दुर्घटना का प्रतिरक्षा (Defence of Accident) — भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 18 का विस्तृत विश्लेषण
परिचय
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) ने भारतीय दंड संहिता, 1860 की जगह लेकर भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक नया अध्याय जोड़ा है। इस नई संहिता की धारा 18 “दुर्घटना का प्रतिरक्षा” (Defence of Accident) से संबंधित है। इस प्रावधान का उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों को दंडात्मक उत्तरदायित्व से बचाना है, जिन्होंने कोई हानि या अपराध बिना किसी आपराधिक इरादे या जानकारी के केवल संयोगवश कर दिया हो। कानून यह मानता है कि किसी व्यक्ति को तभी अपराधी कहा जा सकता है, जब उसके कार्य में अपराध करने की मंशा (mens rea) या ज्ञान (knowledge) मौजूद हो।
धारा 18 का प्रावधान (Provision)
धारा 18, भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अनुसार –
“Nothing is an offence which is done by accident or misfortune, and without any criminal intention or knowledge, in the doing of a lawful act in a lawful manner, by lawful means, and with proper care and caution.”
अर्थात् —
“यदि कोई कार्य संयोगवश या दुर्भाग्यवश हो जाता है, और वह अपराधपूर्ण इरादे या ज्ञान के बिना, विधिसंगत कार्य करते समय, विधिसंगत तरीके से, विधिसंगत साधनों से और उचित सावधानी के साथ किया गया हो, तो वह अपराध नहीं माना जाएगा।”
धारा 18 के आवश्यक तत्व (Essential Conditions)
इस प्रावधान के अंतर्गत किसी कार्य को दुर्घटनावश माना जाने के लिए निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना आवश्यक है –
- कार्य का दुर्घटनावश या दुर्भाग्यवश होना आवश्यक है —
कार्य किसी दुर्घटना या अप्रत्याशित घटना के रूप में होना चाहिए, जिसमें व्यक्ति का कोई नियंत्रण न हो। - कोई अपराध करने का इरादा या ज्ञान न हो —
यदि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर कार्य किया हो या उसे परिणामों का अनुमान था, तो यह प्रतिरक्षा लागू नहीं होगी। - कार्य स्वयं में विधिसंगत होना चाहिए —
यदि मूल कार्य ही अवैध हो (जैसे हथियार का अवैध प्रयोग), तो “दुर्घटना” का बचाव उपलब्ध नहीं होगा। - कार्य विधिसंगत तरीके और साधनों से किया गया हो —
उदाहरण के लिए, यदि व्यक्ति कानूनी रूप से बंदूक साफ कर रहा है, तो यह विधिसंगत कार्य है। - उचित सावधानी और सतर्कता बरती गई हो —
यदि व्यक्ति लापरवाही या असावधानी दिखाता है, तो उसे इस धारा के तहत संरक्षण नहीं मिलेगा।
धारा 18 का उद्देश्य (Purpose of Section 18)
इस धारा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति उस कार्य के लिए दंडित न हो, जो अनजाने में और बिना अपराध करने की भावना के हुआ हो। यह न्याय के सिद्धांत पर आधारित है कि “actus non facit reum nisi mens sit rea”, अर्थात् “केवल कार्य से कोई अपराधी नहीं बनता, जब तक कि उसमें अपराध करने का इरादा न हो।”
व्याख्या और उदाहरण (Explanation and Illustrations)
उदाहरण 1:
यदि कोई व्यक्ति अपने घर में कानूनी रूप से बंदूक साफ कर रहा है और अत्यधिक सावधानी बरत रहा है, लेकिन सफाई के दौरान गोली गलती से चल जाती है और किसी व्यक्ति को चोट पहुँच जाती है, तो यह “दुर्घटना” के अंतर्गत आएगा।
उदाहरण 2:
यदि कोई व्यक्ति सड़क पर गाड़ी चला रहा है और सभी यातायात नियमों का पालन कर रहा है, लेकिन अचानक कोई बच्चा सामने आ जाता है और दुर्घटनावश चोट लग जाती है — तो यह अपराध नहीं माना जाएगा, क्योंकि कोई आपराधिक मंशा नहीं थी।
उदाहरण 3:
यदि कोई व्यक्ति गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन पर बात कर रहा था और किसी को टक्कर लग गई, तो यह दुर्घटना नहीं बल्कि लापरवाही (negligence) मानी जाएगी, क्योंकि उसने उचित सावधानी नहीं बरती।
न्यायिक दृष्टिकोण (Judicial Interpretation)
भारतीय न्यायालयों ने कई निर्णयों में इस सिद्धांत की पुष्टि की है कि जब तक कार्य के पीछे आपराधिक मंशा नहीं है, तब तक केवल दुर्घटनावश हुई हानि को अपराध नहीं कहा जा सकता।
(i) Tunda v. Rex (AIR 1950 All 95) —
इस मामले में आरोपी और मृतक दोनों ने खेल-खेल में एक-दूसरे से लड़ाई की थी। इस दौरान मृतक की मृत्यु हो गई। अदालत ने कहा कि यह दुर्घटना थी क्योंकि आरोपी का कोई आपराधिक इरादा नहीं था।
(ii) Bhagwan Singh v. State of Rajasthan (1976 Cri LJ 1403) —
यहां आरोपी ने बंदूक साफ करते समय गलती से गोली चला दी, जिससे एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। अदालत ने माना कि चूंकि आरोपी ने अत्यधिक सावधानी बरती थी और घटना अनजाने में हुई, अतः उसे धारा 18 के अंतर्गत प्रतिरक्षा दी जा सकती है।
(iii) State of Orissa v. Bhagaban Barik (1987 Cri LJ 872) —
अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को तभी “दुर्घटना” का संरक्षण मिल सकता है जब वह यह साबित कर सके कि उसने हर आवश्यक सावधानी बरती थी और कार्य विधिसंगत था।
दुर्घटना और लापरवाही में अंतर (Difference between Accident and Negligence)
| बिंदु | दुर्घटना (Accident) | लापरवाही (Negligence) |
|---|---|---|
| 1. मंशा | कोई आपराधिक मंशा नहीं | सावधानी में कमी |
| 2. परिणाम | अप्रत्याशित | अनुमानित या टालने योग्य |
| 3. जिम्मेदारी | आपराधिक जिम्मेदारी नहीं | दंडनीय, विशेषकर धारा 106 (Death by Negligence) के तहत |
| 4. उदाहरण | गन सफाई के दौरान गोली चलना | मोबाइल पर बात करते हुए वाहन चलाना |
दुर्घटना का प्रतिरक्षा और सावधानी का मानक (Standard of Care and Caution)
इस धारा के तहत व्यक्ति को तभी सुरक्षा मिलेगी जब उसने सभी reasonable precautions अपनाए हों। इसका अर्थ यह है कि परिस्थिति के अनुसार एक सामान्य व्यक्ति जितनी सावधानी बरतता, उतनी सावधानी अभियुक्त ने भी बरती हो।
दुर्घटना का प्रतिरक्षा बनाम अन्य प्रतिरक्षाएँ (Comparison with Other Defences)
धारा 18 की प्रतिरक्षा अन्य सामान्य प्रतिरक्षाओं जैसे कि धारा 19 – Necessity (आवश्यकता), धारा 20 – Consent (सहमति), और धारा 22 – Private Defence (निजी प्रतिरक्षा) से भिन्न है।
यह प्रतिरक्षा केवल उन्हीं परिस्थितियों में लागू होती है जहाँ व्यक्ति ने विधिसंगत कार्य किया हो, किन्तु परिणाम दुर्भाग्यवश विपरीत हुआ हो।
न्यायिक सिद्धांत के रूप में महत्व (Doctrinal Significance)
धारा 18 न केवल आपराधिक विधि का एक तकनीकी प्रावधान है, बल्कि यह मानवीय संवेदना पर आधारित एक सिद्धांत भी है। यह स्वीकार करती है कि कोई भी व्यक्ति हर स्थिति पर नियंत्रण नहीं रख सकता। न्याय का यही तकाजा है कि अनजाने में हुई घटनाओं को अपराध की श्रेणी में न रखा जाए।
निष्कर्ष (Conclusion)
धारा 18, भारतीय न्याय संहिता, 2023 एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है जो यह सुनिश्चित करती है कि केवल दुर्घटनावश हुई घटनाओं के लिए किसी व्यक्ति को अपराधी न ठहराया जाए। यह धारा न्याय और नैतिकता दोनों का संतुलन बनाए रखती है।
कानून यह मानता है कि यदि कोई व्यक्ति सद्भावना से, विधिसंगत कार्य करते हुए, उचित सावधानी के साथ कार्य करता है और उसके बावजूद कोई अप्रत्याशित हानि हो जाती है, तो उसे दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
इस प्रकार, धारा 18 न्याय की उस मूल भावना को साकार करती है जो कहती है —
“अपराध का आधार केवल परिणाम नहीं, बल्कि इरादा है।”