“S. 32(1) Evidence Act: मौत करीबी (Imminent Death) अनिवार्य नहीं — सुप्रीम कोर्ट का नवीनतम विचार”
भूमिका
Indian Evidence Act, 1872 की धारा Section 32(1) (Evidence Act) के अंतर्गत “दिव्यांग-घोषणा” यानी “dying declaration” (मरने वाले द्वारा मृत्यु से पूर्व दी गई जानकारी) एक महत्वपूर्ण स्तंभ रही है। लंबे समय से प्रथा रही है कि dying declaration तभी स्वीकार हो सकती है, यदि वक्ता (declarant) को लगता हो कि उसकी मृत्यु “निकट” है — यानी उसकी मौत imminently होनी है। यह दृष्टिकोण, अंग्रेजी न्यायशास्त्र से प्रेरित माना जाता रहा।
हालाँकि, 4 दिसम्बर 2025 को, Supreme Court of India (सुप्रीम कोर्ट) ने स्पष्ट किया कि ऐसी “मौत करीबी” की कोई आवश्यकता नहीं है — यानी, यदि किसी व्यक्ति ने मृत्यु से पूर्व अपनी मौत या उसे घातक स्थिति में पहुँचाने वाले कारणों का विवरण दिया, तो वह statement, धारा 32(1) के अंतर्गत dying declaration मानी जा सकती है — चाहे वक्ता को मृत्यु imminently होने का एहसास हो या नहीं।
यह नवीनतम न्यायनिर्णय न केवल कानूनी दृष्टिकोण बदलता है, बल्कि उन मुकदमों में — जहाँ मृत्यु के कुछ समय बाद नुकसान हुआ — दलीलों और सुनवाई की दिशा बदलने की संभावना बनाता है।
इस लेख में हम समझेंगे — dying declaration क्या है; परंपरागत (पुरानी) धारणा क्या थी; सुप्रीम कोर्ट ने अब क्या कहा; और इसका प्रभाव किस प्रकार के मामले में पड़ सकता है।
“Dying Declaration” — क्या, क्यों और पूर्व समझ
Dying Declaration — मूल अवधारणा
- “Dying declaration” वह कथन (oral या written) है, जो किसी व्यक्ति ने अपनी मृत्यु से पहले — या ऐसी स्थिति में कि वह आगे अपनी मृत्यु या गंभीर चोट से जूझने वाला हो — मृत्यु का कारण (cause of death) या उस घटना (circumstances of the transaction) का वर्णन करता हो, जिसने उसकी मृत्यु या मौत का कारण बनी हो।
- इस प्रकार का बयान सामान्य hearsay (गवाह न होकर किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा सुनाई गयी बात) नहीं माना जाता — क्योंकि ऐसा माना जाता है कि एक मौत के कगार पर मौजूद व्यक्ति झूठ बोलने का जोखिम नहीं लेगा। इसके पीछे परंपरागत maxim है: “Nemo moriturus praesumitur mentire” (एक ऐसा इंसान, जो मरने जा रहा हो, झूठ बोलने की संभावना नहीं रखता)।
- भारतीय कानून में, धारा 32(1) Evidence Act इसे स्वीकार करती है।
परंपरागत British / अंग्रेज़ी दृष्टिकोण और भारतीय परंपरा में अंतर
- अंग्रेज़ी कानून (English law) में, dying declaration को स्वीकार करने के लिए यह जरूरी माना जाता रहा कि वक्ता को “मौत का imminent डर” हो — यानि उसे ज्ञात हो कि उसकी मृत्यु आसन्न है, उसकी मौत अवश्य होगी और बिल्कुल नजदीक है।
- परंतु भारतीय परम्परा — जैसा कि कई पुराने निर्णयों में स्वीकार किया गया — ने यह तय किया कि यह आशंका (expectation of death) अनिवार्य नहीं। यानी एक बयान उस व्यक्ति द्वारा भी admissible हो सकता है जिसने खुद को imminently dying नहीं माना, लेकिन वह घटना या परिस्थितियों का विवरण दे — जिससे उसकी मृत्यु हुई।
- उदाहरण के लिए, पहले भी कई मामलों में भारतीय अदालतों ने माना कि dying declaration के लिए केवल यह देखना चाहिए कि कथन “मौत के कारण या घटना की परिस्थितियों से” संबंधित हो — न कि यह कि वक्ता को मृत्यु की imminence का अहसास था।
इस दर्श-नेमताओं (judicial interpretations) के आधार पर, भारतीय कानून में dying declaration की admissibility को सिर्फ एक विशेष, अंतिम-क्षण की स्थिति तक सीमित नहीं किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में जो नया निर्देश दिया — क्या कहा गया?
मामला — तथ्यों की रूपरेखा
- हालिया घटना में, एक महिला को उसके पति द्वारा गोली मारी गई। बाद में, उसने अपने ससुराल के लोगों (सास, ससुर, देवर) पर आरोप लगाया कि उन्होंने उसके पति को इसके लिए उकसाया था। यह शिकायत (FIR) उसके भाई द्वारा दर्ज कराई गई।
- महिला ने अपने कुछ बयान Section 161 Cr.P.C. के तहत दिए — पहले बयान में केवल पति का नाम लिया; बाद के बयान में सास-ससुर व देवर को भी आरोपी बताया।
- पुलिस एवं अभियोजन पक्ष ने प्रारंभ में केवल पति के खिलाफ चार्ज बनाए, सास-ससुर / देवर के खिलाफ नहीं। मुकदमे में, prosecution ने चाहा कि ससुराल वालों को अतिरिक्त आरोपियों के रूप में Summons जारी किया जाए (under Criminal Procedure Code, Section 319)। लेकिन ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने इन्कार कर दिया। उनकी मुख्य वजह यह थी कि dying declaration मानने योग्य नहीं — क्योंकि मृत्यु तक करीब दो महीने का अंतर था; और वक्ता को तेज मृत्यु imminent थी, ऐसा नहीं था; साथ ही, कोई “मागिस्ट्रेट या डॉक्टर” द्वारा dying declaration का certification भी नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश
- सुप्रीम कोर्ट (पीठ– जस्टिस Sanjay Karol व जस्टिस N Kotiswar Singh) ने कहा कि केवल इसलिए कि वक्ता की मृत्यु imminent नहीं थी या मृत्यु तक अंतर था, उसको dying declaration से वंचित करना गलत है।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 32(1) में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है कि वक्ता को मौत करीबी महसूस हो रही हो। जो महत्वपूर्ण है, वो यह है कि वक्ता ने अपनी मौत के कारण या घटना की परिस्थितियों का वर्णन किया हो।
- सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिए गए अपने कई निर्णयों (precedents) की ओर भी इशारा किया — जैसे कि State of Haryana v. Mange Ram (2003) — जहां अदालत ने कहा था कि “… धारा 32 यह नहीं कहती कि वक्ता को मौत imminent के नीचे होना चाहिए।”
- इसी प्रकार, अन्य मामलों में (जैसे Kans Raj v. State of Punjab (2000) आदि) भी सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि dying declaration admissible है, बशर्ते बयान “मृत्यु या उसके कारण/परिस्थितियों” से संबंधित हो; और इस बात की पुष्टि हो कि बयान वास्तव में मृतक द्वारा दिया गया था (i.e. “making of such statement as a fact” साबित होना चाहिए)।
- नया निर्णय — 2025 का — इन पुराने सिद्धांतों की पुष्टि करता है, और यह स्पष्ट करता है कि “death imminent at the time of statement” requirement, भारतीय कानून में कभी अनिवार्य ही नहीं थी।
क्यों अहम है यह फैसला — तर्क और प्रभाव
1. मजबूत प्रवृत्ति: भारतीय कानून में विश्लेषणात्मक स्पष्टता
यह फैसला इस तथ्य को बंद कर देता है कि न्यायालय “death imminent” की परंपरागत अंग्रेज़ी-परम्परागत धारणा की ओर खिंचता हो। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 32(1) की व्याख्या भारतीय परिस्थितियों, आवश्यकताओं और न्याय की संकल्पना के अनुरूप होनी चाहिए।
इस प्रकार, dying declaration की admissibility — सिर्फ इसलिए कि मृत्यु के अंतिम क्षणों की भावना थी — से निकलकर, एक तार्किक, तथ्य-केंद्रित आधार पर आ गयी है, जहाँ देखा जाएगा कि बयान क्या कह रहा है — मृत्यु का कारण या घटना की परिस्थितियाँ — न कि वक्ता की भावनात्मक अवस्था।
2. अभियोजन पक्ष के लिए गहराई से सबूत प्रस्तुत करने का अवसर
इस निर्णय से अभियोजन पक्ष (prosecution) को यह अवसर मिलेगा कि यदि किसी अपराध में मृतक ने — चाहे इलाज के दौरान, अस्पताल में, या किसी अन्य समय — अपनी मृत्यु से पहले घटना का विवरण दिया है, तो वह बयान dying declaration के रूप में स्वीकार हो सकता है चाहे वह immediate deathbed पर न हो।
विशेष रूप से, ऐसे मामलों में जहाँ शारीरिक चोट के बाद मृतक कुछ समय तक जीवित रहा, और बाद में उसकी मृत्यु हुई — पुराने दिनों में जिन बयान को dying declaration नहीं माना जाता था — अब उन्हें evidence में लाया जा सकेगा। इससे अभियोजन पक्ष के दायित्व अधिक सशक्त होंगे।
3. न्यायालयों में समर्पित विवेचना (judicial scrutiny) की जिम्मेदारी
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने admissibility का द्वार खोला है, लेकिन यह हरेक बयान को अपने आप स्वीकार नहीं करेगा — जैसा कि हालिया न्यायशास्त्र में बार-बार कहा जाता है। उदाहरण के लिए:
- बयान वास्तविक रूप से मृतक द्वारा दिया गया हो। यानी, “making of the statement” as fact साबित हो।
- बयान स्पष्ट रूप से मृत्यु के कारण या घटना की परिस्थितियों से संबंधित हो — सामान्य बातें, या अन्य बातें irrelevant हों, तो उन्हें नहीं माना जाएगा।
- वक्ता का मानसिक संतुलन (soundness of mind) — अर्थात् वह बयान देने के लायक हो, coherent हो, दबाव- or वांछित प्रभाव से मुक्त हो।
यानी, admissibility के दरवाजे खुले हैं — लेकिन courts को विवेक (judicial discretion) व सावधानी से जांच करनी होगी।
4. Defence / accused पक्ष पर भी असर
यह निर्णय defence पक्ष (accused) के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है — क्योंकि अब dying declarations की greater admissibility संभव हो गयी है, prosecution जब चाहें, inadmissible कहे जाने वाले बयान को अदालत में पेश कर सकते हैं। इसलिए accused को सावधानीपूर्वक अपनी रणनीति तैयार करनी होगी — जैसे कि बयान की हर पहलू की विश्वसनीयता (credibility), recording का तरीका, समय, माध्यम, आदि पर प्रश्न खड़े करना।
इसीलिए, अब criminal trials में dying declaration के weight (महत्त्व) और possible challenge दोनों ही बढ़ गए हैं।
प्रमुख सवाल और चिंताएँ
क्या हर बयान अब dying declaration माना जाएगा?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने केवल यह स्पष्ट किया है कि “death imminent” आवश्यक नहीं — लेकिन इसके बावजूद, बयान को dying declaration मानने के लिए अन्य शर्तें (जैसे relevancy, कारण/परिस्थिति से संबंध, maker की स्थिति, reliability) लागू होंगी।
क्या इससे गलत बयान-दाखिलियाँ (false confessions) या misuse की संभावना नहीं बढ़ जाएगी?
संभावना रहेगी — क्योंकि hearsay के पुराने बहिष्करण (exclusion) का exception अब थोड़ा व्यापक हुआ है। इसलिए अदालतों व अभियोजन पक्ष दोनों को — विशेष रूप से critical scrutiny व corroboration की मांग — बरतनी होगी।
क्या मेडिकल प्रमाण, प्रमाण-पत्र आदि की अनिवार्यता खत्म हो गयी?
नहीं; صرف “death imminent” की अनिवार्यता गई है। प्रमाण-पत्र (certification by magistrate / doctor) — यदि उपलब्ध हो — प्रमाण-मूल्य (probative value) बढ़ा सकता है। लेकिन उसकी अनुपस्थिति अपने आप बयान को अस्वीकार्य नहीं बनाती।
निष्कर्ष
नवीनतम 2025 का आदेश — कि धारा 32(1) के तहत dying declaration के लिए death imminent होना अनिवार्य नहीं — भारतीय साक्ष्य कानून (evidence law) के दृष्टिकोण में एक महत्वपूर्ण मोड़ (landmark) है।
यह फैसला सत्य-प्राप्ति (truth-seeking) के उद्देश्य को अधिक प्राथमिकता देता है बजाए विधिवत-औपचारिकताओं (formalistic technicalities) पर निर्भर रहने के। ऐसी संगठित सोच, जहां अदालतें substance (मामले की सच्चाई) पर ध्यान दें, कानूनी न्याय के उद्देश्य को मजबूत करती है।
साथ ही, अभियोजन पक्ष के लिए यह एक सशक्त अवसर है; और अदालतों, न्यायाधीशों के लिए जिम्मेदारी — कि वे dying declarations की स्वीकार्यता व weight तय करते समय, क्रमबद्ध, विवेचित व संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाएँ।
इस प्रकार, यह निर्णय — सिद्धांत, प्रक्रिया और व्यावहारिकता तीनों में बदलाव का संकेत देता है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।