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“सुप्रीम कोर्ट ने कहा : WHO एयर क्वालिटी गाइडलाइंस लागू करने की याचिका अब नहीं, तय तारीख पर सुनी जाएगी”

“सुप्रीम कोर्ट ने कहा : WHO एयर क्वालिटी गाइडलाइंस लागू करने की याचिका अब नहीं, तय तारीख पर सुनी जाएगी”


प्रस्तावना

      देश की राजधानी New Delhi एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्र (NCR) में वायु-प्रदूषण की समस्या प्रतिवर्ष गंभीर होती जा रही है। इस वर्ष भी जैसे ही ठंड बढ़ी और हवा चलनी कम हुई, जैसे ही पराली जलने और यातायात एवं निर्माण गतिविधियों का प्रभाव बढ़ा — वैसे ही वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) बेहद खतरनाक स्तर पर पहुँच गया। ऐसे समय में यह मामला और अधिक संवेदनशील हो गया कि एसिडिक‘स्मॉग’ या घने चेहरे पर छाए की तरह प्रदूषण ने स्वास्थ्य, जनजीवन और प्रशासनिक क्षमता – सभी को चुनौती दी।

उस संदर्भ में जब एक वकील ने अदालत में आवेदन कर “Commission for Air Quality Management in National Capital Region & Adjoining Areas (CAQM) एवं अन्य सामने” आग्रह किया कि WHO द्वारा निर्धारित वायु-गुणवत्ता दिशानिर्देशों को शीघ्र एवं क्रमबद्ध रूप से लागू किया जाए — तो Supreme Court of India (SC) ने उक्त आवेदन को तत्काल सूचीबद्ध (urgent listing) करने से मना कर दिया।

इस लेख में हम पहले मामले के तथ्यों, न्यायालय के विचार, वायु-गुणवत्ता का समग्र परिदृश्य, तथा आगे उठने वाले प्रश्न-चिन्हों का विश्लेषण करेंगे।


घटना-परिस्थिति

  1. शुक्रवार, 8 नवम्बर 2025 को आवेदनकर्त्ता ने एक अंतरिम आवेदन (interim application) दायर किया, जिसमें अनुरोध किया गया कि अदालत तत्काल सुनवाई करे और निर्देश दे कि WHO की एयर क्वालिटी गाइडलाइंस (AQG) को प्रमाणित तौर पर लागू किया जाए।
  2. इस आवेदन को मुख्य रूप से यह तर्क देकर प्रस्तुत किया गया कि दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है, एसियाई ठोस प्रदूषण एवं मौसमगत कारणों के साथ-साथ निर्माण, ट्रैफिक एवं कृषि-आग (पराली) से आने वाले प्रदूषक मिलकर गंभीर हालात बना रहे हैं।
  3. जब यह अनुरोध B. R. Gavai (मुख्य न्यायाधीश) की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ, तो उन्होंने इस तरह कहा कि — “यह आवश्यक नहीं है कि इस आवेदन को आज ही सुना जाए।”
  4. न्यायालय ने यह ध्यान दिलाया कि यह मामला पहले से ही 12 नवम्बर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है; अतः औचित्य नहीं कि इसे और शीघ्र लिस्ट किया जाए।
  5. इस संदर्भ में यह ध्यान देने योग्य है कि न्यायालय पहले भी दिल्ली-एनसीआर वायु-प्रदूषण के संबंध में सक्रिय रही है — जैसे GRAP (Graded Response Action Plan)-चरणों की सुनवाई, वायु-मापक यंत्रों की कार्य-स्थिति की जांच आदि।

WHO वायु-गुणवत्ता दिशानिर्देशों का महत्व

World Health Organization ने 2021 में अपने एयर क्वालिटी गाइडलाइंस (AQG) को अद्यतन किया, जिसमें बताया गया कि वायु में पीएम₂.₅ (PM₂.₅) और पीएम₁₀ (PM₁₀) तथा अन्य हानिकारक गैसों की मौजूदगी से कितनी स्वास्थ्य-हानि हो सकती है, और किन स्तरों पर उनकी सुरक्षित सीमा होनी चाहिए। (देश-विशेषानुसार सकारात्मक भूमिका के लिए)।

उदाहरणस्वरूप — यदि किसी क्षेत्र में पीएम₂.₅ का औसत सालाना स्तर WHO के सुझाव से बहुत ऊपर हो, तो वहाँ फेफड़े, हृदय, रक्त-प्रवाह के रोगों का जोखिम बढ़ जाता है। भारत समेत अनेक विकासशील देश इन सुझावों तक नहीं पहुँच पाए हैं। उदाहरण के लिए, एक रिपोर्ट से पता चला कि विश्व की केवल सात देश 2024 में WHO की एयर-गुणवत्ता मानकों को पूरा कर पाए।

इसलिए, WHO मानकों को लागू करना सिर्फ तकनीकी या शुद्ध रूप से वैज्ञानिक कदम नहीं है — बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, जीवन-उपयोग, आर्थिक- चिकित्सकीय बोझ, सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से भी एक बड़ी ज़रूरत बन चुका है।


दिल्ली-एनसीआर में वायु-प्रदूषण की वर्तमान स्थिति एवं चुनौतियाँ

a) वायु-गुणवत्ता का स्तर

दिल्ली-एनसीआर में इस सीजन में AQI लगातार “बहुत खराब” (Very Poor) या “गंभीर” (Severe) श्रेणियों में पहुंचा है। उदाहरण के लिए, कुछ वायु-मापक स्टेशन ने AQI 400 से ऊपर दर्ज किया।

b) स्रोत और कारण

  • पराली जलना (विशेषतः हरियाणा-पंजाब से)
  • निर्माण-कर्म एवं मिट्टी-धूल का उद्वमान
  • भारी संख्या में वाहन, पुराने डीजल इंजन, ट्रैफिक व ट्रकिंग गतिविधि
  • मौसमीय कारक जैसे वायु-स्थिरता, इन्वर्शन (inversion) स्थिति, कम हवा-गतिविधि
    ये मिलकर एक जटिल प्रदूषण-पटल बनाते हैं।

c) निगरानी-व्यवस्थाओं में खामियाँ

न्यायालय को इस संदर्भ में बताया गया कि दिल्ली में 37 वायु-मापक सिस्टम में से केवल 9 काम कर रहे थे। यह संकेत है कि डेटा-विसंगति और निगरानी अधूरी है — जिससे नीति-निर्माण व क्रियान्वयन में बाधा आती है।

d) नीतिगत-प्रतिक्रिया एवं GRAP-योजनाएं

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में Graded Response Action Plan (GRAP) के विभिन्न चरण (चरण-I से IV) लागू होते रहे हैं, जहाँ वायु गुणवत्ता बिगड़ने पर क्रमशः निर्माण-कार्यों पर प्रतिबंध, ट्रक-निषेध, स्कूल बंदी आदि उपाय उठाये जाते हैं।

हालाँकि, न्यायालय ने देखा कि GRAP-चरण-4 जैसी “आपातकालीन” स्थिति में अपेक्षित क्रियान्वयन नहीं हुआ।


अदालत ने आवेदन क्यों नहीं सूचीबद्ध किया?

न्यायालय का रुख, इस प्रकार समझा जा सकता है:

  • आवेदन अलग-संलग्न (independent) रूप से दायित्व तय करने का प्रयास कर रहा था, जबकि यह मामला पहले से ही उसी पीठ द्वारा विचाराधीन है — इसलिए तत्काल सूचीबद्ध की आवश्यकता नहीं देखी गई।
  • यह भी संकेत मिला कि पहले से उपस्थित वकील तथा पक्षकार पर्यावरण-मामलों में सक्रिय हैं; इसलिए ‘एक और आवेदन’ को विशेष प्राथमिकता देने की आवश्यकता नहीं समझी गई।
  • न्यायालय ने यह सुनिश्चित किया कि 12 नवम्बर को विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है — इसलिए इस मध्य में एक अतिरिक्त विशेष लिस्टिंग को अनिवार्य नहीं माना गया।

इस प्रकार, आवेदन को अस्वीकृत नहीं बल्कि “आज के लिए तुरंत सूचीबद्ध न करने” का निर्णय लिया गया।


इसके महत्व तथा संभावित प्रभाव

स्वास्थ्य-दृष्टिकोण से

यदि WHO की सुझावित सीमाएँ (सालाना पीएम₂.₅ 10 µg/m³; 24-घंटे की सीमा 25 µg/m³ आदि) का भारतीय-संदर्भ में पालन हो जाए, तो वायु-प्रदूषण से होने वाली मृत्यु-दर, श्वसन-रोग, हृदय-रोगों में अभूतपूर्व कमी आ सकती है। परन्तु, अभी वास्तविक स्थिति बहुत उससे नीचे है।

न्यायिक-नैतिक दृष्टिकोण से

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि — जब प्रदूषण का स्तर सार्वजन क रूप से खतरनाक हो, तब क्या अदालत को प्रवर्तनात्मक निर्देश (enforcement orders) जारी करने का अधिकार और दायित्व नहीं बनता? क्या “प्रवर्तन की कमी” को निष्क्रिय दृष्टि से देखना न्याय-संगत है? इस मामले में SC द्वारा लिस्टिंग न करने का निर्णय सवाल खड़े करता है।

प्रशासन-नीति-कार्यान्वयन की दृष्टि से

  • मॉनिटरिंग व्यवस्था की खामियाँ नीति के समक्ष बाधा हैं।
  • GRAP जैसी प्रणालियाँ पहले बनीं, पर उनकी क्रियान्वयन-गति धीमी रही।
  • वायु-गुणवत्ता सुधार हेतु दीर्घ-कालीन नीतियों (जैसे वाहनों का स्वच्छकरण, उद्योगों की उत्सर्जन-निगरानी, शहर-योजनाएं) की आवश्यकता है।
  • न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों को सम्मान देना एवं क्रियान्वित करना राज्य और केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है।

चुनौतियाँ एवं आगे की राह

  1. डेटा संकलन‌ व निगरानी-विश्वसनीयता
    मापक स्टेशन ठीक से काम नहीं कर रहे— जिससे वास्तविक स्थिति चित्र अस्पष्ट हो जाता है। डेटा-विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि सभी स्टेशन कार्यरत हों, नियमित इंटरकैलिब्रेशन हो तथा लोक-पहुंच वाला खुला डेटा हो।
  2. मूल-स्रोत नियंत्रण
    किताबी तौर पर GRAP-ने नियम हैं—पर उनका पालन जमीन-स्तर पर सुनिश्चित नहीं। उदाहरणस्वरूप: पराली-जलाना, खुला निर्माण-मलबा, पुराने वाहन, पक्ष मोर्चे पर अधिक सक्रिय हैं।
  3. न्यायालय-निर्देशों का क्रियान्वयन
    जहाँ SC निर्देश देता है (जैसे CAQM को एफिडेविट प्रस्तुत करना), वहाँ उनकी निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।
  4. समन्वित क्षेत्रीय कार्रवाई
    दिल्ली-एनसीआर प्रदुषित क्षेत्र अनेक राज्य-संघीय सीमाओं पर फैला है (हरियाणा, उत्तर-प्रदेश, राजस्थान आदि)। इसलिए वहाँ एक समन्वित नीति, साझा डेटाबेस, साझा क्रियान्वयन-संरचना की आवश्यकता है।
  5. दीर्घ-कालीन रणनीति : स्वास्थ्य-विवेक + विकास
    वायु-प्रदूषण सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, आर्थिक बोझ, सामाजिक-न्याय का मुद्दा भी है। विकासशील देश की तरह हमारा अर्थव्यवस्था विकास की ओर अग्रसर है; इस विकास-लक्ष्य तथा स्वच्छ वातावरण के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

निष्कर्ष

यह निर्णय कि SC ने WHO दिशानिर्देशों के तुरंत क्रियान्वयन हेतु आवेदन को आज सूचीबद्ध न करने का विकल्प चुना, स्वयं में “विलंब” का संकेत देता है — पर इसे पूर्ण रूप से न्याय-विरोधी नहीं कहा जा सकता क्योंकि मामला पहले से ही सूचीबद्ध है। फिर भी, गंभीर प्रदूषण-स्थिति में शीघ्र सुनवाई की मांग स्वाभाविक है।

      दिल्ली-एनसीआर में वायु-प्रदूषण नियंत्रण एक बहुआयामी कार्य है — जिसमें न्याय-पालिका, नीति-निर्माता, प्रशासन, नागरिक और विज्ञान-समर्थक निगरानी सबकी भूमिका है। केवल नियामक निर्देश देना पर्याप्त नहीं — उनका जमीन-स्तर पर क्रियान्वयन, नियमित निगरानी, जवाबदेही और नागरिक भागीदारी जरूरी है। यदि आज नहीं, तो कल फिर वही धुंध, वही श्वसन-रोग, वही सार्वजनिक स्वास्थ्य-चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।