वृद्ध व्यक्ति के न्यायिक अधिकारों की रक्षा : 235 दिनों की देरी पर भी अपील स्वीकार — पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का मानवीय दृष्टिकोण
न्याय का उद्देश्य केवल क़ानूनी प्रक्रियाओं का कठोर अनुपालन नहीं, बल्कि न्याय के वास्तविक उद्देश्य — सत्य, निष्पक्षता और मानवता — की रक्षा करना है। भारतीय न्याय व्यवस्था में “Condonation of Delay” इसी मानवीय दृष्टिकोण का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ अदालतें तकनीकी देरी के कारण किसी को न्याय से वंचित नहीं होने देतीं।
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (Punjab & Haryana High Court) ने एक महत्वपूर्ण आदेश में एक 72 वर्षीय वृद्ध याचिकाकर्ता द्वारा 235 दिनों की देरी से दायर की गई अपील को स्वीकार करते हुए देरी को “Condoned” कर दिया। यह निर्णय दर्शाता है कि न्यायालय वृद्ध, असहाय तथा वास्तविक कठिनाइयों से जूझ रहे नागरिकों के प्रति संवेदनशील रहता है, विशेष रूप से तब जब देरी जानबूझकर या दुर्भावनापूर्ण न हो।
यह लेख इस निर्णय का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है—
- कानूनी सिद्धांत
- देरी के कारण
- अदालत की तर्कशक्ति
- ‘Sufficient Cause’ का मूल्यांकन
- महत्वपूर्ण नज़ीरें
- और निर्णय का व्यापक प्रभाव
1. Condonation of Delay : कानून का उद्देश्य
भारतीय विधि में Appeal, Revision या Petition निर्धारित समयसीमा के भीतर दाखिल किया जाना आवश्यक है। परंतु Limitation Act, 1963 की धारा 5 (Section 5) न्यायालय को यह अधिकार देती है कि —
“यदि किसी वादी/अपीलकर्ता के पास देरी का ‘पर्याप्त कारण’ (Sufficient Cause) है, तो न्यायालय देरी को माफ कर सकता है।”
इस प्रावधान का उद्देश्य है—
✅ न्याय के मार्ग में तकनीकी देरी बाधा न बने
✅ वास्तविक कठिनाई वाले व्यक्तियों को राहत मिले
✅ न्यायालय “Substantial Justice” को प्राथमिकता दे
2. मामला : 72 वर्षीय व्यक्ति की अपील 235 दिन लेट — देरी क्यों हुई?
याचिकाकर्ता—एक 72 वर्षीय वृद्ध व्यक्ति—ने बताया कि—
- उनका स्वास्थ्य लंबे समय से खराब था
- बार-बार अस्पताल जाना पड़ा
- सुनने-समझने में कमी
- आर्थिक समस्याएँ
- वकील और कोर्ट प्रक्रिया समझने में कठिनाई
- पारिवारिक सहायता का अभाव
इन परिस्थितियों में अपील समय पर दायर नहीं हो सकी।
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि—उन्हें आदेश की प्रति देर से मिली, और उन्हें यह घटना समयसीमा और अपील की प्रक्रिया समझने में कठिनाई हुई।
यह देरी—
जानबूझकर
दुर्भावनापूर्ण
रणनीतिक
नहीं थी।
बल्कि यह पूरी तरह वास्तविक मानवीय कारणों पर आधारित थी।
3. राज्य/प्रतिवादी का विरोध
प्रतिवादी ने कहा—
- 235 दिन की देरी अत्यधिक है
- देरी का कोई ठोस कारण नहीं
- व्यक्ति की उम्र देरी का सामान्य बहाना नहीं हो सकती
- आदेश की प्रति मिलने में देरी साबित नहीं
परंतु अदालत ने इन आपत्तियों को अस्वीकार कर दिया।
4. न्यायालय का दृष्टिकोण : “मानवीयता, न्याय और वास्तविकता”
(A) वृद्ध व्यक्तियों के लिए विशेष न्यायिक संरक्षण
अदालत ने कहा कि—
- 72 वर्ष की आयु में स्वास्थ्य समस्याएँ सामान्य हैं
- व्यक्ति के लिए कोर्ट की प्रक्रिया समझना कठिन होता है
- उम्र बढ़ने में physical और mental दोनों तरह की क्षमताएँ कम होने लगती हैं
इसलिए देरी को तकनीकी आधार पर खारिज करना न्याय के मूल उद्देश्य के विरुद्ध होगा।
(B) “Sufficient Cause” का उदारतापूर्ण मूल्यांकन
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक नज़ीरों का हवाला दिया—
1. Collector, Land Acquisition v. Mst. Katiji (1987)
न्यायालयों को देरी को माफ करने में उदारतापूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
न्याय का उद्देश्य विवाद का निपटारा है, न कि देरी का दंड देना।
2. N. Balakrishnan v. M. Krishnamurthy (1998)
देरी की लंबाई महत्वपूर्ण नहीं है,
महत्व है—वजह ईमानदार और संतोषजनक हो।
3. State of Nagaland v. Lipok Ao (2005)
“Substantial Justice प्रबल है, technicalities पर नहीं।”
इन नज़ीरों के आधार पर अदालत ने कहा कि वृद्ध व्यक्ति की देरी माफ की जा सकती है क्योंकि—
✔ कोई दुर्भावना नहीं
✔ कोई अनावश्यक लाभ नहीं उठाया गया
✔ देरी ठोस कारणों से हुई
✔ अपील में प्रथमदृष्टया महत्व है
5. न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष
(1) आयु एक महत्वपूर्ण कारक
अदालत ने कहा—
“उच्च आयु स्वयं में एक प्रासंगिक कारक है, जो यह सिद्ध करती है कि व्यक्ति समय पर कानूनी कदम उठाने की स्थिति में न रहा होगा।”
(2) न्यायालय का मानवीय दृष्टिकोण
“न्यायालय का उद्देश्य विवाद का निष्पक्ष समाधान है, देरी का दंड देना नहीं।”
(3) कोई mala fide नहीं पाया गया
देरी को रणनीतिक या जानबूझकर नहीं माना गया।
(4) अपील के मेरिट का भी महत्व
अदालत ने कहा कि अपील में कानूनी प्रश्न हैं जिनका समाधान आवश्यक है।
इसलिए देरी को रद्द करना न्यायिक रूप से उचित नहीं होगा।
6. निर्णय (Order)
- 235 दिनों की देरी condone की जाती है
- अपील समयबद्ध मानी जाएगी
- केस को merits पर सुनवाई हेतु स्वीकार किया जाता है
अदालत ने कहा—
“A liberal and justice-oriented approach is required, especially when the litigant is a senior citizen facing genuine difficulties.”
7. निर्णय का व्यापक प्रभाव (Wider Impact)
(1) वृद्ध तथा असहाय व्यक्तियों के लिए राहत
यह फैसला दर्शाता है कि अदालतें केवल कानून की कठोरता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी प्राथमिकता देती हैं।
(2) भविष्य में इसी तरह के मामलों में महत्वपूर्ण नज़ीर
कई अपीलकर्ता, जो स्वास्थ्य, गरीबी या अज्ञानता के कारण देरी करते हैं, इस निर्णय का लाभ उठा सकेंगे।
(3) “Justice over Technicalities” का पुनः जोर
यह निर्णय दोहराता है कि—
न्याय प्रक्रिया से ऊपर है।
(4) न्यायालयों की सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाता है
न्यायालय समाज के कमजोर वर्गों को न्याय दिलाने का माध्यम हैं।
8. क्यों यह निर्णय महत्वपूर्ण है? (Significance)
यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि—
- अदालतों में देरी एक आम समस्या है
- वृद्ध लोग अक्सर कानूनी प्रक्रिया से अनभिज्ञ होते हैं
- देरी पर देरी, न्याय को ठप्प कर सकती है
- कठोर तकनीकी दृष्टिकोण कई बार न्याय से वंचित कर देता है
- इस निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि—
“Condonation of Delay is not a matter of charity, but of justice.”
9. निष्कर्ष (Conclusion)
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका के मानवीय और न्यायपूर्ण चरित्र का उत्कृष्ट उदाहरण है।
एक 72 वर्षीय वृद्ध व्यक्ति द्वारा 235 दिनों की देरी से दायर अपील को स्वीकार कर अदालत ने संदेश दिया है कि—
- न्याय समयसीमा की बंद दीवारों में कैद नहीं है
- वृद्ध, असहाय और बीमार व्यक्तियों को विशेष संरक्षण मिलना चाहिए
- तकनीकी देरी को न्याय का मार्ग अवरुद्ध नहीं करने देना चाहिए
- अदालतें “Substantial Justice” को प्राथमिकता देती हैं
यह निर्णय भारतीय न्याय प्रणाली को और अधिक संवेदनशील, अधिक मानवोचित और अधिक न्यायपरक बनाता है।