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“उल्टा प्रमाण-भार और लंबित मुक़दमे: व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शीघ्र न्याय और संवैधानिक संतुलन” — Central Bureau of Investigation बनाम Dayamoy Mahato आदि, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप

“उल्टा प्रमाण-भार और लंबित मुक़दमे: व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शीघ्र न्याय और संवैधानिक संतुलन” — Central Bureau of Investigation बनाम Dayamoy Mahato आदि, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप

भूमिका

       भारतीय दंड प्रक्रिया में न्याय का मूल सिद्धांत यह रहा है कि अभियोजन को अपराध सिद्ध करना होता है और अभियुक्त को निर्दोष मानने की धारणा (presumption of innocence) प्राप्त रहती है। किंतु कुछ विशेष विधानों—विशेषकर Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA)—में यह संतुलन बदला हुआ है, जहाँ प्रमाण-भार (burden of proof) आंशिक या पूर्ण रूप से अभियुक्त पर स्थानांतरित हो जाता है। ऐसे क़ानूनों के अंतर्गत लंबित मुक़दमों की संख्या, वर्षों तक चलती सुनवाई, और जमानत की कठिन शर्तें—इन सबने व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

      इन्हीं संवैधानिक चिंताओं की पृष्ठभूमि में Central Bureau of Investigation बनाम Dayamoy Mahato आदि में Supreme Court of India ने सभी उच्च न्यायालयों को उल्टा प्रमाण-भार वाले क़ानूनों (जैसे UAPA) के तहत लंबित ट्रायल्स की स्थिति की समग्र समीक्षा करने के महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। यह निर्णय केवल एक मामले तक सीमित नहीं, बल्कि न्यायिक प्रशासन, मौलिक अधिकारों और आपराधिक न्याय के ढाँचे को प्रभावित करने वाला मील का पत्थर है।


1. मामले की पृष्ठभूमि

       यह मामला ऐसे समय आया जब देशभर में UAPA और समान विशेष विधानों के अंतर्गत दर्ज मामलों में लंबे समय तक विचाराधीन कैद एक आम वास्तविकता बन चुकी थी। अभियुक्तों की शिकायत यह थी कि

  • चार्ज-शीट के बाद भी ट्रायल शुरू होने में वर्षों लग जाते हैं,
  • गवाहों की पेशी अनिश्चित रहती है,
  • जमानत के लिए कठोर वैधानिक मानक लागू होते हैं, और
  • अंततः “ट्रायल से पहले ही सज़ा” जैसा प्रभाव पैदा होता है।

इन परिस्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रणालीगत (systemic) समस्या के रूप में हस्तक्षेप करना आवश्यक समझा।


2. उल्टा प्रमाण-भार: अवधारणा और संवैधानिक तनाव

       उल्टा प्रमाण-भार का अर्थ है कि कुछ तथ्यों के सिद्ध होने पर अभियुक्त को स्वयं अपनी निरपराधता दिखानी पड़ती है। UAPA जैसे क़ानूनों में यह व्यवस्था राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क से जोड़ी जाती है।
परंतु प्रश्न यह है कि—

  • क्या यह व्यवस्था अनुच्छेद 21 के “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” के मानक पर खरी उतरती है?
  • क्या लंबित ट्रायल के दौरान यह व्यवस्था न्यायसंगत, उचित और युक्तिसंगत (just, fair and reasonable) बनी रहती है?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशेष क़ानून भी संविधान के अधीन हैं और लंबितता यदि असंगत हो जाए तो वह मौलिक अधिकारों का हनन बन सकती है।


3. सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश

न्यायालय ने सभी उच्च न्यायालयों को निम्नलिखित व्यापक दिशानिर्देश दिए:

(i) लंबित मामलों की पहचान

उच्च न्यायालय अपने-अपने क्षेत्राधिकार में UAPA एवं समान उल्टा प्रमाण-भार वाले क़ानूनों के अंतर्गत लंबित ट्रायल्स की सूची तैयार करें—विशेषकर वे मामले जहाँ

  • अभियुक्त लंबे समय से न्यायिक हिरासत में हैं,
  • ट्रायल की प्रगति नगण्य है, या
  • चार्ज-शीट के बावजूद साक्ष्य रिकॉर्डिंग आरंभ नहीं हुई।

(ii) ट्रायल की प्रगति की समयबद्ध समीक्षा

उच्च न्यायालय नियमित अंतराल पर यह समीक्षा करें कि

  • गवाहों की संख्या कितनी है,
  • कितने गवाहों का परीक्षण हो चुका है,
  • विलंब के कारण क्या हैं (अभियोजन/रक्षा/न्यायालयीय प्रशासन), और
  • क्या विलंब टालने योग्य है।

(iii) जमानत पर विचार का संवैधानिक दृष्टिकोण

यदि ट्रायल में अनुचित विलंब है, तो उच्च न्यायालय/निचली अदालतें जमानत पर विचार करते समय केवल वैधानिक कठोरता तक सीमित न रहें, बल्कि

  • अनुच्छेद 21,
  • न्याय का हित, और
  • विचाराधीन कैद की अवधि
    को समुचित महत्व दें।

(iv) विशेष न्यायालयों की सक्रिय भूमिका

जहाँ UAPA के लिए विशेष न्यायालय गठित हैं, वहाँ

  • दिन-प्रतिदिन सुनवाई (जहाँ संभव हो),
  • गवाह प्रबंधन, और
  • डिजिटल/वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग जैसे साधनों के उपयोग
    पर ज़ोर दिया जाए।

4. जमानत बनाम ट्रायल: न्यायालय का संतुलन

सुप्रीम कोर्ट ने यह दोहराया कि जमानत नियम है, जेल अपवाद—भले ही UAPA में वैधानिक कसौटियाँ कड़ी हों।
न्यायालय ने संकेत दिया कि

  • यदि अभियोजन ट्रायल को आगे बढ़ाने में विफल है,
  • और अभियुक्त ने लंबा समय हिरासत में बिताया है,
    तो जमानत से इनकार स्वतःसिद्ध नहीं हो सकता।

यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन स्थापित करता है।


5. उच्च न्यायालयों के लिए प्रशासनिक संदेश

यह निर्णय केवल न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि न्यायिक प्रशासन के लिए भी स्पष्ट संदेश है कि

  • लंबितता अब “सामान्य” नहीं मानी जाएगी,
  • केस मैनेजमेंट न्यायाधीशों की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है, और
  • विशेष क़ानूनों के मामलों में संवेदनशीलता + तत्परता अनिवार्य है।

6. अभियोजन एजेंसियों की जवाबदेही

न्यायालय ने अप्रत्यक्ष रूप से जांच एजेंसियों को भी संकेत दिया कि

  • चार्ज-शीट दाख़िल करना ही पर्याप्त नहीं,
  • गवाहों की समय पर पेशी,
  • साक्ष्य का समुचित संकलन, और
  • अनावश्यक स्थगन से परहेज़
    उनकी संवैधानिक ज़िम्मेदारी है।

7. मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानक—जैसे ICCPR—भी शीघ्र और निष्पक्ष ट्रायल पर ज़ोर देते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय व्यवस्था को वैश्विक मानकों के अधिक निकट लाता है, यह स्पष्ट करते हुए कि

“राष्ट्रीय सुरक्षा का उद्देश्य भी मानव गरिमा की कीमत पर नहीं साधा जा सकता।”


8. आलोचनात्मक विश्लेषण

हालाँकि निर्णय सराहनीय है, पर कुछ चुनौतियाँ शेष हैं:

  • उच्च न्यायालयों पर कार्यभार पहले से ही अधिक है,
  • विशेष न्यायालयों की संख्या और संसाधन सीमित हैं,
  • अभियोजन-रक्षा दोनों के स्तर पर स्थगन संस्कृति मौजूद है।

इन चुनौतियों के समाधान के बिना निर्देशों का पूर्ण अनुपालन कठिन हो सकता है। फिर भी, यह निर्णय दिशा-निर्देशक (path-breaking) है।


9. भविष्य पर प्रभाव

इस निर्णय के बाद अपेक्षा है कि

  • लंबे समय से बंदी अभियुक्तों के मामलों में सक्रिय समीक्षा होगी,
  • जमानत jurisprudence अधिक मानवीय बनेगा,
  • और विशेष क़ानूनों के अंतर्गत ट्रायल-डिलेज पर वास्तविक अंकुश लगेगा।

निष्कर्ष

Central Bureau of Investigation बनाम Dayamoy Mahato आदि में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि उल्टा प्रमाण-भार जैसे अपवादात्मक प्रावधान भी संवैधानिक निगरानी से परे नहीं हैं।
यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शीघ्र न्याय, और राष्ट्रीय सुरक्षा—तीनों के बीच संतुलित सेतु निर्मित करता है।

अंततः, न्यायालय का संदेश सीधा है:

“कठोर क़ानून भी तभी वैध हैं, जब उनका अनुप्रयोग न्यायपूर्ण, समयबद्ध और मानव गरिमा के अनुरूप हो।”