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अरावली में नई खनन लीज़ पर रोक: वैज्ञानिक मैपिंग के बिना खनन नहीं — सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को टिकाऊ खनन योजना तैयार करने का निर्देश दिया

अरावली में नई खनन लीज़ पर रोक: वैज्ञानिक मैपिंग के बिना खनन नहीं — सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को टिकाऊ खनन योजना तैयार करने का निर्देश दिया

       भारत के पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में सुप्रीम कोर्ट का हर निर्णय एक महत्वपूर्ण मोड़ बन जाता है, विशेषकर तब जब मामला पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़ा हो। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला में नई खनन लीज़ों (Mining Leases) पर रोक लगाते हुए एक ऐतिहासिक आदेश पारित किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक संपूर्ण अरावली क्षेत्र की वैज्ञानिक मैपिंग (Scientific Mapping) नहीं हो जाती और सतत व पर्यावरण-अनुकूल खनन योजना (Sustainable Mining Plan) तैयार नहीं की जाती, तब तक किसी प्रकार की नई खनन लीज़ जारी नहीं की जा सकती।

       यह आदेश न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि देश की विकास परियोजनाएँ प्राकृतिक संतुलन के साथ चलें। यह लेख इस फैसले की पृष्ठभूमि, इसके कानूनी पहलुओं, पर्यावरणीय प्रभावों, सरकार हेतु जारी निर्देशों तथा भविष्य पर इसके संभावित परिणामों की विस्तृत विवेचना करता है।


1. अरावली पर्वतमाला का पर्यावरणीय महत्व

       अरावली भारत की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है, जिसका विस्तार राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली तक फैला हुआ है। यह क्षेत्र—

  • उत्तरी भारत के तापमान को संतुलित करता है
  • राजस्थान से आने वाली मरुस्थलीय हवाओं को रोकता है
  • भू-जल संरक्षण में सहायक है
  • कई वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास है
  • दिल्ली-एनसीआर को धूल प्रदूषण से बचाता है

पिछले कई दशकों से खनन, अवैध खनन, अतिक्रमण, तथा अनियोजित कंस्ट्रक्शन ने अरावली की संरचना को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अरावली का 30% से अधिक क्षेत्र नष्ट हो चुका है, और कई जगहों पर पर्वत कटकर मैदान में बदल गए हैं।


2. सुप्रीम कोर्ट में मामला कैसे आया?

पर्यावरण कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं और कुछ सामाजिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि—

  • अरावली में अनियंत्रित खनन जारी है
  • वन क्षेत्र लगातार सिमट रहा है
  • भू-जल स्तर तेजी से गिर रहा है
  • सुरक्षित क्षेत्र (Notified Areas) की सही सीमाएँ स्पष्ट नहीं हैं
  • मौजूदा मानचित्र पुराने और अपूर्ण हैं

याचिकाओं में यह भी कहा गया कि राज्य सरकारें, विशेषकर हरियाणा व राजस्थान, ने कई स्थानों पर खनन परियोजनाओं को स्वीकृति दी, जबकि उन क्षेत्रों की पर्यावरणीय संवेदनशीलता का कोई वैज्ञानिक आकलन नहीं किया गया।


3. सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कई महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट कीं—

(A) वैज्ञानिक मैपिंग अनिवार्य

कोर्ट ने कहा कि वर्तमान में उपलब्ध मैपिंग अधूरी है। सरकार को डिजिटल, GIS-आधारित, सैटेलाइट सहायता प्राप्त वैज्ञानिक मैपिंग तैयार करनी होगी, जिसमें—

  • पर्वतों की ऊँचाई
  • वन क्षेत्र
  • भू-जल स्थिति
  • पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र (ESZ)
  • अवैध खनन प्रभावित ज़ोन

की सटीक पहचान शामिल हो।

(B) पर्यावरण-अनुकूल खनन योजना आवश्यक

कोर्ट ने निर्देश दिया कि केंद्र सरकार एक व्यापक Sustainable Mining Plan तैयार करे, जो यह सुनिश्चित करे कि—

  • खनन से पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान हो
  • पुनर्वास और पुनर्स्थापन (Rehabilitation & Reclamation) वैज्ञानिक ढंग से हो
  • खनिज संसाधनों का उपयोग टिकाऊ रूप से किया जाए

(C) नई खनन लीज़ पर पूर्ण रोक

जब तक उपरोक्त दोनों प्रक्रियाएँ पूरी नहीं होतीं—

कोई नई लीज़ न दी जाए, न ही नवीनीकरण किया जाए।


4. केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि—

  • केंद्र सरकार मैपिंग और योजना तैयार करेगी
  • राज्य सरकारें उस योजना का पालन करेंगी
  • अवैध खनन रोकने के लिए संयुक्त निगरानी तंत्र बनेगा
  • जिला स्तर पर पर्यावरण निगरानी समितियाँ बनाई जाएँ

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि सरकारें इस दिशा में त्वरित कदम नहीं उठातीं, तो यह सीधे-सीधे पर्यावरणीय और संवैधानिक कर्तव्यों का उल्लंघन माना जाएगा।


5. वैज्ञानिक मैपिंग क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में कई क्षेत्रों में खनन बिना वैज्ञानिक डेटा के किया जाता रहा है, जिसके परिणामस्वरूप—

  • पर्वतों का कटाव
  • जमीन का धंसना
  • भू-जल प्रदूषण
  • धूल प्रदूषण
  • पारिस्थितिक तंत्र का विनाश

जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं।

वैज्ञानिक मैपिंग—

  • वास्तविक भूगोल दिखाती है
  • खनन योग्य क्षेत्र और गैर-खनन योग्य क्षेत्र स्पष्ट करती है
  • पर्यावरणीय वहन क्षमता (Carrying Capacity) को चिन्हित करती है
  • कानून के पालन को आसान बनाती है

अरावली जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह अत्यंत आवश्यक है।


6. सतत खनन योजना (Sustainable Mining Plan) क्या है?

इस योजना में शामिल होगा—

1. पर्यावरणीय आकलन

खनन से पहले यह अध्ययन कि—

  • वायु प्रदूषण कितना बढ़ेगा
  • वन क्षेत्र कितना प्रभावित होगा
  • पानी की उपलब्धता पर क्या असर पड़ेगा

2. कुओं व जलस्रोतों पर प्रभाव विश्लेषण

अरावली बारिश के पानी को जमीन में भेजने का बड़ा माध्यम है; अतः इसका वैज्ञानिक प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है।

3. पुनर्स्थापन (Reclamation) प्रक्रिया

खनन समाप्त होने के बाद—

  • गड्ढों को भरना
  • वृक्षारोपण
  • जैव विविधता की वापसी

पर फोकस होता है।

4. स्थानीय समुदायों का संरक्षण

खनन से प्रभावित ग्रामीणों के—

  • जीवन निर्वाह
  • रोजगार
  • स्वास्थ्य
  • कृषि

का ध्यान रखते हुए योजना बनाई जाएगी।


7. आदेश का कानूनी महत्व

इस आदेश से कई संवैधानिक सिद्धांत मजबूत होते हैं—

(A) अनुच्छेद 21 — स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट लगातार कहता आया है कि स्वच्छ व स्वस्थ पर्यावरण मौलिक अधिकार है।

(B) Public Trust Doctrine

सरकार प्राकृतिक संसाधनों की ‘ट्रस्टी’ है, मालिक नहीं।

(C) सतत विकास (Sustainable Development)

कोर्ट ने यह फिर दोहराया कि—

“विकास आवश्यक है, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं।”

(D) Precautionary Principle

जहाँ वैज्ञानिक डेटा उपलब्ध न हो, वहाँ सावधानी सर्वोपरि है।


8. अरावली में खनन से होने वाले नुकसान

अरावली का लगातार विनाश इस कारण से चिंताजनक है—

  • दिल्ली-एनसीआर में धूल प्रदूषण बढ़ता है
  • गर्मी का स्तर 2–3 डिग्री तक बढ़ जाता है
  • मानसून पैटर्न प्रभावित होता है
  • भू-जल तेजी से नीचे जाता है
  • जंगलों का क्षेत्र घटता जाता है
  • वन्यजीवों का प्रवास बाधित होता है

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अरावली पूरी तरह समाप्त हो गई, तो उत्तर भारत में मरुस्थलीकरण (Desertification) की प्रक्रिया तेज़ हो जाएगी।


9. भविष्य पर प्रभाव

(A) अवैध खनन पर सख्ती

अब नई लीज़ पर रोक के बाद अवैध खनन करने वालों पर कार्रवाई और भी कड़ी होगी।

(B) उद्योगों पर प्रभाव

खनन से जुड़े उद्योग—

  • स्टोन क्रशर
  • कंस्ट्रक्शन सेक्टर
  • बिल्डिंग मैटेरियल सप्लाई

पर अस्थायी प्रभाव पड़ेगा, लेकिन दीर्घकाल में यह पर्यावरण संरक्षण के लिए अनिवार्य है।

(C) राज्य सरकारों पर दबाव

राज्यों को अब—

  • सटीक मैपिंग
  • GIS डेटा
  • पर्यावरणीय योजना

जल्द तैयार करनी होगी।


10. यह आदेश क्यों ऐतिहासिक है?

  • पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने वैज्ञानिक मैपिंग को खनन की पूर्व शर्त बनाया
  • अरावली जैसे संवेदनशील क्षेत्र को विशेष सुरक्षा प्रदान की
  • राज्य सरकारों पर स्पष्ट जिम्मेदारियाँ डाली
  • ‘पहले पर्यावरण – फिर खनन’ का सिद्धांत मजबूत किया

11. निष्कर्ष

        सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारत में पर्यावरण शासन (Environmental Governance) को नए आयाम प्रदान करता है। अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, जल, वायु और पारिस्थितिकी की सुरक्षा का आधार है। वैज्ञानिक मैपिंग और सतत खनन योजना अनिवार्य कर कोर्ट ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि विकास तभी स्वीकार्य है जब वह भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

      यह आदेश न केवल वर्तमान पर्यावरण संकट का समाधान प्रदान करता है बल्कि भारत में खनन नीति को नए मानकों के अनुरूप ढालने की दिशा में भी एक निर्णायक कदम है।

       अब यह केंद्र और राज्यों की जिम्मेदारी है कि वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए अरावली को संरक्षित करें और विकास एवं पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करें।