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कीटनाशकों के नमूनों की पुनःजांच में 131 दिनों की देरी: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने समन आदेश किया रद्द

कीटनाशकों के नमूनों की पुनःजांच में 131 दिनों की देरी: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने समन आदेश किया रद्द — न्यायिक प्रक्रिया में समयबद्धता और वैज्ञानिक विश्वसनीयता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी


भूमिका

      कीटनाशक अधिनियम, 1968 किसानों, उपभोक्ताओं और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए यह सुनिश्चित करता है कि बाज़ार में वही कीटनाशक उपलब्ध हों जो परीक्षण में गुणवत्तापूर्ण पाए जाएँ। कानून के तहत नमूनों की जाँच—प्राथमिक परीक्षण एवं पुनः परीक्षण—वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप और समयबद्ध रूप से किया जाना आवश्यक है। यदि नमूना परीक्षण में कोई त्रुटि होती है या पुनः जांच में अनावश्यक विलंब होता है, तो यह अभियोजन की वैधता पर गंभीर संदेह उत्पन्न कर देता है।

        इसी संदर्भ में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया, जिसमें दूसरे नमूने (second sample) की पुनःजांच 131 दिनों की देरी से करने को गंभीर प्रक्रिया-गत त्रुटि मानते हुए पूरे अभियोजन को ही अवैध ठहराया और मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश को रद्द (quash) कर दिया। यह निर्णय न केवल कानून के तकनीकी अनुपालन पर प्रकाश डालता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि देरी न्याय और वैज्ञानिक विश्वसनीयता—दोनों को प्रभावित करती है।


मामले की पृष्ठभूमि

        इस मामले में कृषि विभाग के निरीक्षक ने एक विक्रेता/निर्माता के पास से कीटनाशक का नमूना लिया था। नमूना लेने के बाद उसे प्रयोगशाला में भेजा गया, जहां प्राथमिक परीक्षण (analysis) किया गया। परिणाम असंतोषजनक आए, जिसके बाद विधि अनुसार दूसरे नमूने को सेंट्रल लेबोरेटरी में पुनः परीक्षण हेतु भेजा गया।

लेकिन यहाँ मुख्य समस्या उत्पन्न हुई—

दूसरे नमूने (re-test sample) का परीक्षण 131 दिनों की देरी से किया गया।

  • सामान्यतः कीटनाशक नमूनों की shelf life सीमित होती है।
  • अधिनियम और नियमों के अनुसार, दोबारा परीक्षण यथाशीघ्र करना अनिवार्य है।
  • यदि नमूने के परीक्षण में देरी होती है, तो रासायनिक सामग्री (chemical composition) में स्वतः परिवर्तन हो सकता है।
  • परिणामस्वरूप परीक्षण का पूरा आधार ही अविश्वसनीय हो जाता है।

इस देरी के आधार पर अभियुक्त विक्रेता/निर्माता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर समन आदेश को चुनौती दी।


कानूनी प्रश्न (Legal Issues)

इस मामले में मुख्यतः निम्नलिखित कानूनी प्रश्न उठे:

1. क्या दूसरे नमूने की जांच में 131 दिन की देरी अभियोजन की वैधता को प्रभावित करती है?

कीटनाशक अधिनियम और संबंधित नियमों के अनुसार नमूना परीक्षण में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि:

  • नमूने की रासायनिक गुणवत्ता समय के साथ घटती-बढ़ती है।
  • देरी से आने वाले परिणाम वैज्ञानिक रूप से सटीक नहीं माने जा सकते।
  • Supreme Court ने भी कई मामलों में कहा है कि perishable samples की जांच में देरी अभियोजन को कमजोर कर देती है।

2. क्या मजिस्ट्रेट द्वारा बिना वैज्ञानिक आधार और प्रक्रिया को ध्यान में रखे समन जारी किया जा सकता है?

हाई कोर्ट ने माना कि:

  • मजिस्ट्रेट का दायित्व है कि वह अभियोजन की फाइल का ध्यानपूर्वक परीक्षण करे।
  • यदि रिकॉर्ड स्वयं ही यह दिखाता है कि नमूना अपनी वैध अवधि (shelf life) के बाद जांचा गया है, तो अभियोजन का आधार ही समाप्त हो जाता है।
  • ऐसे में ‘समन जारी करना’ न्यायिक मन का उचित उपयोग नहीं माना जा सकता।

3. क्या 131 दिनों की देरी कानून के उद्देश्य को विफल करती है?

हाई कोर्ट ने माना कि हाँ, क्योंकि:

  • पुनः जांच का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पहली रिपोर्ट की पुष्टि सही ढंग से हो सके।
  • यदि नमूना ‘एक्सपायर’ अवधी, खराब हालत या रासायनिक अस्थिरता की स्थिति में जाँच हुआ है, तो परिणाम विश्वसनीय नहीं हो सकते।
  • इससे अभियुक्त के अधिकार प्रभावित होते हैं, खासकर प्राकृतिक न्याय (natural justice) के सिद्धांत के तहत।

हाई कोर्ट का विश्लेषण

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मामले का विश्लेषण करते हुए महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत किए:

1. वैज्ञानिक अखंडता (Scientific Integrity) अनिवार्य है

कीटनाशकों में सक्रिय तत्व (active ingredients) होते हैं जो समय के साथ:

  • हवा
  • तापमान
  • प्रकाश
  • आर्द्रता

के प्रभाव से बदल सकते हैं। नियम 29 और संबंधित प्रावधानों के अनुसार जांच में वैज्ञानिक शुचिता (scientific purity) बनाए रखना आवश्यक है। देरी इसका उल्लंघन है।

2. नमूना का shelf life समाप्त होने से परीक्षण अवैध

कानून में यह स्पष्ट है कि:

  • नमूने की जांच उसकी वैध अवधि में ही होनी चाहिए।
  • देरी से आने वाली रिपोर्ट प्रक्रिया-सम्मत नहीं मानी जाती।
  • Supreme Court ने कई बार कहा है कि “expired sample cannot form basis of prosecution”.

हाई कोर्ट ने इस सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि:

131 दिनों की देरी नमूने की वैज्ञानिक विश्वसनीयता को पूर्णतः नष्ट कर देती है।

3. मजिस्ट्रेट ने कानूनी रूप से आवश्यक संतुष्टि नहीं ली

समन जारी करना एक गंभीर न्यायिक प्रक्रिया है:

  • इसे सिर्फ औपचारिकता नहीं माना जा सकता।
  • मजिस्ट्रेट को रिकॉर्ड देखकर यह prima facie संतुष्टि होनी चाहिए कि अभियोजन उचित है।

लेकिन यहाँ:

  • रिकॉर्ड में देरी स्पष्ट थी
  • कोई वैज्ञानिक स्पष्टीकरण नहीं
  • shelf life का मुद्दा अनदेखा
  • पुनः परीक्षण नियमों का उल्लंघन

इसलिए कोर्ट ने माना कि समन आदेश गलत और अवैध था।

4. आरोपी को निष्पक्ष मुकदमे (fair trial) का अधिकार

131 दिनों की देरी:

  • आरोपी के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करती है
  • वैज्ञानिक सबूतों को अविश्वसनीय बनाती है
  • विधि के अनुसार उचित प्रक्रिया (due process) का हनन करती है

इस आधार पर अभियोजन स्वयं ही बिगड़ जाता है।


हाई कोर्ट का निर्णय (Judgment)

कोर्ट ने निम्नलिखित आदेश दिए:

  1. 131 दिनों की देरी से की गई पुनः जांच अवैध मानी।
  2. वैज्ञानिक विश्वसनीयता समाप्त होने के कारण अभियोजन का पूरा आधार विफल।
  3. मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश quash किया गया।
  4. अभियुक्त को दी गई राहत के साथ मामले को पूर्णतः समाप्त किया गया।

निर्णय का महत्व

यह फैसला कई कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:


1. समयबद्धता (Timeliness) न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य तत्व

कीटनाशकों जैसे नाशवान रासायनिक पदार्थों की जांच में देरी:

  • अभियोजन को अवैध बनाती है
  • अभियुक्त के अधिकारों का हनन करती है
  • वैज्ञानिक परिणामों को अविश्वसनीय बनाती है

यह निर्णय राज्य और प्रयोगशालाओं को चेतावनी देता है कि:

“Delay in re-testing is fatal to prosecution.”


2. कृषि एवं व्यापारी समुदाय के लिए राहत

कई बार निरीक्षकों द्वारा:

  • नमूना गलत तरीके से लिया जाता है
  • रिपोर्ट समय पर नहीं आती
  • पुनः परीक्षण समय से नहीं भेजा जाता

ऐसी स्थितियों में व्यापारी/निर्माता अनावश्यक मुकदमेबाज़ी में फंस जाते हैं। यह फैसला स्पष्ट करता है कि:

बिना वैज्ञानिक प्रक्रिया के कोई भी अभियोजन मान्य नहीं होगा।


3. मजिस्ट्रेट के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश

कोर्ट ने दोहराया कि:

  • समन आदेश ‘mind application’ के बाद ही जारी हो
  • न्यायालय स्वयं सुनिश्चित करे कि नमूना वैध अवधि में परीक्षण हुआ
  • प्रक्रियागत त्रुटियाँ अभियोजन को अवैध बनाती हैं

4. राज्य प्रयोगशालाओं की जवाबदेही

यह निर्णय प्रयोगशालाओं पर भी दायित्व डालता है:

  • समय पर रिपोर्ट दें
  • पुनः परीक्षण शीघ्र करें
  • shelf life और वैज्ञानिक integrity बनाए रखें

कानूनी सिद्धांत जो इस फैसले से पुष्ट हुए

  1. Process must follow scientific protocol
  2. Shelf life violation = unreliable evidence
  3. Delayed re-testing violates principles of natural justice
  4. Magistrate must apply judicial mind before issuing summons
  5. Benefit of doubt goes to the accused in cases involving perishable samples

निष्कर्ष

         पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट रूप से बताता है कि कीटनाशकों जैसे नाशवान पदार्थों की जांच में देरी पूरी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है। 131 दिनों की देरी से की गई पुनः जांच न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से अवैध है बल्कि आरोपी के संवैधानिक अधिकारों का भी उल्लंघन है।

इस केस ने यह स्थापित कर दिया कि—

“नमूने की विश्वसनीयता न्याय का आधार है, और जब नमूना ही वैज्ञानिक रूप से अविश्वसनीय हो जाए, तो अभियोजन स्वयं ही ढह जाता है।”

      हाई कोर्ट द्वारा समन आदेश रद्द करना एक महत्वपूर्ण मिसाल है जो भविष्य में अधिकारियों, प्रयोगशालाओं और अदालतों—सभी को अधिक सावधानी बरतने के लिए बाध्य करेगा।