“राज्यपाल विधेयक को बिना लौटाए लंबित नहीं रख सकते : संघवाद के विरुद्ध ऐसी ‘जेब में रखने’ की शक्ति – राष्ट्रपति संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक मत”
परिचय
भारत का संवैधानिक ढांचा संघीय शासन पर आधारित है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों को स्वतंत्र शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। किंतु लंबे समय से यह विवाद बना हुआ था कि क्या राज्यपाल किसी विधेयक को अनिश्चितकाल के लिए अपने पास रोककर रख सकते हैं, बिना उसे स्वीकृत किए या अस्वीकृत किए अथवा राष्ट्रपति के पास भेजे? इस प्रश्न के गंभीर संवैधानिक प्रभाव थे—क्योंकि यदि राज्यपाल ऐसा कर सकें तो यह राज्य विधानमंडलों की विधायी शक्ति को निष्प्रभावी करने वाला कदम माना जाता।
यही मुद्दा सरकार द्वारा राष्ट्रपति के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट को भेजे गए एक महत्वपूर्ण संविधान-पीठ संदर्भ में उठा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक मत में स्पष्ट कर दिया कि राज्यपाल विधेयक को ‘जेब में’ नहीं रख सकते, और यह कि किसी भी विधेयक पर उन्हें उचित समय के भीतर निर्णय लेना ही होगा। अदालत ने यह भी कहा कि विधेयक को बिना लौटाए लंबे समय तक रोककर रखना संघवाद तथा लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रतिकूल है।
राष्ट्रपति संदर्भ क्या था?
राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट से यह प्रश्न पूछा कि—
- क्या राज्यपाल किसी विधेयक को अनिश्चितकाल तक लंबित रख सकते हैं?
- क्या ‘विचार हेतु लौटाने’ के बजाय विधेयक को रोक कर रखना संवैधानिक रूप से वैध है?
- क्या राज्यपाल के पास कोई ‘नकारात्मक अधिकार’ (negative veto) है, जिससे वे विधायी प्रक्रिया को रोक सकें?
इन प्रश्नों का उत्तर आवश्यक था क्योंकि कई राज्यों में राज्यपालों द्वारा लंबे समय तक विधेयकों पर निर्णय न लेने से शासन में टकराव उत्पन्न हो रहा था। इससे न केवल विधायी प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी, बल्कि निर्वाचित सरकार की नीतियों का क्रियान्वयन भी अवरुद्ध हो रहा था।
सुप्रीम कोर्ट का गठन और सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में पाँच-न्यायाधीशीय संविधान पीठ ने इस संदर्भ पर विस्तृत सुनवाई की। कोर्ट ने ऐतिहासिक संविधान निर्माण सामग्री, संविधान सभा बहस, पूर्ववर्ती निर्णय, संघवाद की अवधारणा और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का सूक्ष्म अध्ययन किया।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति को अपना विस्तृत और ऐतिहासिक मत सौंपा, जिसमें संविधानिक प्रक्रिया की स्पष्ट व्याख्या की गई।
मुख्य प्रश्न : क्या राज्यपाल विधेयक को अनिश्चितकाल तक रख सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा—नहीं। यह न तो संविधान की मंशा है, न लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुकूल, और न ही संघीय ढांचे के अनुरूप।
कोर्ट के तर्क :
- अनुच्छेद 200 राज्यपाल को तीन विकल्प देता है—
(a) स्वीकृति देना
(b) स्वीकृति रोकना
(c) पुनर्विचार हेतु विधानमंडल को लौटानालेकिन इसमें कहीं भी ‘अनिश्चितकाल के लिए रोककर रखना’ जैसी कोई चौथी शक्ति नहीं दी गई है।
- संविधान मौन है, पर मौन का अर्थ शक्ति नहीं होता।
कोर्ट ने कहा कि जहां संविधान किसी संवैधानिक अधिकारी को स्पष्ट रूप से अधिकार नहीं देता, वहां उस अधिकार का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। - लोकतंत्र में निर्वाचित निकाय सर्वोपरि है।
विधानमंडल जनता द्वारा चुना गया संस्थान है; राज्यपाल नियुक्त अधिकारी हैं। इसलिए लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुसार राज्यपाल का दायित्व विधायी प्रक्रिया को सुचारु बनाना है, बाधा उत्पन्न करना नहीं। - संघवाद का सम्मान अनिवार्य है।
यदि राज्यपाल विधेयक को अनिश्चितकाल रख सकें, तो राज्य विधानमंडल की शक्ति दब जाएगी और यह केंद्र द्वारा राज्य शासन पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण जैसा होगा। - उचित समय (reasonable time) में निर्णय लेना अनिवार्य।
कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल का दायित्व है कि वे ‘उचित समय’ के भीतर हस्ताक्षर करें, अस्वीकृत करें या पुनर्विचार हेतु लौटाएँ।
‘जेब में रखना’ (Pocket Veto) क्यों असंवैधानिक?
कुछ विशेषज्ञ इसे अमेरिका के राष्ट्रपति के ‘पॉकेट वीटो’ से तुलना करते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान ने ऐसा कोई प्रावधान नहीं बनाया।
कोर्ट ने कहा कि ‘जेब में रखना’ कई तरह से हानिकारक है—
- विधायी प्रक्रिया ठप पड़ जाती है।
सरकार द्वारा लाए गए जनकल्याणकारी विधेयक लागू नहीं हो पाते। - राज्य की नीतियों पर रोक लग जाती है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय शासन, कृषि एवं सामाजिक कल्याण से जुड़े विधेयक अधर में लटक जाते हैं। - असंतुलित शासन और राजनीतिक टकराव उत्पन्न होता है।
राज्यपाल का इस प्रकार विधेयक रोकना, केंद्र और राज्य के बीच टकराव को बढ़ाता है। - संघवाद कमजोर होता है।
न्यायालय ने कहा कि भारत सहकारी संघवाद पर आधारित है और ऐसा अधिकार संघवाद की मूल अवधारणा को चोट पहुँचाता है।
क्या राज्यपाल विधेयक को ‘दूसरी बार’ भी रोक सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—
- यदि राज्यपाल ने विधेयक को पुनर्विचार हेतु लौटा दिया और विधानमंडल ने पुनः उसे पारित कर भेजा,
- तो राज्यपाल के पास कोई विकल्प नहीं—उन्हें स्वीकृति देनी ही होगी।
इस स्थिति में राज्यपाल विधेयक को फिर से रोक या लौटाने का अधिकार नहीं रखते। यह लोकतांत्रिक संतुलन का प्रतीक है।
विधेयक लौटाने की समयसीमा क्या है?
हालाँकि संविधान कोई स्पष्ट समय सीमा नहीं देता, परंतु सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—
- “उचित समय” का अर्थ है तर्कसंगत, अनुचित विलंब से मुक्त, और विधायी प्रक्रिया को बाधित न करने वाला समय।
- न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि राज्यपाल महीनों तक विधेयक रोक कर रखते हैं, तो यह ‘उचित समय’ नहीं माना जाएगा।
इससे स्पष्ट है कि अब राज्यपाल अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा कराने की स्थिति में नहीं रहेंगे।
संघवाद और लोकतंत्र पर सुप्रीम कोर्ट का प्रखर मत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि—
- संविधान का पूरा ढांचा ‘संतुलन’ पर आधारित है।
केंद्र और राज्य दोनों के अधिकार अलग-अलग हैं और एक-दूसरे का सम्मान करना आवश्यक है। - राज्यपाल का पद राजनीतिक हस्तक्षेप का माध्यम नहीं।
अदालत ने कहा कि राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख हैं, न कि राजनैतिक निर्णय लेने वाले। - लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा सर्वोपरि।
अदालत ने चेतावनी दी कि ऐसी शक्तियाँ यदि अनियंत्रित रूप से प्रयोग की जाएँ, तो जनता के प्रतिनिधियों की भूमिका समाप्त हो जाएगी।
निर्णय के प्रभाव और महत्व
1. राज्यों में लंबित विधेयकों की राह साफ
कई राज्यों, जैसे—तमिलनाडु, पंजाब, केरल, तेलंगाना आदि—में राज्यपाल और सरकार के बीच विधेयकों को लेकर टकराव जारी था। यह निर्णय अब उन विधेयकों पर तत्काल असर डालेगा।
2. निर्वाचित सरकारों की शक्ति मजबूत हुई
कोर्ट के निर्णय से स्पष्ट हुआ कि राज्यपाल सरकार के निर्णयों को रोक नहीं सकते। इसका अर्थ है कि लोकतांत्रिक शासन और विधायी प्रक्रियाएँ सशक्त होंगी।
3. राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका का दायरा तय
अब राज्यपाल के दायित्वों की सीमाएँ स्पष्ट हो गई हैं। वे अब विधेयक को रोककर राजनीतिक दबाव का साधन नहीं बना सकते।
4. संवैधानिक टकराव में कमी
यह निर्णय केंद्र–राज्य संबंधों को संतुलित करेगा और बार-बार होने वाले विवादों को कम करेगा।
निष्कर्ष : लोकतंत्र और संघवाद की विजय
सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक मत भारतीय लोकतंत्र के लिए मील का पत्थर है। इसमें न सिर्फ संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या की गई, बल्कि लोकतंत्र और संघवाद की भावना को सर्वोपरि माना गया।
कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि—
- राज्यपाल विधेयक को ‘जेब में’ नहीं रख सकते।
- उन्हें उचित समय में निर्णय लेना होगा।
- बिना लौटाए विधेयक रोकना संघवाद के विरुद्ध है।
यह निर्णय न सिर्फ राज्य सरकारों के लिए राहत है, बल्कि भारतीय संविधान की मूल भावना—लोकतंत्र, संघवाद और जन-संप्रभुता—की भी पुष्टि करता है।