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Primary Evidence & Secondary Evidence under the Indian Evidence Act, 1872 — एक विस्तृत अध्ययन

प्राथमिक एवं द्वितीयक साक्ष्य : धारा 62 एवं 63 का विस्तृत विश्लेषण

Primary Evidence & Secondary Evidence under the Indian Evidence Act, 1872 — एक विस्तृत अध्ययन

भूमिका

        भारतीय न्यायिक प्रणाली में साक्ष्य (Evidence) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यायालय का निर्णय मुख्यतः उन तथ्यों पर आधारित होता है जो विश्वसनीय, प्रमाणिक और क़ानूनी रूप से स्वीकार्य हों। इस संदर्भ में Primary Evidence और Secondary Evidence दो प्रमुख श्रेणियाँ हैं जिनका उल्लेख क्रमशः धारा 62 और धारा 63 में किया गया है।

       न्यायिक प्रक्रियाओं में यह प्रश्न अक्सर उठता है कि कौन सा दस्तावेज़ मूल (Original) माना जाएगा, कब उसकी प्रति (Copy) स्वीकार की जा सकती है, किन परिस्थितियों में द्वितीयक साक्ष्य अस्वीकार्य माना जाता है, और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (Electronic Evidence) की क्या स्थिति है।

      इस लेख में हम Primary Evidence और Secondary Evidence के प्रत्येक पहलू का गहन, सरल और व्यावहारिक विश्लेषण करेंगे।


भाग–1 : Primary Evidence (धारा 62)

Primary Evidence की परिभाषा

धारा 62 के अनुसार—

“Primary evidence means the document itself produced for the inspection of the Court.”

अर्थात—

मूल दस्तावेज़ ही प्राथमिक साक्ष्य है। जिस दस्तावेज़ पर अधिकार/अधिनियम/व्यवहार आधारित है, वही न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए।


Primary Evidence के प्रमुख उदाहरण

  1. मूल बिक्री विलेख (Original Sale Deed)
  2. मूल समझौता (Original Agreement)
  3. मूल चेक या प्रॉमिसरी नोट
  4. मूल CCTV फाइल/डिवाइस (DVR, Hard Disk)
  5. डिजिटल फोटोग्राफ का मूल फाइल (RAW File, SD Card)
  6. मूल हस्तलिखित चिट्ठी, नोट, या डायरी
  7. Original Medical Report या Lab Report

Primary Evidence स्वीकार क्यों किया जाता है?

क्योंकि—

  • यह सबसे विश्वसनीय साक्ष्य है
  • इसमें किसी प्रकार की छेड़छाड़ की संभावना बहुत कम
  • साक्ष्य अधिनियम का मूल सिद्धांत है—Best Evidence Rule
  • न्यायालय को मूल दस्तावेज़ देखकर ही उसकी प्रामाणिकता तय करने का अवसर मिलता है

इसलिए—

Primary Evidence हमेशा स्वीकार्य होता है।


Primary Evidence कब स्वीकार नहीं किया जाता?

यद्यपि यह सर्वोत्तम साक्ष्य है, फिर भी निम्न परिस्थितियों में अदालत इसे अस्वीकार कर सकती है—

1. दस्तावेज़ से छेड़छाड़ (Tampering or Alteration)

यदि दस्तावेज़ पर—

  • ओवरराइटिंग
  • कटिंग
  • मिटाया हुआ हिस्सा
  • जोड़-तोड़ (manipulation)

जैसे लक्षण दिखाई दें तो इसे अस्वीकार किया जा सकता है।

2. दस्तावेज़ जाली या फर्जी हो

यदि—

  • हस्ताक्षर नकली हों
  • स्टाम्प गलत हो
  • दस्तावेज़ बोगस लगे

तो न्यायालय साक्ष्य को स्वीकार नहीं करेगा।

3. दस्तावेज़ कानूनी रूप से पंजीकृत होना चाहिए था, पर नहीं है

उदा.—
25 लाख की बिक्री विलेख अनपंजीकृत है
→ तब यह बतौर साक्ष्य स्वीकार नहीं किया जाएगा।

4. दस्तावेज़ अप्रासंगिक (Irrelevant) हो

यदि कोर्ट के सामने प्रस्तुत दस्तावेज़ का मामले से कोई सम्बन्ध ही नहीं है, तो वह primary evidence होते हुए भी inadmissible हो सकता है।


भाग–2 : Secondary Evidence (धारा 63)

Secondary Evidence की परिभाषा

धारा 63 के अनुसार—
जब मूल दस्तावेज़ उपलब्ध न हो, तब उसकी प्रतिलिपि या वैकल्पिक रूप को द्वितीयक साक्ष्य माना जाता है।

Secondary Evidence का अर्थ है—

“Original के बदले प्रस्तुत की गई प्रति या substitute।”


Secondary Evidence के प्रमुख उदाहरण

  1. फोटोकॉपी या Xerox
  2. टाइप की हुई कॉपी
  3. Photograph of the document
  4. Certified Copy (जैसे—Registry की नकल)
  5. WhatsApp Screenshot (65B Certificate के साथ)
  6. Email printout (with 65B certificate)
  7. Computer output (PDF, printout)

Secondary Evidence कब स्वीकार योग्य (Admissible) है?

Secondary Evidence एक अधिकार नहीं है—बल्कि एक ‘अपवाद’ है।
इसे तभी स्वीकार किया जाता है जब मूल दस्तावेज़ न्यायालय में प्रस्तुत न किए जाने का कोई उचित कारण हो।

अदालत निम्न स्थितियों में Secondary Evidence स्वीकार कर सकती है—


1. जब मूल दस्तावेज़ खो गया हो या मिल नहीं रहा हो

लेकिन—
पार्टियों को यह साबित करना होगा कि—

  • दस्तावेज़ गुम हो गया
  • खोजने की कोशिश की
  • पर नहीं मिला

प्रयास का प्रमाण अनिवार्य है।


2. जब मूल दस्तावेज़ विरोधी पक्ष के पास हो और नोटिस देने पर भी प्रस्तुत न करे

Evidence Act की धारा 66 के तहत notice देना आवश्यक है।

उदा.—
यदि मकान का original rent agreement मकान मालिक के पास है और किरायेदार Notice देने के बाद उसकी कॉपी लाता है → स्वीकार योग्य है।


3. जब मूल दस्तावेज़ न्यायालय या सरकारी कार्यालय के पास हो

ऐसी स्थिति में Certified Copy प्रस्तुत की जा सकती है।


4. जब मूल दस्तावेज़ किसी की अवैध कब्जे में हो

तब Secondary Evidence स्वीकार है।


5. जब मूल डिजिटल दस्तावेज़ हो (Electronic Record)

Digital data का primary source—

  • Hard disk
  • Pen drive
  • Server
  • Mobile phone

होता है।

Secondary Evidence तब स्वीकार है जब 65B Certificate संलग्न हो।


Secondary Evidence कब अस्वीकार्य है?

1. मूल दस्तावेज़ उपलब्ध है पर प्रस्तुत नहीं किया गया

यदि मूल मौजूद है और फिर भी प्रति दी जा रही है → अस्वीकार्य।


2. मूल के अस्तित्व या हानि का प्रमाण नहीं दिया गया

न्यायालय को संतुष्ट करना अनिवार्य है कि—

  • original था
  • अब उपलब्ध नहीं है
  • उसे खोजने के प्रयास किए गए

3. कॉपी संदिग्ध (Suspicious) हो

  • धुंधली फोटोकॉपी
  • editing के संकेत
  • कटिंग-पेस्टिंग
  • duplicate या manipulated copy

ऐसी स्थिति में Secondary Evidence अस्वीकार की जाएगी।


4. Notice न दिया गया हो (धारा 66)

यदि प्रतिवादी के पास original था और notice नहीं दिया गया → Secondary Evidence inadmissible।


5. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य बिना 65B सर्टिफिकेट

यह सबसे महत्वपूर्ण और सामान्य समस्या है।

CCTV footage, WhatsApp messages, Email, Video, Audio—

बिना 65B Certificate = स्वीकार नहीं।**

यह Supreme Court के निर्णय Anvar P.V. v. P.K. Basheer (2014) में स्पष्ट हुआ है।


Primary और Secondary Evidence का तुलनात्मक अध्ययन

आधार Primary Evidence Secondary Evidence
परिभाषा मूल दस्तावेज़ मूल की प्रति या विकल्प
धारा 62 63
विश्वसनीयता सर्वोच्च (Best Evidence) तुलनात्मक रूप से कम
स्वीकार्यता हमेशा स्वीकार परिस्थितियों पर निर्भर
आवश्यक शर्त कोई नहीं मूल के अभाव का प्रमाण
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मूल device ही primary 65B certificate से secondary

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पर विशेष चर्चा : CCTV, WhatsApp, Email

Electronic Evidence = Special Category evidence

इसमें primary और secondary का अंतर इस प्रकार है—

Primary : actual device

  • DVR
  • Mobile
  • Server storage
  • Laptop

Secondary : output (copy)

  • WhatsApp screenshot
  • CCTV clip का pendrive copy
  • Email printout

इनको स्वीकार करने के लिए अनिवार्य है—

65B Certificate (धारा 65B(4))

जिसमें यह उल्लेख हो—

  • device किसकी custody में था
  • किस process से copy बनाई
  • copy accurate है
  • कोई manipulation नहीं हुई

बिना 65B → Secondary Evidence अस्वीकार्य।


अदालतों के महत्वपूर्ण निर्णय

1. Anvar P.V. v. P.K. Basheer (2014)

– इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए 65B Certificate अनिवार्य

2. Shafhi Mohammad v. State of Himachal Pradesh (2018)

– यदि original device प्रस्तुत हो, तब 65B जरूरी नहीं

3. Arjun Panditrao Khotkar v. Kailash Kushanrao (2020)

– 65B certificate का नियम पुनः मजबूती से लागू


व्यावहारिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बातें

Primary Evidence हमेशा प्राथमिकता रखता है

कोर्ट कभी भी copy की तुलना में original को प्राथमिकता देगा।

Secondary Evidence एक अपवाद है—अधिकार नहीं

इसका उपयोग सिर्फ तभी जब original उपलब्ध न हो।

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य में सावधानी

बिना 65B certificate लगभग 90% मामलों में साक्ष्य अस्वीकार हो जाता है।

Tampering का slightest doubt भी copy को अस्वीकार कर देता है।


निष्कर्ष

Primary Evidence और Secondary Evidence के सिद्धांत न्यायिक प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जहाँ Primary Evidence सर्वोत्तम साक्ष्य माना जाता है और सामान्य रूप से स्वीकार्य होता है, वहीं Secondary Evidence की स्वीकार्यता विशेष परिस्थितियों और कानूनी शर्तों पर निर्भर करती है।

विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के संदर्भ में Section 65B का कठोर पालन अनिवार्य है। यह नियम न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता, प्रमाणिकता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करता है।

इस लेख का सार यह है—


Primary Evidence = सर्वोत्तम साक्ष्य, हमेशा स्वीकार

Secondary Evidence = अपवादस्वरूप स्वीकार, उचित कारण और प्रमाण आवश्यक

Electronic Evidence = 65B certificate अनिवार्य

Tampered, forged या suspicious दस्तावेज़ = inadmissible