IndianLawNotes.com

नाबालिग की संपत्ति की बिक्री : सुप्रीम कोर्ट ने कहा—नाबालिग के लिए बिक्री का खंडन करने हेतु वाद दायर करना आवश्यक नहीं, वयस्क होने पर वह सीधे संपत्ति बेच सकता है

नाबालिग की संपत्ति की बिक्री : सुप्रीम कोर्ट ने कहा—नाबालिग के लिए बिक्री का खंडन करने हेतु वाद दायर करना आवश्यक नहीं, वयस्क होने पर वह सीधे संपत्ति बेच सकता है

भूमिका

       भारतीय विधि में नाबालिगों (Minors) के अधिकारों और उनकी संपत्ति की सुरक्षा को अत्यंत महत्व दिया गया है। परंपरागत रूप से यह माना जाता रहा है कि नाबालिग अपनी संपत्ति की वैध बिक्री नहीं कर सकता और न ही उसकी ओर से की गई किसी भी बिक्री को मान्यता दी जा सकती है। इस संदर्भ में अभिभावक द्वारा की गई बिक्री की वैधता, नाबालिग द्वारा वयस्क होने पर उस बिक्री का प्रतिषेध (Repudiation), और उसके बाद संपत्ति पर अधिकार की पुनर्स्थापना जैसे प्रश्न लंबे समय से न्यायालयों के सामने आते रहे हैं।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि नाबालिग के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह वयस्क होने के बाद अपने अभिभावक द्वारा की गई बिक्री का ‘प्रतिषेध’ करने हेतु कोई डिक्लेरेशन (Declaration Suit) दायर करे।
अदालत ने कहा कि—
यदि वह वयस्क होने पर अपनी संपत्ति पर अधिकार पुनः स्थापित करना चाहता है और उसे बेचना चाहता है, तो वह सीधे ऐसा कर सकता है। इसके लिए न्यायालय का हस्तक्षेप अनिवार्य नहीं है।

        यह निर्णय नाबालिगों के संपत्ति अधिकारों के दायरे को विस्तृत करता है और उनके हितों की सुरक्षा के लिए एक बहुत ही उदार और प्रगतिशील दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।


मामले का पृष्ठभूमि

         मामला तब उठा जब एक व्यक्ति ने यह दावा किया कि उसके अभिभावक ने जब वह नाबालिग था, उसकी संपत्ति को बेच दिया था। वयस्क होने के बाद उसने अपने हिस्से की भूमि किसी तीसरे व्यक्ति को बेच दी।
पहले खरीदार ने इस लेन-देन को चुनौती दी और कहा कि:

  1. नाबालिग को वयस्क होने के बाद “पहले” यह घोषणा करनी चाहिए थी कि अभिभावक द्वारा की गई बिक्री वह अस्वीकार (Repudiate) करता है।
  2. ऐसा किए बिना उसकी की गई बिक्री मान्य नहीं है।
  3. इसलिए बाद में की गई बिक्री शून्य (Void) है।

मामला कई न्यायालयों से होकर अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा।


सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि—

1. नाबालिग के लिए वयस्क होने के बाद ‘Repudiation Suit’ दायर करना अनिवार्य नहीं है

कोर्ट ने कहा कि नाबालिग के पास यह विकल्प है कि:

  • वह अभिभावक द्वारा की गई बिक्री को स्वीकार करे, या
  • वयस्क होने पर उसे अस्वीकार कर अपनी संपत्ति पर अधिकार स्थापित करे।

लेकिन इसके लिए ‘वाद दायर करना’ (Suit for declaration) अनिवार्य नहीं है।

अदालत ने कहा:

“नाबालिग अपनी संपत्ति का स्वामित्व पुनः प्राप्त करने के लिए वयस्क होने पर सीधे बिक्री कर सकता है, क्योंकि अभिभावक द्वारा की गई बिक्री नाबालिग के लिए स्वयं ही ‘Voidable’ होती है।”

अर्थात्, नाबालिग को केवल यह दिखाना होता है कि वह अभिभावक की बिक्री को स्वीकार नहीं करता।


2. अभिभावक द्वारा की गई बिक्री ‘Voidable’ है, ‘Void’ नहीं – इसलिए नाबालिग की मर्जी सर्वोपरि

सुप्रीम कोर्ट ने पुनः स्पष्ट किया कि:

  • नाबालिग की ओर से अभिभावक द्वारा की गई संपत्ति की बिक्री अमान्य (Void) नहीं बल्कि रद्द करने योग्य (Voidable) है।
  • इसका अर्थ है कि नाबालिग चाहे तो उस बिक्री को स्वीकार कर सकता है, चाहे तो अस्वीकार कर सकता है।

इसके लिए कोई अनुष्ठानिक प्रक्रिया (Formal procedure) आवश्यक नहीं है।


3. वयस्क होने पर नाबालिग के पास पूर्ण स्वामित्व अधिकार पुनर्जीवित हो जाते हैं

जब नाबालिग वयस्क होता है, तो:

  • उसकी संपत्ति पर स्वामित्व पुनः बहाल हो जाता है।
  • और यदि वह संपत्ति किसी गैर-कानूनी बिक्री का परिणाम है, तो वह उसका खंडन कर सकता है।
  • यह खंडन मुकदमा दायर करके ही हो, यह कानून नहीं कहता है।

अदालत ने कहा कि व्यावहारिक जीवन में यह असंभव है कि हर नाबालिग को अपने अधिकारों के लिए न्यायालय जाना पड़े।


4. नाबालिग द्वारा की गई बाद की बिक्री ही Repudiation का प्रमाण है

कोर्ट ने बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“यदि वयस्क होने पर नाबालिग स्वयं उस संपत्ति को किसी अन्य व्यक्ति को बेच देता है, तो यह स्वयं में ही पूर्व बिक्री के Repudiation (अस्वीकार) का प्रमाण है।”

इसका अर्थ यह हुआ:

  • नाबालिग के लिए मुकदमा दायर करने की आवश्यकता नहीं।
  • नया विक्रय-विधान (Sale Deed) ही यह प्रदर्शित करेगा कि उसने पूर्व बिक्री को मान्यता नहीं दी।

5. न्यायालय का हस्तक्षेप तब ही आवश्यक है जब विवाद हो

अगर:

  • पहला खरीदार विरोध करे
  • या सम्पत्ति के शीर्षक पर विवाद हो

तब वाद दायर किया जा सकता है।
लेकिन यह कानूनी अनिवार्यता नहीं है।
यह केवल आवश्यकता पड़ने पर एक उपाय (Remedy) है।


कानूनी विश्लेषण

नाबालिग के अधिकारों की प्रकृति

भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act, 1872) के अंतर्गत नाबालिग द्वारा किया गया अनुबंध:

  • अमान्य (Void-ab-initio) होता है।

लेकिन अभिभावक द्वारा की गई बिक्री:

  • रद्द करने योग्य (Voidable) होती है, बशर्ते वह नाबालिग के हित में न हो।

Guardians and Wards Act, 1890 के अनुसार:

  • अभिभावक संपत्ति तभी बेच सकता है जब:
    • यह नाबालिग के हित में हो
    • और सामान्यतः न्यायालय की अनुमति हो

यदि ऐसा नहीं है, तो नाबालिग वयस्क होने पर बिक्री को अस्वीकार कर सकता है।


सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के प्रमुख आधार

(A) सिद्धांत : ‘Voidable at the option of the minor’

नाबालिग के लिए यह पूरी तरह उसका निजी (personal) निर्णय है कि वह बिक्री स्वीकार करेगा या नहीं।

(B) सिद्धांत : ‘No one can be compelled to litigate’

कानून किसी व्यक्ति को मुकदमा दायर करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

(C) सिद्धांत : ‘Right to property is a constitutional right’

अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति का अधिकार संरक्षित है।
नाबालिग वयस्क होने के बाद उसका पूर्ण स्वामी है।

(D) Practical Considerations

भारत में:

  • विशाल जनसंख्या
  • कानूनी जागरूकता की कमी
  • अदालती देरी

ऐसे में यह अपेक्षा रखना कि हर नाबालिग मुकदमा दायर करे, अव्यावहारिक है।


निर्णय का प्रभाव

1. नाबालिगों के अधिकार मजबूत हुए

वे अब सीधे अपनी संपत्ति का प्रबंधन कर सकते हैं।

2. अभिभावक द्वारा की गई गलत बिक्री स्वतः निरस्त नहीं होगी, लेकिन वयस्क होने पर नाबालिग उसे अस्वीकार कर सकता है

3. खरीदारों के लिए सावधानी बढ़ी

अभिभावक से संपत्ति खरीदने से पहले:

  • न्यायालय की अनुमति देखना
  • अभिभावक की पात्रता
  • नाबालिग के हित का मूल्यांकन

अत्यंत आवश्यक होगा।

4. मुकदमेबाजी में कमी

नाबालिगों के लिए अनावश्यक मुकदमे घटेंगे।

5. संपत्ति कानून की व्याख्या स्पष्ट हुई

प्राकृतिक न्याय, अल्पवयस्क संरक्षण और संपत्ति अधिकारों का संतुलन स्थापित हुआ।


उदाहरण

मान लीजिए—

  • ‘A’ नाबालिग था।
  • उसके पिता/चाचा ने उसकी जमीन ‘X’ को बेच दी।
  • A वयस्क हुआ और अपनी जमीन ‘Y’ को बेचता है और कहता है कि जमीन अब उसकी है।

पहला खरीदार यह नहीं कह सकता कि:

  • “तुमने पहले बिक्री को खंडित नहीं किया”
  • “कोई मुकदमा नहीं किया”

A की नई बिक्री ही यह दिखाने को पर्याप्त है कि उसने पहली बिक्री को अस्वीकार किया।


निष्कर्ष

        सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय संपत्ति कानून और नाबालिगों की सुरक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम है। इससे यह स्थापित होता है कि:

  • नाबालिग की संपत्ति की बिक्री ‘Voidable’ है।
  • वयस्क होने पर नाबालिग को कोई वाद दायर करने की अनिवार्यता नहीं।
  • वह सीधे अपनी संपत्ति का विक्रय कर सकता है।
  • अदालत का हस्तक्षेप परिस्थितिजन्य है, अनिवार्य नहीं।
  • नए विक्रय-पत्र द्वारा पूर्व बिक्री का Repudiation स्वतः सिद्ध हो जाता है।

       यह निर्णय न केवल नाबालिगों के अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि संपत्ति कानून की कई पुरानी भ्रांतियों को भी समाप्त करता है।