सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली वायु-प्रदूषण मामले की सुनवाई नवंबर 17 तक टाली; पंजाब एवं हरियाणा से पड़ीरोली/पराली जलाने पर विस्तृत रिपोर्ट तलब
प्रस्तावना
Supreme Court of India (SC) ने हाल ही में Delhi‑NCR में बढ़ते वायु-प्रदूषण की समस्या को लेकर एक सुनवाई टालते हुए यह निर्देश दिया है कि आगे की सुनवाई 17 नवंबर 2025 को होगी। साथ ही, पंजाब एवं हरियाणा सरकारों को निर्देश दिया गया है कि वे खेतों में पराली (स्टब्बल) जलाने की प्रवृत्ति व उसके निवारक उपायों पर विस्तृत स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करें। यह कदम राजधानी व आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर नियंत्रण से बाहर होने की चेतावनी के बीच उठाया गया है।
नीचे इस खबर की पृष्ठभूमि, सुनवाई का सार, चुनौतियाँ, भूमिका निभा रहे पक्ष, तथा आगे क्या-क्या देखने योग्य है, विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।
पृष्ठभूमि: प्रदूषण की बढ़ती भयावहता
दिल्ली व एनसीआर क्षेत्र में शीत ऋतु की शुरुआत और उसके बाद स्थिर वायु-परिस्थितियों के कारण वायु गुणवत्ता तेजी से बिगड़ जाती है। इस वर्ष भी ऐसा ही दृश्य सामने आया है।
विशेष रूप से, खेतों की कटाई के बाद पराली जलाना एक महत्वपूर्ण कारण बना है।
SC को बताया गया कि पंजाब एवं हरियाणा में इस गतिविधि को “अनियंत्रित रूप से” किया जा रहा है, जिससे दिल्ली-एनसीआर का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) बहुत तेजी से खराब हो रहा है।
साथ ही, सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि राजधानी में वायु-मापन स्टेशन बंद पाए गए, डेटा में विसंगतियाँ हैं, व निर्माण-कार्य जारी है, जबकि स्थिति गंभीर हो चुकी है।
इसलिए, न्यायालय ने इस समस्या को ‘तत्काल’ और ‘सख्त’ उपायों के बिना अब पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जाना संभव नहीं माना है।
सुनवाई का सार और कोर्ट का निर्देश
- जब इस मामले की सुनवाई हुई, तो चीफ जस्टिस B.R. Gavai व जस्टिस K. Vinod Chandran की बेंच ने भूमिका निभाई।
- कोर्ट ने कहा कि पंजाब और हरियाणा की सरकारें यह बताएँ कि उन्होंने पराली जलाने पर क्या-क्या कदम उठाए हैं, कितने मामले दर्ज हुए, क्या मशीनरी उपलब्ध कराई गई, क्या विकल्प दिए गए, आदि।
- सुना गया कि राजधानी में कुछ स्थानों पर AQI 450 से ऊपर पहुँच चुका है और अभी भी निर्माण कार्य चल रहा है, जो वायु गुणवत्ता को और बिगाड़ने वाला है।
- सुनवाई को तत्काल लेने की माँग हुई थी (कल सुना जाए) लेकिन बेंच ने कहा कि अगले सोमवार अर्थात 17 नवंबर को सुनवाई होगी।
महत्वपूर्ण बिंदु एवं चुनौतियाँ
1. पराली जलाने की समस्या
- पंजाब-हरियाणा में खेतों की कटाई के बाद पराली बचे रहने पर किसान अक्सर उसे जलाकर भूमि त्वरित रूप से तैयार करते हैं। यह प्रक्रिया बहुत तेजी से वायु में धुआँ छोड़ती है।
- सुनवाई में यह बात उठी कि कभी-कभी किसान उपग्रह से समय मिलाकर पराली जलाते हैं (उपग्रह गुजरने के बाद) ताकि पकड़े न जाएँ। अमरीकी उपग्रह तकनीक का हवाला दिया गया।
- पराली जलाने को नियंत्रित करने के लिए मशीनरी, फार्म-मशीनों की आवश्यकता है, किन्तु त्वरित व्यवहार्य विकल्प का अभाव है।
2. वायु-मापन व डेटाविश्वसनीयता
- सुनवाई में बताया गया कि दिल्ली-एनसीआर में कई एयर मॉनिटरिंग स्टेशन बंद थे, जिससे वास्तविक स्थिति का आकलन प्रभावित हुआ।
- कोर्ट ने डेटा की सत्यता पर सवाल उठाए — यदि डेटा गलत/संशोधित है, तो नीति निर्धारण में बड़ी समस्या होगी।
3. लागू नीतियाँ: GRAP आदि
- राजधानी में Graded Response Action Plan (GRAP) के तहत विभिन्न चरण लागू होते हैं — जैसे GRAP III (मध्यम-गंभीर) से GRAP IV (सर्वाधिक) तक। सुनवाई में कहा गया कि वर्तमान स्थिति GRAP III से ऊपर है और GRAP IV लागू किया जाना चाहिए।
- हालांकि, न्यायालय ने यह संकेत दिया कि नीतियों के क्रियान्वयन में देरी व लापरवाही दिख रही है।
4. जिम्मेदारी-वितरण
- राज्य सरकारें (पंजाब, हरियाणा) तथा केंद्र/एनसीआर एजेंसियाँ (जैसे Commission for Air Quality Management) सभी मिलकर काम करें, लेकिन सुनवाई में बताया गया कि राज्य स्तर पर निर्देशों का पालन नहीं हो रहा।
- कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि हालात ऐसे ही जारी रहे, तो अधिक सख्त पाबंदियाँ व दंडात्मक उपाय ग्रहण किए जाएंगे।
न्यायालय के निर्देश का महत्व
- सुनवाई को टालने की वजह यह है कि राज्य सरकारों को रिपोर्ट प्रस्तुत करने का समय दिया गया है, ताकि अगले चरण में सूचित निर्णय लिया जा सके।
- इसकी वजह से यह स्पष्ट हुआ कि सूचना-संग्रह, स्थिति-मूल्यांकन व आगे की रणनीति 마련 न करना अब स्वीकार्य नहीं है।
- न्यायालय ने संकेत दिया है कि समस्या केवल दिल्ली-एनसीआर की नहीं बल्कि समग्र रूप से किसानों, कृषि-प्रक्रिया, राज्य-नीति और मोनिटरिंग तंत्र की है — अतः व्यापक दृष्टिकोण आवश्यक है।
- यह भी संकेत है कि यदि रिपोर्ट संतोषजनक नहीं हुई, तो न्यायालय सक्रिय हस्तक्षेप कर सकती है, चाहे वह निर्माण-कार्य रोकना हो, वाहन प्रतिबंध लगाना हो, या राज्य-कार्यों में दखल देना हो।
अगले चरण – क्या देखें?
- पंजाब एवं हरियाणा से रिपोर्ट: इन राज्यों को यह बताना होगा कि
- कितने किसान पराली जलाने के आरोप में पाए गए/प्रक्रिया-शुरू हुई?
- कितनी मशीनरी (स्टॉलर चॉपर, रोटीवेटर आदि) उपलब्ध कराई गई?
- कितने किसानों को विकल्प दिए गए (जैसे पराली-उपयोग, बायो-मास, कम्पोस्ट) ?
- क्या निरीक्षण व दंडात्मक कार्रवाई हुई?
- उपग्रह-मॉनिटरिंग व डेटा-प्रमाण का क्या परिणाम है?
- दिल्ली-एनसीआर में GRAP लागू करना: अगले सुनवाई में यह देखना होगा कि वास्तव में GRAP IV कब लागू होता है, और इसके तहत क्या-क्या प्रतिवाद / निषेध / रोकथाम की गई।
- मापन-इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति: कितने स्टेशन बंद थे, क्यों बंद थे, डेटा कितने विश्वसनीय है — यह मुख्य विषय होगा।
- निष्पादन-कारक (Implementation) पर ध्यान: नीति तो बनी है, लेकिन राज्य-मुआवजा, मशीनरी, लागत-वितान आदि में वास्तविक क्रियान्वयन कब और कैसे हुआ, यह अब परीक्षण में है।
- स्वास्थ्य-प्रभाव व सामाजिक जागरूकता: हवा की गुणवत्ता खराब होने पर लोगों की सेहत पर क्या असर पड़ रहा है — डॉक्टरों व स्वास्थ्य संस्थानों की रिपोर्ट भी न्यायालय को विचार करनी पड़ सकती है।
निष्कर्ष
दिल्ली-एनसीआर में वायु-प्रदूषण की समस्या किसी नए विषय नहीं है, लेकिन इस बार न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया है कि नीति मात्र पर्याप्त नहीं — क्रियान्वयन, दायित्व, डेटा-विश्वसनीयता और समय पर कार्रवाई आवश्यक है। पंजाब एवं हरियाणा में पराली जलाने जैसी पारंपरिक कृषि-प्रक्रियाओं को नियंत्रित न किया जाना अब सिर्फ पर्यावरण-विवाद नहीं, बल्कि न्यायशास्त्रीय मसला बन गया है।
17 नवंबर को अगली सुनवाई में ये देखने योग्य होगा कि रिपोर्ट कितनी संतोषजनक साबित होती है, क्या राज्य-सर्कारें पर्याप्त कदम उठा पाई हैं, और न्यायालय किन अतिरिक्त उपायों की मांग करेगी। अगर कार्रवाई नहीं हुई तो संभव है कि न्यायालय कठोर निर्देश दे — जैसे निर्माण-कार्य रोकना, भारी दंड लगाना, राज्य-अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराना।
इस समय, आम नागरिक के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण यह है कि अभी से ही प्रदूषण-रोकथाम के उपाय अपनाए जाएँ: बाहर धुएँ से बचाव (मास्क etc.), वाहन-उपयोग में कमी, पौधरोपण बढ़ाना तथा अभियान-सक्रियता बढ़ाना। इसी तरह न्यायालय-राज्य-सामुदायिक भागीदारी से ही इस व्यापक समस्या का समाधान संभव होगा।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।