना जाता है।
अनुच्छेद 11(1) के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने और अपने परिवार के लिए पर्याप्त जीवन-स्तर का अधिकार है, जिसमें पर्याप्त भोजन, वस्त्र और आवास, तथा जीवन-स्थितियों में निरंतर सुधार शामिल है। यह अधिकार केवल न्यूनतम अस्तित्व तक सीमित नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन के मानक को स्थापित करता है।
अनुच्छेद 11(2) विशेष रूप से भूख से मुक्ति के अधिकार को मान्यता देता है। यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर यह दायित्व डालता है कि वह कृषि सुधार, खाद्य उत्पादन, वितरण और संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग को बढ़ावा दे।
मानवाधिकार समिति (CESCR) ने अपनी सामान्य टिप्पणियों में स्पष्ट किया है कि भोजन का अधिकार केवल कैलोरी की उपलब्धता नहीं, बल्कि पोषण, सुरक्षा और सांस्कृतिक स्वीकार्यता से भी जुड़ा है। इसी प्रकार, आवास का अधिकार केवल छत तक सीमित नहीं, बल्कि सुरक्षा, गोपनीयता और बुनियादी सुविधाओं को भी समाहित करता है।
अनुच्छेद 11 का महत्व इस बात में है कि यह गरीबी, भूख और बेघरपन को मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में पहचानता है। यह राज्यों को सक्रिय नीतियाँ अपनाने के लिए बाध्य करता है।
निष्कर्ष:
अनुच्छेद 11 मानवाधिकारों के सामाजिक-आर्थिक आयाम को व्यावहारिक रूप देता है और यह सुनिश्चित करता है कि मानव गरिमा केवल कानूनी स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि भौतिक सुरक्षा से भी जुड़ी है।
28. ICCPR और ICESCR में मुख्य अंतर बताइए
(Difference between ICCPR and ICESCR)
International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR) और
International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights (ICESCR) दोनों 1966 में अंगीकृत किए गए और 1976 में लागू हुए। दोनों मिलकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्था की रीढ़ हैं, किंतु इनके बीच महत्वपूर्ण अंतर हैं।
(1) अधिकारों की प्रकृति:
ICCPR नागरिक और राजनीतिक अधिकारों—जैसे जीवन, स्वतंत्रता, निष्पक्ष सुनवाई और अभिव्यक्ति—से संबंधित है।
ICESCR आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों—जैसे कार्य, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास—से संबंधित है।
(2) राज्य का दायित्व:
ICCPR मुख्यतः तत्काल लागू होने वाले दायित्व निर्धारित करता है।
ICESCR में प्रगतिशील कार्यान्वयन का सिद्धांत है, जिसके अनुसार राज्य संसाधनों के अनुरूप धीरे-धीरे अधिकारों की पूर्ति करेंगे।
(3) प्रवर्तन तंत्र:
ICCPR के अंतर्गत मानवाधिकार समिति व्यक्तिगत शिकायतें सुन सकती है।
ICESCR में यह व्यवस्था बाद में वैकल्पिक प्रोटोकॉल द्वारा विकसित हुई।
निष्कर्ष:
दोनों करार परस्पर पूरक हैं और मानवाधिकारों की अविभाज्यता के सिद्धांत को सुदृढ़ करते हैं।
29. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विधेयक (International Bill of Human Rights) क्या है?
International Bill of Human Rights तीन प्रमुख दस्तावेज़ों का सामूहिक नाम है—
- Universal Declaration of Human Rights
- International Covenant on Civil and Political Rights
- International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights
इसका उद्देश्य मानवाधिकारों को नैतिक घोषणा से आगे बढ़ाकर विधिक अधिकारों में परिवर्तित करना था। UDHR ने मानक स्थापित किए, जबकि दोनों करारों ने उन्हें बाध्यकारी बनाया।
यह विधेयक मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता, अविभाज्यता और अंतर-निर्भरता को स्पष्ट करता है और आधुनिक मानवाधिकार कानून की आधारशिला है।
30. CEDAW का उद्देश्य क्या है?
(Objective of the Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination Against Women)
Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination Against Women (CEDAW) को 1979 में अंगीकृत किया गया और 1981 में लागू हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव का उन्मूलन करना है।
CEDAW महिलाओं को कानूनी समानता, राजनीतिक भागीदारी, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन में समान अधिकार सुनिश्चित करता है। यह केवल औपचारिक समानता नहीं, बल्कि वास्तविक (substantive) समानता पर बल देता है।
यह करार राज्यों पर यह दायित्व डालता है कि वे सामाजिक-सांस्कृतिक रूढ़ियों को समाप्त करें और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए सक्रिय कदम उठाएँ।
निष्कर्ष:
CEDAW को महिलाओं के अधिकारों की “अंतरराष्ट्रीय विधेयिका” कहा जाता है और यह लैंगिक समानता की वैश्विक लड़ाई का केन्द्रीय दस्तावेज़ है।
31. CEDAW महिलाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
(Importance of CEDAW for Women)
Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination Against Women (CEDAW) महिलाओं के अधिकारों से संबंधित सबसे व्यापक और प्रभावशाली अंतरराष्ट्रीय संधि है। इसे 1979 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंगीकृत किया गया और 1981 में लागू किया गया। CEDAW को प्रायः “महिलाओं के अधिकारों का अंतरराष्ट्रीय विधेयक” कहा जाता है, क्योंकि यह महिलाओं के जीवन के लगभग हर क्षेत्र में समानता सुनिश्चित करने का प्रयास करता है।
CEDAW महिलाओं के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लैंगिक भेदभाव को एक मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में स्पष्ट रूप से पहचानता है। इससे पहले भेदभाव को सामाजिक या सांस्कृतिक समस्या के रूप में देखा जाता था, किंतु CEDAW ने इसे विधिक उत्तरदायित्व के दायरे में ला दिया। यह संधि केवल प्रत्यक्ष भेदभाव ही नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष और संरचनात्मक भेदभाव को भी समाप्त करने पर बल देती है।
CEDAW का एक प्रमुख महत्व यह है कि यह औपचारिक समानता (formal equality) से आगे बढ़कर वास्तविक या सार्थक समानता (substantive equality) की अवधारणा को अपनाता है। इसका अर्थ है कि केवल कानून में समानता पर्याप्त नहीं है; बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बाधाओं को दूर करना भी राज्य का दायित्व है। इसी कारण CEDAW विशेष उपायों (affirmative action) को भी वैध ठहराता है।
यह संधि महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों को सुदृढ़ करती है—जैसे मतदान, चुनाव लड़ने और सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति का अधिकार। साथ ही यह शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, विवाह और पारिवारिक संबंधों में समानता पर विशेष बल देती है। घरेलू हिंसा, मानव तस्करी और शोषण जैसी समस्याओं को CEDAW के दायरे में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन माना गया है।
CEDAW का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू इसका निगरानी तंत्र है। सदस्य राज्यों को CEDAW समिति के समक्ष आवधिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है, जिससे यह आकलन किया जाता है कि महिलाओं के अधिकारों की स्थिति क्या है। यह तंत्र अंतरराष्ट्रीय दबाव और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
निष्कर्षतः, CEDAW महिलाओं के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उन्हें केवल संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि अधिकारों की समान धारक के रूप में स्थापित करता है और लैंगिक न्याय की वैश्विक रूपरेखा प्रदान करता है।
32. बाल अधिकारों पर कन्वेंशन (CRC) क्या है?
(Convention on the Rights of the Child)
Convention on the Rights of the Child (CRC) बच्चों के अधिकारों से संबंधित सबसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय संधि है। इसे 1989 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंगीकृत किया गया और 1990 में लागू किया गया। CRC का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक बच्चे को सम्मान, सुरक्षा और विकास के समान अवसर प्राप्त हों।
CRC बच्चों को केवल संरक्षण की वस्तु नहीं, बल्कि स्वतंत्र अधिकार-धारी (rights holder) के रूप में मान्यता देता है। यह दृष्टिकोण इसे पूर्ववर्ती दस्तावेज़ों से अलग बनाता है। CRC के अंतर्गत नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक—सभी प्रकार के अधिकार सम्मिलित हैं।
CRC के चार मूल सिद्धांत माने जाते हैं—
- गैर-भेदभाव का सिद्धांत
- बच्चे के सर्वोत्तम हित का सिद्धांत
- जीवन, अस्तित्व और विकास का अधिकार
- बच्चे की राय का सम्मान
इन सिद्धांतों के माध्यम से CRC बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा और सहभागिता को सुनिश्चित करता है। बाल श्रम, बाल विवाह, बाल तस्करी और यौन शोषण जैसे विषयों को CRC के तहत गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन माना गया है।
CRC का महत्व इस तथ्य में भी निहित है कि यह लगभग सार्वभौमिक रूप से अंगीकृत संधि है, जिससे बच्चों के अधिकारों को वैश्विक मान्यता मिली है। इसके अंतर्गत बाल अधिकार समिति राज्यों की रिपोर्टों की समीक्षा करती है और सुधार के लिए सिफारिशें देती है।
निष्कर्ष:
CRC बच्चों को समाज के भविष्य के रूप में नहीं, बल्कि वर्तमान के अधिकार-सम्पन्न नागरिक के रूप में स्वीकार करता है और उनके समग्र विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक स्थापित करता है।
33. CRC के अनुसार बच्चे की परिभाषा क्या है?
(Definition of a Child under CRC)
Convention on the Rights of the Child के अनुच्छेद 1 के अनुसार, “बच्चा” वह प्रत्येक व्यक्ति है जिसकी आयु 18 वर्ष से कम है, जब तक कि संबंधित राष्ट्रीय कानून के अनुसार बहुमत की आयु पहले प्राप्त न हो जाती हो। यह परिभाषा बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक स्पष्ट और व्यापक मानक प्रदान करती है।
इस परिभाषा का महत्व इस बात में है कि यह बच्चों को वयस्कों से अलग कानूनी श्रेणी में रखती है, जिससे उनकी विशेष आवश्यकताओं और भेद्यता को पहचाना जा सके। 18 वर्ष की सीमा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक समान मानक प्रदान करती है, जिससे राज्यों के बीच सामंजस्य स्थापित होता है।
हालाँकि, CRC यह भी स्वीकार करता है कि कुछ देशों में बहुमत की आयु अलग हो सकती है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चों के अधिकारों को सीमित किया जाए। CRC का उद्देश्य न्यूनतम संरक्षण सुनिश्चित करना है।
इस परिभाषा का प्रभाव शिक्षा, श्रम, आपराधिक न्याय और पारिवारिक कानून जैसे क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, बाल श्रम के निषेध और किशोर न्याय प्रणाली का आधार इसी परिभाषा पर टिका है।
निष्कर्ष:
CRC के अंतर्गत बच्चे की परिभाषा केवल आयु-आधारित नहीं, बल्कि अधिकार-आधारित संरक्षण का आधार है, जो बच्चों के हितों को सर्वोपरि रखती है।
34. बच्चों के सर्वोत्तम हित का सिद्धांत क्या है?
(Best Interests of the Child Principle)
Convention on the Rights of the Child का सर्वोत्तम हित का सिद्धांत (Best Interests of the Child) इसके सबसे केंद्रीय सिद्धांतों में से एक है। अनुच्छेद 3 के अनुसार, बच्चों से संबंधित सभी कार्यवाहियों में उनके सर्वोत्तम हित को प्राथमिक consideration दी जानी चाहिए।
इस सिद्धांत का अर्थ है कि किसी भी निर्णय—चाहे वह न्यायिक हो, प्रशासनिक हो या विधायी—में यह देखा जाए कि उसका प्रभाव बच्चे के शारीरिक, मानसिक, नैतिक और सामाजिक विकास पर क्या पड़ेगा। यह सिद्धांत बच्चों को वयस्कों के हितों या प्रशासनिक सुविधा के अधीन होने से बचाता है।
यह सिद्धांत अभिरक्षा, गोद लेने, शिक्षा, स्वास्थ्य और किशोर न्याय जैसे मामलों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, किसी अभिरक्षा विवाद में माता-पिता के अधिकारों से अधिक महत्व बच्चे के कल्याण को दिया जाता है।
हालाँकि, इस सिद्धांत की आलोचना यह कहकर की जाती है कि यह कभी-कभी अत्यधिक विवेकाधीन हो सकता है। किंतु CRC समिति ने स्पष्ट किया है कि सर्वोत्तम हित का निर्धारण वस्तुनिष्ठ मानदंडों और बच्चे की राय को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष:
बच्चों के सर्वोत्तम हित का सिद्धांत बच्चों को अधिकार-केंद्रित दृष्टिकोण प्रदान करता है और यह सुनिश्चित करता है कि वे हर निर्णय के केंद्र में हों।
35. विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन (CRPD) क्या है?
(Convention on the Rights of Persons with Disabilities)
Convention on the Rights of Persons with Disabilities (CRPD) को 2006 में अंगीकृत किया गया और 2008 में लागू किया गया। इसका उद्देश्य विकलांग व्यक्तियों को पूर्ण मानवाधिकार और गरिमा के साथ जीवन जीने का अवसर प्रदान करना है।
CRPD की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह विकलांगता को चिकित्सीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक बाधाओं का परिणाम मानता है। यह “दया-आधारित दृष्टिकोण” के स्थान पर अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को अपनाता है।
CRPD समानता, गैर-भेदभाव, सुलभता, स्वतंत्र जीवन, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी जैसे अधिकारों को सुनिश्चित करता है। यह राज्यों पर यह दायित्व डालता है कि वे भौतिक, सामाजिक और कानूनी बाधाओं को हटाएँ।
CRPD का महत्व इस बात में है कि यह विकलांग व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसके अंतर्गत CRPD समिति निगरानी का कार्य करती है।
निष्कर्ष:
CRPD विकलांग व्यक्तियों को संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि समान अधिकार-धारी नागरिक के रूप में स्थापित करता है और मानवाधिकार कानून को अधिक समावेशी बनाता है।