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आयकर कानून: दीर्घकालिक वित्त से सीधे अर्जित आय पर ही मिलेगी कटौती — सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट्यूटरी कॉरपोरेशन्स के दावे पर लगाई रोक

आयकर कानून: दीर्घकालिक वित्त से सीधे अर्जित आय पर ही मिलेगी कटौती — सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट्यूटरी कॉरपोरेशन्स के दावे पर लगाई रोक


Income Tax : Statutory Corporation Can Claim Deduction Under Section 36(1)(viii) Only For Income Directly Derived From Long-Term Finance – Supreme Court का महत्वपूर्ण निर्णय

भूमिका

         आयकर अधिनियम, 1961 के अंतर्गत कटौतियों (Deductions) से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या समय-समय पर न्यायालयों द्वारा की जाती है। इन्हीं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है Section 36(1)(viii), जिसके अंतर्गत वित्तीय संस्थान, हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां और कुछ विशेष श्रेणी के “स्टेट्यूटरी कॉरपोरेशन” (Statutory Corporations) अपनी आय का एक हिस्सा ‘स्पेशल रिज़र्व’ में स्थानांतरित करने पर कर-कटौती (deduction) का दावा कर सकते हैं।

          हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि स्टेट्यूटरी कॉरपोरेशन केवल वही आय Section 36(1)(viii) के तहत कटौती के लिए दावा कर सकता है जो “सीधे-सीधे दीर्घकालिक वित्त (Long-term finance) से उत्पन्न हो”। यदि आय किसी अन्य स्रोत से आती है तो उस पर इस प्रावधान के तहत कटौती उपलब्ध नहीं होगी।

         यह निर्णय न केवल सरकारी एवं वैधानिक निगमों के लिए मार्गदर्शक है बल्कि टैक्स अधिकारियों और कर-प्रैक्टिशनर्स के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस लेख में हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विस्तृत विश्लेषण, कानूनी पहलुओं की व्याख्या, कोर्ट के तर्क, और निर्णय के व्यापक प्रभावों का उल्लेख करेंगे।


Section 36(1)(viii) का कानूनी ढांचा

        Section 36 के तहत व्यापार या पेशे से संबंधित विभिन्न प्रकार की कटौतियों की अनुमति दी जाती है।
Section 36(1)(viii) के अंतर्गत—

  • कुछ विशेष वित्तीय संस्थान,
  • हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां,
  • इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनियां,
  • और स्टेट्यूटरी कॉरपोरेशन,

       अपनी“eligible business” से अर्जित आय का एक निश्चित प्रतिशत ‘Special Reserve’ में डालकर कर कटौती की मांग कर सकते हैं।

     इसका उद्देश्य दीर्घकालिक वित्त (long-term finance) को प्रोत्साहन देना है, ताकि देश में बुनियादी ढांचे, औद्योगिक विकास और आवासीय परियोजनाओं के लिए पूंजी उपलब्ध हो सके।

लेकिन वर्षों से प्रश्न यह था कि—

क्या इस कटौती को केवल उस आय तक सीमित किया जाए जो सीधे-सीधे दीर्घकालिक ऋण (long-term finance) से उत्पन्न होती है?

या फिर निगम की संपूर्ण व्यवसायिक आय से भी कटौती उपलब्ध हो सकती है?

इसी विवाद को सुप्रीम कोर्ट ने निर्णायक रूप से सुलझाया।


विवाद की पृष्ठभूमि

एक स्टेट्यूटरी कॉरपोरेशन (नाम गोपनीय) ने दावा किया कि—

  • उसका एक बड़ा हिस्सा व्यापार ‘long-term finance’ से संबंधित है।
  • लेकिन संस्था द्वारा अर्जित अन्य आय जैसे—
    • ब्याज आय,
    • निवेश पर रिटर्न,
    • विभिन्न शुल्क and miscellaneous income,
      इन्हें भी वह ‘eligible income’ मानकर Section 36(1)(viii) के अंतर्गत कटौती का दावा कर रहा था।

आयकर विभाग ने इसे चुनौती दी और कहा:

केवल वह आय eligible income मानी जाएगी जो long-term finance activities से सीधे-सीधे उत्पन्न हो।

ट्रिब्यूनल और उच्च न्यायालय में दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें देते रहे, और मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।


सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत मुख्य प्रश्न

         सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में मूलतः दो प्रश्न निर्धारित किए—

  1. क्या स्टेट्यूटरी कॉरपोरेशन Section 36(1)(viii) के अंतर्गत केवल उसी आय पर कटौती ले सकता है जो “directly attributable” हो?
  2. क्या अन्य स्रोतों से प्राप्त आय (miscellaneous income) को भी eligible business income माना जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

“Section 36(1)(viii) का लाभ केवल उसी आय पर मिलेगा जो ‘सीधे तौर पर दीर्घकालिक वित्त’ से प्राप्त हुई हो। Non-core income या incidental income को eligible income नहीं माना जा सकता।”

कोर्ट के अनुसार:

  • यह प्रावधान incentive provision है, जिसका उद्देश्य long-term finance को बढ़ावा देना है।
  • इसलिए इसका strict interpretation ही किया जाना चाहिए।
  • कर-दाताओं को केवल उन्हीं गतिविधियों पर लाभ मिलना चाहिए जो कानून के उद्देश्य को पूरा करें।

कोर्ट ने यह भी कहा:

“यदि corporation वह आय दिखा रहा है जो long-term finance से संबंधित नहीं है, तो उसे Section 36(1)(viii) के तहत कटौती नहीं दी जा सकती, भले ही उसका मुख्य व्यवसाय long-term finance ही क्यों न हो।”


फैसले में महत्वपूर्ण सिद्धांत (Key Legal Principles)

1. Strict Interpretation of Tax Incentive Statutes

अदालत ने कहा कि:

  • Tax incentive provisions का दुरुपयोग रोकने के लिए इनकी भाषा को सख्त रूप से व्याख्यायित किया जाना चाहिए।
  • इन्हें व्यापक रूप से नहीं पढ़ा जा सकता।

2. “Derived From” बनाम “Attributable To”

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि:

  • यदि कानून में “derived from” शब्द का उपयोग किया गया है, तो इसका मतलब है कि आय का सीधा संबंध होना आवश्यक है।
  • “Attributable to” की तुलना में यह संकुचित शब्द है और व्यापक व्याख्या नहीं की जा सकती।

Section 36(1)(viii) में “derived from” शब्द का उपयोग हुआ है, इसलिए केवल उसी आय को शामिल किया जा सकता है जिसका प्रत्यक्ष और प्राथमिक स्रोत दीर्घकालिक वित्त हो।

3. Special Reserve केवल eligible income पर आधारित होना चाहिए

कंपनी ‘स्पेशल रिजर्व’ में जितनी राशि ट्रांसफर करती है, वह eligible income के अनुरूप होनी चाहिए।

4. Statutory Corporation भी इस नियम से बाहर नहीं

कोर्ट ने कहा कि:

“Statutory Corporations भी इस प्रावधान की भाषा के अधीन हैं। उन्हें किसी विशेष छूट या अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता।”


कोर्ट द्वारा देखे गए उदाहरण

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ आय के उदाहरण दिए जो Section 36(1)(viii) में शामिल नहीं की जा सकती—

  • FD पर ब्याज
  • सरकारी बॉन्ड से आय
  • किराया आय
  • विविध शुल्क (miscellaneous charges)
  • दंड शुल्क (penalty charges)
  • निवेश पर डिविडेंड

भले ही यह सारी आय संस्था की कुल आय का हिस्सा हो, लेकिन Section 36(1)(viii) का लाभ केवल long-term finance से उत्पन्न आय पर ही मिलेगा।


निर्णय का व्यापक प्रभाव (Wider Impact of the Judgment)

1. वित्तीय संस्थानों पर प्रभाव

इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनियों, हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों और सरकारी निगमों को—

  • आय के प्रत्येक स्रोत का अलग-अलग हिसाब रखना होगा।
  • ‘eligible income’ की स्पष्ट पहचान करनी होगी।
  • अपने annual reports और tax audit report में इसे अलग-से दर्शाना होगा।

2. Tax Compliance में सख्ती

अब टैक्स अधिकारी यह जांच अधिक कठोरता से करेंगे कि:

  • कौन-सी आय long-term finance से उत्पन्न हुई?
  • कंपनी वास्तव में किन head से revenue कमा रही है?
  • Special reserve की गणना सही है या नहीं?

3. कंपनियों की कर योजना (Tax Planning) पर प्रभाव

कई निगम अब अपनी आय संरचना को पुनः व्यवस्थित करेंगे ताकि—

  • eligible business का अनुपात बढ़ाया जा सके
  • और अधिक स्पेशल रिज़र्व बनाया जा सके
  • कानूनी विवादों से बचा जा सके

4. भविष्य में कई पेंडिंग मामलों पर भी प्रभाव

यह निर्णय देशभर में लंबित अपीलों और writ petitions पर सीधे लागू होगा।


आयकर विभाग की स्थिति मजबूत हुई

यह निर्णय कर विभाग के दृष्टिकोण को समर्थन देता है।
अब अधिकारी किसी भी संस्थान से यह प्रश्न पूछ सकते हैं:

  • आय का सीधा स्रोत क्या है?
  • क्या यह आय long-term finance से जुड़ी है?
  • यदि नहीं, तो कटौती अस्वीकृत होगी।

कानूनी क्षेत्र में यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण?

1. शब्दों की व्याख्या पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन

“derived from” व “direct income” जैसे शब्दों की व्याख्या भविष्य के टैक्स विवादों में मार्गदर्शन देगी।

2. Corporations की जवाबदेही बढ़ी

उन्हें अब आय संरचना पारदर्शी रखनी होगी।

3. Revenue Loss को रोकने की दिशा में बड़ा कदम

गलत तरीके से deduction का दावा करने वाली संस्थाओं की संख्या कम होगी।


क्या बदलना पड़ेगा Statutory Corporations को?

अब उन्हें:

  • अपनी accounting policy बदलनी होगी,
  • income segmentation को स्पष्ट करना होगा,
  • eligible व non-eligible income का अलग वर्गीकरण करना होगा,
  • reserve बनाने की प्रक्रिया पारदर्शी करनी होगी।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक ऐतिहासिक और स्पष्ट करने वाला फैसला है।
अदालत ने यह सुनिश्चित किया है कि:

Section 36(1)(viii) का लाभ केवल उन्हीं संस्थानों को दिया जाए जो सचमुच दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने में सक्रिय हैं और जिनकी आय इसी मुख्य गतिविधि से उत्पन्न होती है।

इस निर्णय से—

  • कर कानूनों में स्पष्टता बढ़ेगी,
  • tax compliance में सुधार होगा,
  • और statutory corporations में वित्तीय अनुशासन भी मजबूत होगा।