IndianLawNotes.com

“सेवानिवृत्ति से पूर्व CJI बी.आर. गवई का ऐतिहासिक आह्वान: उच्च न्यायालयों से जाति-आधारित व औपनिवेशिक पदनामों को बदलने की अपील”

“Before his retirement, CJI BR Gavai urged High Courts to amend caste-coded, colonial job titles”

“सेवानिवृत्ति से पूर्व CJI बी.आर. गवई का ऐतिहासिक आह्वान: उच्च न्यायालयों से जाति-आधारित व औपनिवेशिक पदनामों को बदलने की अपील”

भूमिका

        भारत का न्यायिक ढाँचा समय-समय पर आत्ममंथन और सुधारों की प्रक्रिया से गुजरता रहा है। सुप्रीम कोर्ट हमेशा से संस्थागत लोकतंत्र को सुदृढ़ करने और न्यायिक पहुंच को अधिक मानवीय व समानतामूलक बनाने की दिशा में अग्रसर रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में, सेवानिवृत्ति से ठीक पहले मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण—और ऐतिहासिक—अपील सभी उच्च न्यायालयों के समक्ष रखी। उन्होंने कहा कि अदालतों और न्यायिक प्रशासन में अब भी प्रचलित ‘कास्ट-कोडेड’ (caste-coded) और औपनिवेशिक मानसिकता से जुड़े पदनामों को समय रहते बदला जाना चाहिए। यह न केवल सामाजिक समानता और संवैधानिक मर्यादा का प्रश्न है, बल्कि आधुनिक न्यायालयीन कार्यसंस्कृति का मूल है।

      पूरा विषय केवल शब्दों का परिवर्तन भर नहीं, बल्कि उस सामाजिक चेतना से संबंधित है जो भारत जैसे बहुलतावादी समाज में न्याय को अधिक मानवीय और समावेशी बनाती है।


CJI गवई की चिंता: पदनाम जो आज के भारत के अनुरूप नहीं

       CJI गवई ने इंगित किया कि कई उच्च न्यायालयों तथा उनकी अधीनस्थ न्यायालय प्रणालियों में अब भी ऐसे पदनाम प्रयुक्त होते हैं जिनकी उत्पत्ति औपनिवेशिक युग में हुई थी या फिर जिनमें जातिगत संदर्भ निहित है। ये ऐसे शब्द हैं जो या तो भेदभावपूर्ण माने जाते हैं, या फिर भारतीय संविधान के समानता सिद्धांत के विरुद्ध प्रतीत होते हैं।

उदाहरण के रूप में—

  • “चपरासी”
  • “भंगी”
  • “दफ्तर बंदोबस्त नौकर”
  • “दफ्तरी”
  • “खानसामा”
  • “माली-चौकीदार”
  • “जलवाहक”
  • “दारोगा” (औपनिवेशिक ध्वनि के साथ प्रशासनिक संदर्भ)
    जैसे दर्जनों पदनाम ऐसे हैं जो एक लोकतांत्रिक और समानतापूर्ण समाज में अनुचित लगते हैं।

CJI गवई ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका के पदों और पदनामों को आधुनिक, सम्मानजनक और तटस्थ भाषा के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। न्यायालय में कार्यरत प्रत्येक कर्मचारी की गरिमा न्यायिक प्रतिष्ठान की गरिमा से सीधे जुड़ी होती है।


औपनिवेशिक पदनामों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक ढाँचे को कठोर, पदानुक्रमित और पहचान-आधारित बनाना एक आम प्रथा थी।
इसी दौर में—

  • लोगों को उनके कार्य के आधार पर पदनाम मिले,
  • कई पद नाम जातियों से जोड़े गए,
  • अनेक पदों को ‘निम्न’ और ‘उच्च’ श्रेणियों में विभाजित किया गया,
  • वाचिक और सामाजिक भेदभाव को प्रशासनिक शब्दावली में संस्थागत रूप मिला।

आज भले ही संविधान ने समानता, सम्मान और गैर-भेदभाव का मार्ग दिखाया है, परंतु कुछ शब्द अब भी न्यायालयीन तंत्र में चले आ रहे हैं।

इन शब्दों को हटाना मात्र “शब्द सुधार” नहीं—बल्कि संस्थागत संवेदनशीलता और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है


CJI गवई का संवैधानिक दृष्टिकोण: “पद नहीं, प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण है”

CJI गवई स्वयं महाराष्ट्र के एक प्रतिष्ठित दलित परिवार से आते हैं। संवैधानिक मूल्यों की गहरी समझ और सामाजिक समानता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता सुप्रसिद्ध है।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा:

  • न्यायालय में काम करने वाले हर कर्मचारी का पद उसके सम्मान को निर्धारित नहीं करता।
  • हमारे न्यायालयों को यह दिखाना चाहिए कि वे समानता, गरिमा और सम्मान के संवैधानिक मूल्यों के साथ खड़े हैं।
  • किसी भी पदनाम में जाति या अपमानजनक संदर्भ निहित नहीं होना चाहिए।

यह वक्तव्य इसलिए भी अर्थपूर्ण है कि न्यायपालिका को देश में सबसे अधिक ‘सम्मानित संस्था’ माना जाता है और उसका हर कदम सामाजिक मूल्यों को परिभाषित करता है।


क्यों आवश्यक है पदनामों का परिवर्तन?

1. संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप

संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 स्पष्ट रूप से—

  • भेदभाव का निषेध,
  • समानता का अधिकार,
  • अस्पृश्यता का उन्मूलन,
    —की बात करते हैं।
    कास्ट-कोडेड पदनाम इन मूल्यों के बिल्कुल विपरीत पड़ते हैं।

2. ‘अस्पृश्यता के अवशेष’ खत्म करने हेतु

कई शब्दों का सीधा संबंध ऐतिहासिक अस्पृश्यता से है।
उन्हें बनाए रखना न्यायपालिका की छवि और भावनात्मक वातावरण दोनों को आहत करता है।

3. कार्यस्थल सम्मान और मनोबल

कर्मचारी किसी भी पद पर हों—वे न्यायालय के सुचारू संचालन का अभिन्न हिस्सा हैं।
सम्मानजनक पदनाम मनोबल बढ़ाते हैं और संगठन की संस्कृति को सकारात्मक बनाते हैं।

4. औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति

न्यायपालिका को औपनिवेशिक ढाँचे की भाषाई परंपराओं से मुक्त करना लोकतांत्रिक व स्वाधीन न्याय व्यवस्था की मांग है।

5. आधुनिक प्रशासनिक शब्दावली के अनुरूप

आज हर संवैधानिक संस्था अपने प्रशासनिक तंत्र को पेशेवर और आधुनिक स्वरूप दे रही है।
न्यायपालिका भी इससे अलग नहीं।


न्याय व्यवस्था में उपयोग होने वाले संदिग्ध पदनाम—एक सूची

यद्यपि राज्यों में शब्दावली भिन्न हो सकती है, कई अदालतों में अब भी ये जैसे पदनाम पाए जाते हैं:

  • बेलदाड़
  • खलासी
  • जलाहार
  • चौकीदार-माली
  • कक्ष-सेवक
  • दफ्तरी
  • पियून
  • भंगी (बहुत पुराना व अपमानजनक)
  • सफाईकर्मी के बजाय जाति-सूचक स्थानीय शब्द
  • हवलदार (सैन्य संदर्भ के कारण औपनिवेशिक चिन्ह)

इन शब्दों को बदलकर आधुनिक, पेशेवर और गरिमामय पदनाम अपनाए जा सकते हैं, जैसे—

  • Office Assistant
  • Court Attendant
  • Sanitation Worker
  • Record Assistant
  • Support Staff
  • Security Personnel

CJI गवई द्वारा सुझाए गए सुधार

1. सभी हाईकोर्ट नियमों में त्वरित संशोधन

उन्होंने कहा कि प्रत्येक उच्च न्यायालय अपने-अपने राज्य न्यायपालिका नियमों में संशोधन करके ऐसे सभी पदनामों को हटाए।

2. जिला न्यायालयों के लिए भी निर्देश

सुधार केवल हाईकोर्ट स्तर तक सीमित न रहकर जिला न्यायालयों तक विस्तारित हों।

3. पदनामों के मानकीकरण (standardisation) की आवश्यकता

पूरे देश में न्यायालयीन सिस्टम में उपयोग होने वाले पदनाम समान, सम्मानजनक और आधुनिक हों।

4. सामाजिक न्याय की संवेदना को प्राथमिकता

सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं—बल्कि सामाजिक समावेशिता को प्रोत्साहित करने वाला कदम।


अन्य प्रमुख बिंदु जो CJI गवई ने उठाए

A. न्यायपालिका में भूमिकाओं का सटीक परिभाषन

उन्होंने कहा कि प्रत्येक पद की जिम्मेदारियों को आधुनिक कार्य-विश्लेषण के आधार पर परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि पदनाम उनकी भूमिकाओं को सम्मानजनक रूप में दर्शा सकें।

B. प्रशिक्षण और संवेदनशीलता कार्यक्रमों की आवश्यकता

सिर्फ पदनाम बदलना पर्याप्त नहीं—कर्मचारियों के बीच सामाजिक समानता के विचार को गहराई से स्थापित करना आवश्यक है।

C. न्यायपालिका की भाषा को आधुनिक बनाना

कई न्यायालयिक आदेशों और प्रक्रियाओं में भी ऐसी शब्दावली है जो असमानता के संकेत देती है—उसे भी बदलने का समय आ गया है।


सुधार का प्रभाव: न्यायालय और समाज दोनों को लाभ

1. न्यायालय की छवि अधिक समावेशी और संवेदनशील बनेगी

लोग न्यायालय को समानता के मंदिर के रूप में देखते हैं। पदनामों में संवेदनशील सुधार उसकी नैतिक विश्वसनीयता बढ़ाते हैं।

2. कर्मचारियों का आत्मसम्मान बढ़ेगा

सम्मानजनक पदनाम किसी भी कर्मचारी के मन में सकारात्मकता और जिम्मेदारी की भावना बढ़ाते हैं।

3. संस्थागत लोकतंत्र मजबूत होगा

यह कदम न्यायपालिका को समाजिक न्याय के संवैधानिक आदर्शों के और निकट लाता है।

4. जातिगत पूर्वाग्रहों के समाप्ति में योगदान

ऐसे सुधार समाज में व्यापक संदेश देते हैं कि संस्थाएँ जाति-आधारित संदर्भों को स्वीकार नहीं करतीं।


सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों द्वारा पहले किए गए समान सुधार

समय-समय पर विभिन्न उच्च न्यायालयों ने—

  • ‘भंगी’ शब्द पर प्रतिबंध लगाया,
  • सफाई कर्मचारी शब्द को प्रोत्साहित किया,
  • चपरासी को बदलकर अफसर सहायक/कार्यालय सहायाक किया,
  • पदानुक्रम को अधिक पेशेवर बनाने के प्रयास किए।

CJI गवई की अपील इन सभी पहलों को राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत कर देती है।


सामाजिक और संवैधानिक संदेश

CJI गवई का यह वक्तव्य केवल प्रशासनिक सुधार नहीं—
यह संवैधानिक नैतिकता (constitutional morality) की एक मजबूत अभिव्यक्ति है।
वे यह बताना चाहते हैं कि—

  • न्यायपालिका का नैतिक दायित्व केवल निर्णय देने तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों को भी आकार देना है।
  • संस्थाएं तब न्यायपूर्ण बनती हैं जब उनमें शामिल हर व्यक्ति का सम्मान समान हो।
  • पदनामों की भाषा भी न्याय के मूल्यों को प्रतिबिंबित करनी चाहिए।

समापन

       सेवानिवृत्ति से पूर्व CJI बी.आर. गवई द्वारा उच्च न्यायालयों से कास्ट-कोडेड और औपनिवेशिक पदनामों को हटाने की अपील भारतीय न्यायपालिका के विकास पथ में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
इस कदम का उद्देश्य केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, समानता, समावेशिता और संवैधानिक आदर्शों को आगे बढ़ाना है।

       आज जब भारत सामाजिक न्याय की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है, ऐसे में न्यायपालिका का यह संदेश कि—
“सम्मान हर पद का अधिकार है, और भाषा समानता की शुरुआत है”
—समाज को सही रूप में दिशा देने वाला है।

        यह पहल आने वाली पीढ़ियों को यह भी बताएगी कि भारत की न्यायपालिका केवल कानून की संरक्षक नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और गरिमा की भी प्रबल वाहक है।