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महिलाओं के खतने (FGM) पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग: सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुई ऐतिहासिक सुनवाई का विस्तृत विश्लेषण

महिलाओं के खतने (FGM) पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग: सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुई ऐतिहासिक सुनवाई का विस्तृत विश्लेषण

भूमिका

        भारत में महिलाओं और बालिकाओं के अधिकारों को लेकर कानून समय–समय पर विकसित और सुदृढ़ होते रहे हैं। लेकिन कुछ प्रथाएँ आज भी ऐसी हैं जो न केवल मानवाधिकारों के विरुद्ध हैं, बल्कि बच्चों की शारीरिक और मानसिक सुरक्षा को गंभीर खतरा पहुंचाती हैं। ऐसी ही एक प्रथा है — महिलाओं का खतना, जिसे अंग्रेज़ी में Female Genital Mutilation (FGM) कहा जाता है।

       यह प्रथा भारत में मुख्य रूप से दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में प्रचलित है, जहाँ इसे ‘ख़तना’ या ‘ख़फ़्ज़’ कहा जाता है। लंबे समय से इस प्रथा पर कानूनी तौर पर बहस चल रही है, लेकिन हाल ही में यह मुद्दा फिर चर्चाओं में आ गया है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई शुरू कर दी है, जिसमें पूरे भारत में FGM पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है।

       चेतना वेलफेयर सोसाइटी नामक एनजीओ द्वारा दायर इस याचिका पर कोर्ट ने 29 नवंबर 2025 को केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उत्तर माँगा है। याचिका में यह तर्क दिया गया है कि:

  • FGM बच्चों के मूल अधिकारों का उल्लंघन है
  • यह भारतीय दंड संहिता (IPC) और
  • POCSO Act, 2012 के तहत भी एक दंडनीय अपराध है

यह लेख इस पूरे मुद्दे का कानूनी, सामाजिक और संवैधानिक परिप्रेक्ष्य से विस्तृत विश्लेषण करता है।


FGM क्या है? भारत में इसके स्वरूप और प्रभाव

       विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार FGM एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें महिला जननांगों के किसी हिस्से को धार्मिक या सामाजिक प्रथा के नाम पर काटा या क्षतिग्रस्त किया जाता है, जिसका कोई चिकित्सकीय लाभ नहीं होता।

        भारत में यह प्रथा दाऊदी बोहरा समुदाय में बच्चों — आमतौर पर 6–7 वर्ष की उम्र की लड़कियों — पर की जाती है। इसे परंपरा, धार्मिक मान्यता, और “शुद्धता” के नाम पर उचित ठहराया जाता है, हालांकि चिकित्सा विशेषज्ञ इसे गंभीर स्वास्थ्य जोखिम वाला मानते हैं।

स्वास्थ्य पर प्रभाव

FGM के कारण:

  • अत्यधिक दर्द
  • संक्रमण
  • रक्तस्राव
  • मूत्र-समस्याएँ
  • प्रसव जटिलताएँ
  • मानसिक आघात (Post-traumatic stress)
    जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

WHO, UNICEF, और कई मानवाधिकार संगठन इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन मानते हैं।


याचिका में क्या-क्या मांगें की गई हैं?

चेतना वेलफेयर सोसाइटी की याचिका में निम्न प्रमुख मांगें की गई हैं:

  1. FGM को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए — चाहे वह किसी भी समुदाय में हो।
  2. FGM को POCSO Act के तहत स्पष्ट रूप से अपराध घोषित किया जाए।
  3. इस प्रथा को “यातनापूर्ण और अमानवीय व्यवहार” मानकर इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 39 के विपरीत घोषित किया जाए।
  4. समुदायों में जागरूकता अभियान चलाकर FGM पर रोक हेतु राष्ट्रीय नीति बनाई जाए।
  5. FGM करवाने वाले व्यक्तियों, मौलवियों, चिकित्सकों या परिवारजनों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

याचिकाकर्ता का कहना है कि:

“यह एक धार्मिक प्रथा नहीं, बल्कि शरीरिक क्षति पहुँचाने वाली अनैतिक परंपरा है, जो पूरी तरह असंवैधानिक है।”


सुप्रीम कोर्ट की प्रारंभिक टिप्पणी और नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर पहली सुनवाई में कहा कि:

  • FGM का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है
  • यह नाबालिग बच्चियों के शारीरिक व मानसिक अधिकारों से जुड़ा है
  • यदि कोई प्रथा मूल अधिकारों के विरुद्ध पाई जाती है तो न्यायपालिका उस पर रोक लगा सकती है

कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछा कि:

  • भारत में FGM पर क्या राष्ट्रीय नीति है?
  • क्या इसे रोकने के लिए कोई कानून प्रस्तावित है?
  • क्या यह POCSO या IPC की धाराओं में स्वतः शामिल है?

यह नोटिस दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को राष्ट्रीय महत्व का विषय मान रहा है।


POCSO Act के तहत FGM को अपराध क्यों कहा गया?

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि FGM स्पष्ट रूप से POCSO Act, 2012 के दायरे में आता है क्योंकि:

  • यह नाबालिग लड़की के जननांगों को काटने/क्षतिग्रस्त करने की क्रिया है
  • यह sexual assault की परिभाषा के भीतर आता है
  • स्वीकृति (consent) का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि बच्ची नाबालिग है

POCSO की धारा 3 (Penetrative Sexual Assault) और धारा 7 (Sexual Assault) में “जननांगों को चोट पहुँचाना” भी शामिल है।

इसलिए FGM पर पहले से ही कानूनी कार्रवाई संभव है, लेकिन याचिका इसे स्पष्ट शब्दों में अवैध घोषित करने की मांग करती है।


क्या यह धार्मिक प्रथा है? संवैधानिक प्रश्न

दाऊदी बोहरा समुदाय के कुछ लोगों का तर्क है कि:

  • यह धार्मिक परंपरा है
  • संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान है

लेकिन याचिकाकर्ताओं का उत्तर है कि:

  • धार्मिक स्वतंत्रता पूर्ण अधिकार नहीं है
  • यदि कोई धार्मिक प्रथा स्वास्थ्य, नैतिकता, या मूल अधिकारों के खिलाफ हो, तो उस पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है
  • Sabarimala और Triple Talaq मामलों में भी यह सिद्धांत लागू किया गया है

सुप्रीम कोर्ट ने पहले कई मामलों में कहा है:

“Constitution is supreme, not custom.”

FGM के संदर्भ में भी यही संवैधानिक सिद्धांत लागू हो सकता है।


पिछले फैसले और न्यायिक संदर्भ

FGM भारत में नया मुद्दा नहीं है। 2018 में भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आया था (Sunita Tiwari बनाम Union of India), लेकिन तब पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के गठन की आवश्यकता जताई गई थी। बाद में यह मामला लंबित रह गया।

अब 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे पुन: सक्रिय किया है।

अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मिसालें

  • इंडोनेशिया, सोमालिया, मिस्र, नाइजीरिया जैसे देशों में FGM पर सख्त कानून बनाए गए हैं।
  • कई देशों ने इसे मानव तस्करी, बाल उत्पीड़न और जेंडर आधारित हिंसा के रूप में वर्गीकृत किया है।

भारत में इस दिशा में कोई स्पष्ट कानून नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई अत्यंत महत्वपूर्ण है।


महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट को निम्नलिखित मुख्य प्रश्नों पर निर्णय लेना होगा:

  1. क्या FGM को भारत में पूरी तरह अवैध घोषित किया जा सकता है?
  2. क्या इसे धार्मिक प्रथा के नाम पर संरक्षित किया जा सकता है?
  3. क्या FGM को POCSO और IPC के तहत स्वतः अपराध माना जाए?
  4. क्या केंद्र सरकार को FGM रोकथाम के लिए विशेष कानून बनाना चाहिए?
  5. क्या यह संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता) का उल्लंघन है?

FGM और संविधान का संबंध

अनुच्छेद 14 — समानता का अधिकार

FGM केवल लड़कियों पर लागू एक दंडात्मक प्रथा है; यह लैंगिक भेदभाव है।

अनुच्छेद 15 — भेदभाव का निषेध

लैंगिक आधार पर बच्चियों के शरीर को क्षति पहुँचाना संविधान के सीधे विरुद्ध है।

अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

FGM बच्ची के शरीर पर अनुचित, अवैध और अत्यंत हानिकारक हस्तक्षेप है।

अनुच्छेद 39 — राज्य का कर्तव्य

बच्चियों के स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा को सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है।

इस प्रकार संविधान स्पष्ट रूप से FGM का विरोध करता है।


दाऊदी बोहरा समुदाय का पक्ष

कुछ समर्थन करने वाले लोग तर्क देते हैं कि:

  • यह धार्मिक पहचान का हिस्सा है
  • यह हल्का रूप है, जिसे “ख़फ़्ज़” कहते हैं
  • इससे बच्ची को कोई नुकसान नहीं होता

लेकिन चिकित्सा विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय शोध कहते हैं:

  • “हल्का” FGM जैसी कोई चीज नहीं
  • Genital cutting का कोई लाभ नहीं
  • छोटा या बड़ा, यह शारीरिक और मानसिक क्षति ही है

इसके अलावा, कई बोहरा महिलाएँ स्वयं इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठा चुकी हैं।


केंद्र सरकार की संभावित स्थिति

केंद्र सरकार कई बार संसद में कह चुकी है कि:

  • भारत में FGM प्रचलित है
  • इसे रोकने के लिए POCSO और IPC पर्याप्त हैं

लेकिन कानून विशेषज्ञों का कहना है कि:

  • भारत में FGM रोकने के लिए स्वतंत्र कानून आवश्यक है
  • जैसे दहेज विरोधी कानून, घरेलू हिंसा कानून बनाए गए
  • FGM के लिए भी स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट भी यह देखेगा कि क्या मौजूदा कानून पर्याप्त हैं या विशेष कानून की आवश्यकता है।


सामाजिक प्रभाव और व्यापक महत्व

FGM पर पूर्ण प्रतिबंध:

  • लड़कियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करेगा
  • धार्मिक प्रथा के नाम पर होने वाली हिंसा को रोकेगा
  • भारत को अंतरराष्ट्रीय मानकों से जोड़ देगा
  • महिला अधिकारों को कानूनी रूप से मजबूत करेगा

साथ ही, यह समुदायों में जागरूकता बढ़ाएगा और बालिकाओं को शारीरिक व मानसिक अत्याचार से बचाएगा।


निष्कर्ष

      सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुई यह सुनवाई भारत में महिलाओं के शारीरिक स्वायत्तता और बाल अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

        इसमें कोई संदेह नहीं कि FGM एक हानिकारक, अमानवीय और असंवैधानिक प्रथा है, चाहे वह किसी भी समुदाय में की जाती हो।

      यदि सुप्रीम कोर्ट इस प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगा देता है, तो यह भारत में महिला अधिकारों की लड़ाई में एक मील का पत्थर सिद्ध होगा। यह निर्णय न केवल बच्चियों के जीवन और सुरक्षा को संवारने वाला होगा, बल्कि समाज में बार–बार उठने वाले उस सवाल का भी उत्तर होगा कि:

“क्या धार्मिक परंपरा के नाम पर किसी बच्चे के शरीर को क्षति पहुँचाना सही है?”
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिकार–सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त करेगा।


संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।